पर्यावरण दिवस विशेष: त्रासदी के मुहाने पर

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उमंग कुमार/

शिमला बूंद-बूंद पानी को तरस रहा है। पानी के लिए लोग सड़क पर उतरकर आंदोलन करने को मजबूर हो रहे हैं। पानी के लिए प्रदर्शन करने पर कम से कम 200 लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है। जिस शिमला की अर्थव्यवस्था पर्यटकों पर निर्भर है, अब वहीं पर्यटकों से न आने की अपील की जा रही है। न्यायालय ने आदेश दे दिया है कि शहर के 250 होटलों को अभी पानी सप्लाई नहीं की जाएगी। शिमला अकेले ऐसी स्थिति का सामना नहीं कर रहा है बल्कि दुनिया के कई बड़े शहर बहुत तेजी से ऐसी स्थिति की तरफ बढ़ रहे हैं। दक्षिण अफ्रीका की राजधानी केपटाउन में भारी किल्लत की वजह से पानी की राशनिंग कर दी गई है और जल्द ही वहां जीरो डे लागू किया जा सकता है। जीरो डे का अर्थ उस स्थिति से है जब टोटियों में पानी आना बंद हो जाता है। पूरी दुनिया में ऐसे सैकड़ों शहर हैं जो आने वाले दो-चार सालों में पानी की किल्लत से जूझेंगे।

भारत का कृषि क्षेत्र पानी के अजीबोगरीब संकट से गुजर रहा है। सूखे के दिन में बाढ़ और बाढ़ के दिन में सूखा की चर्चा आजकल सामान्य हो गई है। पिछले साल राजस्थान जैसे रेतीले राज्य में जहां पानी की शाश्वत कमी रहती है, वहां अचानक इतनी बारिश हुई कि बाढ़ जैसी स्थिति बन आई।

ये सारी चुनौतियां मानव समाज के लिए नई हैं। लोग इन्हें और इनके पीछे की वजह को समझने के लिए प्रयासरत हैं। वैसे तो प्रत्येक घटना का जलवायु परिवर्तन से सीधा सम्बन्ध नहीं जोड़ा जा सकता लेकिन लोगों में खासकर वैज्ञानिक समुदाय में एक सामान्य समझ बनने लगी है कि यह सब ‘जलवायु परिवर्तन’ की वजह से हो रहा है।

पिछले साल यानी 2017 में महान वैज्ञानिक स्टीफन हॉकिंग ने बीबीसी की एक डाक्यूमेंट्री में कहा था कि इंसान को मंगल को 100 साल के अन्दर रहने लायक बना लेना चाहिए

दरअसल, जलवायु परिवर्तन मानव सभ्यता के इतिहास में सबसे बड़ी चुनौती बनकर सामने आई है। कुछ इस तरह कि बड़े-बड़े वैज्ञानिक भी कहने लगे हैं कि कुछ सालों में पृथ्वी पर जीवन मुश्किल हो जाएगा। पिछले साल यानी 2017 में महान वैज्ञानिक स्टीफन हॉकिंग ने बीबीसी की एक डाक्यूमेंट्री में कहा था कि इंसान को मंगल को 100 साल के अन्दर रहने लायक बना लेना चाहिए। उनको डर था कि पृथ्वी का बढ़ता तापमान, रोग और जनसंख्या वृद्धि की वजह से पृथ्वी पर रहना मुश्किल होने वाला है। इसी साल मार्च में इस महान वैज्ञानिक का देहांत हो गया।

आखिर पृथ्वी का तापमान क्यों बढ़ रहा है और लोग इससे इतने डरे हुए क्यों हैं? पहले तो यह समझना होगा कि पृथ्वी का तापमान पहली बार नहीं बदल रहा है। माना जाता है कि पृथ्वी का औसत तापमान अभी 15 डिग्री सेल्सियस के आसपास है। यह तापमान पहले भी घटता बढ़ता रहा है। लेकिन पहले और अभी हो रहे परिवर्तन में एक खास अंतर है गति का। अभी पृथ्वी तेजी से गर्म हो रही है और इसलिए यहां का जीवन अधिक प्रभावित हो रहा है। अगर यह परिवर्तन धीरे-धीरे होता तो पृथ्वी पर मौजूद जीवन को इसके साथ बदलने का मौका मिलता।

शिमला में पुलिस की निगरानी में पानी के लिए इकठ्ठा होते लोग

पहले और वर्तमान में हो रहे परिवर्तन में एक और बड़ा अंतर है। पहले के परिवर्तन स्वाभाविक और नैसर्गिक वजहों से हुए। वैज्ञानिक मानते हैं कि वर्तमान में पृथ्वी के तामपान में जो वृद्धि हो रही है उसके पीछे कृत्रिम या कहें इंसानी वजहें जिम्मेदार हैं। इन वैज्ञानिकों का मानना है कि इस तरह के परिवर्तन का दूरगामी असर होगा।

पृथ्वी के तापमान में हो रही परिवर्तन को और बारीकी से समझने के लिए हमें पहले ‘ग्रीनहाउस इफेक्ट’ को समझना होगा। सूर्य से निकलने वाली ऊर्जा पृथ्वी पर आती है और टकराकर वापस अंतरिक्ष में चली जाती है। पृथ्वी की बाहरी परत पर कई गैसों से मिलकर एक तह बनी होती है जिसे ग्रीनहाउस गैस कहते हैं। इसकी वजह से लौट रहे सौर ऊर्जा का कुछ हिस्सा वायुमंडल में ही रह जाता है। सामान्यतः ग्रीनहाउस गैस का प्रभाव सकारात्मक होता रहा है क्योंकि उसी सौर ऊर्जा की वजह से पृथ्वी का तापमान जीवन के लायक बना रहता है।

अब इस ग्रीनहाउस गैस के नकारात्मक प्रभाव पड़ने लगे हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि उद्योग और कृषि से निकलने वाली गैस ग्रीनहाउस का प्रभाव बढ़ा रही है। इससे तापमान में वृद्धि हो रही है। इसी को वैश्विक तामपान में वृद्धि या ग्लोबल वार्मिंग कहा जाता है और इसकी वजह से होने वाले मौसम इत्यादि के परिवर्तन को जलवायु परिवर्तन कहा जाता है।

ग्रीनहाउस गैस में मौजूद कार्बन डाईऑक्साइड (CO2) की उम्र काफी लम्बी होती है, इसलिए यह अधिक हानिकारक मानी जाती है

जितनी भी ग्रीनहाउस गैस हैं उनमें वाष्प की बहुत बड़ी भूमिका है। इसकी वजह से सौर ऊर्जा अधिक मात्रा रुकती है लेकिन ये वाष्प खुद क्षणभंगुर होती है। कुछ ही दिन में ये वायुमंडल से गायब हो जाती है, इसलिए इनका कोई खास असर नहीं होता। दूसरी तरफ इसी ग्रीनहाउस गैस में मौजूद कार्बन डाईऑक्साइड (CO2) की उम्र काफी लम्बी होती है, इसलिए यह अधिक हानिकारक मानी जाती है। ऐसा कहा जाता है कि ग्रीनहाउस गैस में अभी जितना CO2 जमा है, उसे मशहूर औद्योगिक क्रान्ति के स्तर पर वापस पहुंचाने में कई सौ साल लगेंगे। औद्योगिक क्रान्ति का जिक्र इसलिए क्योंकि इस ग्रीनहाउस में CO2 की मात्रा बढ़ाने में उद्योग की अहम भूमिका रही है।

CO2 के बड़ी मात्रा में इकठ्ठा होने के पीछे जीवाश्म इंधन को जलाना और बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई जिम्मेदार है। ये पेड़ इस CO2 को सोख सकते थे। CO2 के अतिरिक्त ग्रीनहाउस में मीथेन और अन्य गैस भी शामिल हैं पर उनकी मात्रा इसके मुकाबले काफी कम है।

अब बात करते हैं औद्योगिक क्रांति और इसके बुरे प्रभाव की। वर्ष 1750 हुई औद्योगिक  क्रांति के बाद वायुमंडल में CO2 की मात्रा में कुल 30 प्रतिशत का इजाफा हुआ है। इसकी वजह से आज वायुमंडल में CO2 की मात्रा पिछले आठ लाख सालों में सबसे अधिक है।

दुनिया में एक तबका ऐसा भी है जो इस बात को मानने को तैयार नहीं है कि पृथ्वी का तापमान बढ़ रहा है। लेकिन इस समूह के पास वर्तमान में हो रहे परिवर्तन को समझाने के लिए कोई तरीका भी नहीं है। दूसरी तरफ कुछ तथ्य ग्लोबल वार्मिंग को सही बताते हैं। आइए इसको देखते हैं। उन्नीसवीं शताब्दी से पृथ्वी के तापमान का लेखा जोखा रखना शुरू हुआ। इन आंकड़ों के अध्ययन से पता चलता है कि पिछले 100 साल में पृथ्वी के तापमान में कुल 0.8 सेल्सियस की वृद्धि हुई है। इसमें से 0.6 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि तो महज तीन दशक में ही हो गई है।

सैटेलाइट से लिए गए आंकड़े बताते हैं कि पिछले कुछ दशक में समुद्र का जलस्तर 3 मिमी के हिसाब से बढ़ा है। इसके पीछे भी पृथ्वी के बढ़ते तापमान को ही जिम्मेदार माना जा रहा है। समुद्र के गर्म होने पर इसके अणु फैलते हैं और पानी का आयतन बढ़ता है।  बढ़ते तापमान की वजह से बर्फीले पहाड़ तेजी से पिघल रहे हैं और उनका पानी समुद्र के जलस्तर को बढ़ा रहा है।

ग्लोबल वार्मिंग का असर क्या होगा?

2013 के एक अध्ययन में इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (IPCC) ने कंप्यूटर मॉडलिंग के तहत कई सारी संभावनाएं जताई थीं। अनुमान लगाया गया था कि इक्कीसवीं सदी के अंत तक पृथ्वी का तापमान वर्ष 1850 के मुकाबले डेढ़ डिग्री सेंटीग्रेट के करीब बढ़ जाएगा। इसको इस तरह समझा जाना चाहिए कि अगर यह तापमान दो डिग्री से अधिक बढ़ गया तो खतरनाक परिणाम आने शुरू हो जाएंगे।

वैज्ञानिकों का मानना है कि अब देर हो रही है। ग्रीनहाउस गैस को तेजी से कम करने में अभी सफलता मिल गई तो इसके जमीनी प्रभाव दिखने में काफी समय लगेगा। क्योंकि तापमान में हो चुकी वृद्धि आने वाले समय में अपना प्रभाव दिखाती रहेगी, जैसे पहाड़ पिघलते रहेंगे, समुद्र के जल का आयतन बढ़ता रहेगा इत्यादि।

यह अनुमान लगा पाना काफी मुश्किल है कि जलवायु परिवर्तन का हम लोगों पर किस तरह का असर होगा। हो सकता है कि इससे पीने के साफ पानी की किल्लत हो जाए, खाद्य पदार्थों के उत्पादन के स्वरूप में ही परिवर्तन हो जाए। बाढ़, आंधी-तूफान, लू और सूखे इत्यादि की पुनरावृति तेजी से होने लगे और इससे प्रभावित या मरने वालों की संख्या बढ़ती चली जाए। वैज्ञानिक मानते हैं कि जलवायु परिवर्तन की वजह से एक्सट्रीम वेदर इवेंट अथवा प्राकृतिक आपदा जैसी घटनाएं बढ़ेंगी। फिर भी यह स्पष्ट होना चाहिए कि किसी एक घटना को जलवायु परिवर्तन से जोड़कर नहीं देखा जा सकता।

वैज्ञानिकों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन की वजह से एक तरफ बेमौसम और तेज वर्षा होगी और दूसरी तरफ गर्मी के दिनों में सूखे का प्रभाव भी बढ़ेगा। आंधी-तूफान की संख्या में वृद्धि होगी तो दूसरी तरफ समुद्र के जलस्तर बढ़ने से बाढ़ इत्यादि का प्रकोप भी अधिक मात्रा में झेलना होगा। हालांकि यह भी जरूरी नहीं कि दुनिया का प्रत्येक हिस्सा इस जलवायु परिवर्तन की वजह से एक सामान प्रभावित हो। ऐसा माना जाता है कि गरीब देश जो ऐसी समस्याओं से जूझने के लिए आर्थिक और तकनीकी रूप से तैयार नहीं हैं, उन पर अधिक प्रभाव होगा।

यह भी माना जाता है कि जलवायु परिवर्तन की वजह से जीव-जंतु तेजी से विलुप्त होंगे। इसके पीछे तर्क यह है कि ये जीव-जंतु जिस तरह की जगहों और वातावरण में रहते हैं उसमें तेजी से परिवर्तन होगा और इस परिवर्तन के मुताबिक खुद को बदलने के लिए समय नहीं मिल पाएगा। विश्व स्वास्थय संगठन का अनुमान है कि बढ़ते तापमान की वजह से लाखों-करोड़ों लोगों का स्वास्थ्य प्रभावित होगा। बाढ़, बरसात इत्यादि की वजह से मच्छर जनित रोग अधिक होंगे। इसमें मलेरिया, चिकनगुनिया, डेंगू जैसे रोग शामिल हैं। कुछ नए रोग भी अस्तित्व में आ सकते हैं जिसके बारे में अभी कोई जानकारी मौजूद नहीं है। दूसरी तरफ खाद्य समस्या की वजह से कुपोषण इत्यादि बढ़ेगा।

क्या कर रहा है विश्व-समुदाय?

दुनिया के सारे देश इस पर सहमत है कि सब मिलकर ही इस चुनौती से निपटने का रास्ता निकाल सकते हैं। हर साल ये देश तयशुदा जगह पर इकठ्ठा होते हैं और सहमति बनाने की कोशिश करते हैं।

वर्तमान में ये देश वर्ष 2015 में हुए पेरिस समझौते के तहत कार्य कर रहे हैं। इसके तहत भारत को तीन मुख्य क्षेत्र में काम करना है जिसमें 2005 की तुलना में भारत को 33 से 35 प्रतिशत के करीब एनर्जी एफिशिएंसी बढ़ानी है, 40 प्रतिशत बिजली का उत्पादन गैर जीवाश्म ईंधन से करना हैं और वनों का दायरा इतना बढ़ाना है कि कि करीब 250 करोड़ टन कार्बन को सोखा जा सके। इसी तरह से प्रत्येक देश ने अपने लिए कुछ लक्ष्य निर्धारित किए हैं जिन्हें 2030 तक हासिल करना है।

लेकिन यह सब इतना आसान भी नहीं है। कुछ देश इस तरह की सहमति के बीच रोड़ा अटकाते रहते हैं। इस पर बात करने के पहले जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए समझौते के इतिहास पर नजर डालते हैं। वर्तमान में सर्वमान्य (अमेरिका को छोड़कर) पेरिस समझौता विश्व समुदाय के पच्चीस सालों के अथक प्रयास की वजह से अस्तित्व में आया है। इसकी शुरुआत संयुक्त राष्ट्र की 1992 में हुई बैठक में हुई थी जिसे अर्थ समिट के नाम से जाना जाता है। बैठक का आयोजन रियो दे जनेरिओ शहर में हुआ था। यहीं पर युनाइटेड नेशन फ्रेमवर्क ऑन क्लाइमेट चेंज (UNFCCC) अस्तित्व में आया।  इसके तहत यह तय हुआ था कि सारे देश ग्रीनहाउस गैस के उत्सर्जन में कटौती करने का प्रयास करेंगे। इस फ्रेमवर्क में यह भी कहा गया था कि सारे देश एक उद्देश्य पर अलग-अलग जिम्मेदारियों के साथ काम करेंगे। यह जिम्मेदारी देश की आर्थिक, तकनीकी क्षमता पर तय होगी। विकसित देश विकासशील और गरीब देशों को उत्सर्जन को कम करने में मदद करेंगे। यह सब कॉन्फ्रेंस ऑफ पार्टीज (COP) की देखरेख में होगा। इसकी सालाना बैठक होगी।

सबसे आखिरी मसौदा जिसको पेरिस समझौता के नाम से जाना जाता है, वर्ष 2015 में अस्तित्व में आया

इसके तहत कई सारे समझौते हुए पर किसी पर सटीक काम नहीं हुआ और अमेरिका अपने व्यवसायिक हितों के मद्देनजर हमेशा से रोड़े अटकाता रहा। सबसे आखिरी मसौदा जिसको पेरिस समझौता के नाम से जाना जाता है, वर्ष 2015 में अस्तित्व में आया। लेकिन अमेरिका ने इसके साथ भी यही सलूक किया।

डोनल्ड ट्रम्प के राष्ट्रपति बनने के तुरंत बाद से विश्व समुदाय सांस थामे इस इंतजार में था कि इस जलवायु परिवर्तन के लिए सबसे अधिक जिम्मेदार देश अमेरिका क्या रुख अपनाता है। चूंकि अमेरिका के रिपब्लिकन पार्टी ने इस मौसौदे का शुरू से विरोध किया था और इस दल का प्रतिनिधित्व ट्रम्प करते हैं और संयोग से वही सत्ता में आ गए। फिर वही हुआ जिसका डर था। ट्रम्प ने घोषणा कर दी कि उनका देश इस पूरे मसौदे से अपने को अलग कर रहा है। जलवायु परिवर्तन के मद्देनजर कई दशकों से किए जा रहे अथक प्रयास के लिए यह बड़ी खबर थी। गहरा धक्का था।

इस फैसले के साथ ही अमेरिका ने खुद को निकारगुआ और सीरिया जैसे देशों की पंक्ति में खड़ा कर दिया जो 195 देशों के बीच हुए इस समझौते में शामिल नहीं हैं।

लेकिन निकारगुआ और सीरिया का इस सहमति में शामिल नहीं होना मामूली बात थी पर अमेरिका को नजरंदाज करके जलवायु परिवर्तन की समस्या से नहीं निपटा जा सकता। यह अमेरिका को भी मालूम है और अन्य देशों को भी।

ऐतिहासिक तौर पर अमेरिका ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जित करने वाला अग्रणी देश रहा है।  औद्योगिक गतिविधियों की वजह से उसने सबसे अधिक हानिकारक गैस का उत्सर्जन किया है। वर्ल्ड रिसोर्स इंस्टिट्यूट के अनुसार, अमेरिका ने 1950 से 2013 के बीच निकारगुआ और सीरिया की तुलना में 180 गुना अधिक कार्बन का उत्सर्जन किया है। हालिया आंकड़ों के अनुसार, वर्तमान में भी अमेरिका कुल ग्रीनहाउस का सातवां हिस्सा उत्सर्जित करता है, वहीं प्रति व्यक्ति उत्सर्जन इस देश में सबसे अधिक है।

इसको देखते हुए आप भी समझ सकते हैं कि जलवायु परिवर्तन से जुड़े किसी प्रयास में अमेरिका की भूमिका क्यों अहम है। पेरिस समझौते से अमेरिका का पीछे हटना वैश्विक समुदाय के लिए बड़ा झटका क्यों है।

नुकसानदायक गैस के उत्सर्जन में सबसे आगे होने की वजह से अमेरिका का सार्थक हस्तक्षेप जरूरी है। अगर ऐसा नहीं होता है तो इसके कई नुकसानदायक परिणाम हो सकते हैं। पहला तो यह कि अगर यह देश अपना उत्सर्जन कम नहीं करता है तो जलवायु परिवर्तन को नहीं रोका जा सकता। दूसरे अगर विकास और प्रदूषण फैलाने वाले अग्रणी देश भी अपनी जिम्मेदारी से भाग सकते हैं तो अन्य देशों के लिए भी ऐसा करने का मौका मिल जाएगा। अमेरिका ने शुरू से ही जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए अपनी जिम्मेदारियों से आनाकानी की है। इसकी शुरुआत 1992 में होती है जब अमेरिका के राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश (सीनियर) ने ब्राजील के रियो शहर में चल रहे अर्थ समिट में कहा था कि अमेरिकी लोगों की जीवनशैली में सुधार को लेकर कोई बातचीत नहीं हो सकती।

लेकिन न केवल अमेरिका बल्कि दुनिया के सभी देशों को यह समझना पड़ेगा कि जीवनशैली में बदलाव लाना ही पड़ेगा अन्यथा पृथ्वी अपने में बदलाव लाकर ऐसा करने को मजबूर कर देगी।

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