क्या अब बच्चे ढोयेंगे एक ख़ास वर्ग के जीवन शैली का बोझ?

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उमंग कुमार/

कर्नाटक के कई विद्यालयों के बच्चों को दिए जाने वाले मध्याह्न भोजन में अंडा तो दूर लहसुन और प्याज तक  नहीं दिया जा रहा है. इसकी वजह है अक्षय पात्र फाउंडेशन (एपीएफ) जो कर्नाटक के छह जिले के 2,814 स्कूलों को मिड-डे भोजन की आपूर्ति करता है.

एपीएफ कृष्णा कॉन्शियसनेस (ISKCON) से जुड़ा है और यह इन सामग्रियों को ‘तामसिक’ मानता है.  यह न केवल कर्नाटक सरकार द्वारा निर्धारित मेनू का उल्लंघन है, बल्कि एपीएफ द्वारा हस्ताक्षरित मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग (एमओयू) की शर्तें के खिलाफ भी हैं. यह मानव संसाधन मंत्रालय के दिशानिर्देशों का भी उल्लंघन करता है.

इसका विरोध कर रहे संस्थानों का मानना है कि बच्चों को लहसुन प्याज से वंचित करने संविधान के मूल सिद्धांतों के भी खिलाफ है क्योंकि यह एक तरह से इन मासूम बच्चों पर निजी मान्यताओं को थोपना भी है. इन विद्यालाओं में हर धर्म, समुदाय और जाति के बच्चे शिक्षा ग्रहण करने आते हैं.

इस पूरी कहानी का सबसे दुखद पहलू यह है कि नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूट्रिशन (एनआईएन) ने एक रिपोर्ट प्रकाशित कर इस संस्था के इस कार्य का समर्थन किया है. एनआईएन के खिलाफ कई संस्थाओं ने हस्ताक्षर अभियान चलाकर विरोध दर्ज किया है. इनमें 10 संगठनों और 94 व्यक्ति शामिल हैं.  इन्होंने एनआईएन के वैज्ञानिकों को एक खुला पत्र भेजकर संस्थान को अपनी रिपोर्ट वापस लेने की मांग की है.

कर्नाटक राज्य खाद्य आयोग और कई स्वयंसेवी संस्थाओं ने पहले भी सरकार से बच्चों को लहसुन प्याज नहीं देने के कदम का विरोध किया था. इस शिकायत के बाद  सरकार ने एपीएफ को निर्धारित मेनू का पालन करने का निर्देश दिया था. बजाय की एपीएफ राज्य सरकार का निर्देश माने, इसने राज्य सरकार में उच्च अधिकारियों से संपर्क किया. फलस्वरूप राज्य सरकार के अधिकारियों ने राष्ट्रीय पोषण संस्थान (एनआईएन) और केंद्रीय खाद्य प्रौद्योगिकी अनुसंधान संस्थान (सीएफटीआरआई) से इस मुद्दे पर तकनीकी सलाह मांगी.

सीएफटीआरआई ने एपीएफ द्वारा आपूर्ति किए जा रहे भोजन की पोषण संबंधी पर्याप्तता, स्वाद, विविधता, सुरक्षा और स्वच्छता आदि के बारे में अधिकांश सवालों पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया. लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि एनआईएन ने एपीएफ द्वारा दिए गए भोजन पर पूरी तरह से समर्थन किया है.

इसका विरोध कर रहे लोग इसे निराधार और पक्षपाती रवैया मानते हैं और उनका आरोप है कि एनआईएन ने न ही किसी विद्यालय का दौरा किया और न ही किसी विद्यार्थी से बात फिर भी मध्याहन भोजन देने वाली संस्था के खिलाफ रिपोर्ट दे दी गई.

इन लोगों का मानना है कि एनआईएन देश में पोषण नीति बनाने के लिए तकनीकी इनपुट प्रदान करने वाली एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक संस्था रही है और इसलिए यह गंभीर चिंता का विषय है.

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