क्या बुलेट ट्रेन के जमाने में भी बाल विवाह और महिलाओं पर हिंसा नहीं रुकने वाले!

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उमंग कुमार/

किरण (बदला हुआ नाम ) के खेलने-कूदने के दिन थे जब उनकी शादी कर दी गई. सुनीता की उम्र जरजमा पंद्रह की थी और इन्होंने उसी साल हाई स्कूल का इम्तहान दिया था. चार भाईयों में सबसे छोटे लड्डू लाल श्रीवास्तव से ब्याही सुनीता जो ठीक से इस बदलाव को समझ भी न पायी थी, साल बीतते-बीतते एक बेटी की माँ बन गई. इस बच्ची का जीवन भी महज़ आठ महीना का था. जब इस बच्ची की मृत्यु हुई तब सुनीता को फिर से छः महीने का गर्भ था. पूर्वी उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले की रहने वाली सुनीता का ब्याह गोपालगंज में 2011 में हुआ. आज 2017 में छः साल के भीतर इनको तीन बच्चे और हो चुके हैं. एक साधारण समझ रखने वाला इंसान भी बता सकता है कि 21 साल की उम्र में चार बच्चे पैदा करने का असर उनके शरीर पर क्या पड़ा होगा. अब वो सामान्यतः बीमार रहती हैं.

इससे भी बड़ी विडम्बना यह कि सुनीता के माँ-बाप ने जिस जिम्मेदारी से मुक्त होने के लिए कम उम्र में ही इनकी शादी कर दी थी, वो ज़िम्मेदारी अब फिर से उनके सर ही वापस आ पड़ी है. आज सुनीता अपने पति और तीन बच्चों के साथ अपने मायके में रहती हैं. वजह साधारण है, सुनीता के पति का बेरोजगार होना, ससुराल में यातनाएं, कम उम्र में तीन बच्चो का बोझ आदि. आजकल सुनीता की माँ सविता सबका पेट पालने के लिए आस-पड़ोस के घरों में चौका-बर्तन करती हैं.

इक्कसवीं सदी के इस देश में सुनीता के जैसी लाखों लड़कियां हैं, जो अपने आप को संभालना सीखें उससे पहले उनकी शादी कर उनपर जिम्मेदारियों का बोझ लाद दिया जाता है. भारत में बाल विवाह अभी बहुत बड़े स्तर पर होता है. यद्यपि देश में शादी की वैधानिक उम्र लड़कियों के लिए 18 और लड़कों के लिए 21 तय है.

बच्चों के भले के लिए काम करने वाली अंतर्राष्ट्रीय संस्था यूनिसेफ के अनुसार भारत में अभी भी 33 प्रतिशत लड़कियों की शादी उनके वैधानिक उम्र से भी कम में कर दी जाती है. इन लड़कियों की शादी पंद्रह से अठारह वर्ष की उम्र में हो जाती है.

यह संस्था कहती है कि बाल विवाह की समस्या ग्रामीण क्षेत्रों में अधिक है. इस संस्था के अनुसार ग्रामीण इलाकों में 48 प्रतिशत लड़कियों की शादी कम उम्र में कर दी जाती है. वहीं शहरी इलाकों में भी इनका प्रतिशत 29 है. बिहार और राजस्थान जैसे राज्यों में यह समस्या बहुत अधिक है. यूनिसेफ के अनुसार इन राज्यों में करीब 60 प्रतिशत महिलाओं की शादी कम उम्र में कर दी जाती है. अन्य राज्य जहां यह समस्या अधिक है उनमे झारखण्ड, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, छत्तीसगढ़ और त्रिपुरा शामिल हैं.

पिछले साल आये राष्ट्रीय परिवार स्वास्थय सर्वेक्षण के आकड़ों बताते हैं कि जब सर्वेक्षण करने वाले गाँव और कस्बों में पहुंचे तो इन्हें कम से कम 10 प्रतिशत 15 से 19 साल के बीच की ऐसी लडकियां मिलीं, जो या तो एक-दो बच्चों की माँ थीं या गर्भवती थीं. ऐसी लड़कियों की संख्या कुछ राज्य जैसे पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा में बहुत अधिक थी. इन राज्यों में 18 प्रतिशत लड़कियां ऐसी थीं जो या तो बच्चों की जिम्मेदारी संभाल रही थीं या गर्भवती थीं.  देश के आंकड़े देखें तो ऐसे महिलाओं की संख्या जो खुद के खेलने की उम्र में अपने बच्चे संभाल रहीं थीं, वो करीब 8 प्रतिशत थी. गाँव में इनका प्रतिशत 10 के करीब था तो शहरों में पांच के करीब. (राज्यवार आंकड़ा देखने के लिए कृपया ग्राफ देखें.)

क्या हैं इसके मायने?

विशेषज्ञों की मानें तो बाल विवाह की वजह से पहले तो बच्चो के अधिकार पर इसका असर पड़ता है. उनकी शिक्षा-दीक्षा प्रभावित होती है. दूसरे उनका शारीरिक मानसिक विकास पर असर पड़ता है. सेक्स से सम्बंधित जरुरी सावधानी की समझ नहीं होती. परिवार नियोजन इत्यादि जैसे मामले में निर्णय लेने की न समझदारी होती है और न ही उनको इस लायक समझा जाता है कि उनकी बात सुनी जाए.

ऐसी स्थिति में गर्भ और बच्चा सामान्य सी बात हो जाती जिसका बुरा प्रभाव उनके स्वास्थ्य पर पड़ता है. स्वास्थ्य सम्बंधित समस्याओं का चक्र यहीं से शुरू होता. ये कम उम्र की महिलाएं खुद ही कुपोषण की शिकार होती हैं जिसकी वजह से इनके बच्चे भी कुपोषित ही पैदा होते हैं. यूनिसेफ के अनुसार इसकी वजह से गरीबी के चक्र की शुरुआत होती है. कुपोषण जैसे बीमारी के चपेट में परिवार आता है.

अक्टूबर के पहले सप्ताह में भारत के मानवाधिकार के सुरक्षा की स्थिति की चर्चा संयुक्त राष्ट्र राईट काउंसिल में हुई. इसके जेनेवा कार्यालय में इस समीक्षा में अन्य मुद्दों के साथ महिलाओं के स्वास्थ्य खासकर हिंसा, वैवाहिक जीवन के अन्दर ही बलात्कार (मैरिटल रेप) इत्यादि पर भारत सरकार के प्रयास की खिंचाई हुई.

इसके सब के लगभग महीने भर पहले भारत सरकार ने सर्वोच्च न्यायलय में एक हलफनामा दायर करते हुए कहा कि शादी में बलात्कार जैसी घटना को अपराध की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता. इससे शादी नामक संस्था खतरे में पड़ सकती है और इसे पतियों के प्रताड़ना का हथियार बनाया जा सकता है.  केंद्र सरकार ने यह हलफनामा एक केस की सुनवाई के दरम्यान दायर किया जिसमें शादी के बाद भी जबरदस्ती सम्बन्ध बनाने को बलात्कार की श्रेणी में रखने की मांग की जा रही थी. इस मामले की सुनवाई अभी भी लंबित है.

इतनी बड़ी संख्या में जिस देश में बाल विवाह हो रहे हों वहाँ सरकार से इस तरह के जवाब की अपेक्षा नहीं की जाती है.

पापुलेशन फाउंडेशन ऑफ़ इंडिया की कार्यकारी  निदेशक पूनम मुर्तजा का कहना है कि तकरीबन 40 प्रतिशत से अधिक महिलाएं किसी न किसी तरह की घरेलू हिंसा का शिकार होती हैं. खासकर, कम उम्र (15-19 साल) में ब्याही लड़कियों के बारे में तो ये आंकड़े डराने वाले हैं. कई राज्यों में 70 प्रतिशत से अधिक महिलायें जिनकी शादी कम उम्र में कर दी जाती हैं, उनके साथ शारीरिक हिंसा होती है. मुर्तजा ने ये आंकड़े तीसरे राष्ट्रीय परिवार स्वास्थय सर्वेक्षण से लिए हैं जो 2006 में आया था.

सनद रहे कि धारा 375 बलात्कार को परिभाषित करता है. लेकिन यह पति के द्वारा जबरदस्ती शारीरिक संबंध बनाना या किसी और तरह की जबरदस्ती करने को बलात्कार में शामिल नहीं करता. खासकर पंद्रह साल और उससे बड़ी उम्र की महिलाओं के साथ. इसके मद्देनजर अगर उन लड़कियों की संख्या देखी जाए जिनकी शादी अभी भी कम उम्र में कर दी जाती है तो यह अनुमान आसानी से लगाया जा सकता है कि कितनी बड़ी संख्या है जो शारीरिक और मानसिक हिंसा के हिसाब से असुरक्षित है.

इस संस्था का कहना है कि महिलाओं के अधिकार को सुरक्षित करने के लिए सर्वोच्च न्यायलय को इस समस्या को मानना चाहिए कि बहुत बड़ी संख्या में महिलाएं डरी सहमी अपना जीवन काट रही हैं. सर्वोच्च न्यायलय अगर इसको ज़रूरी कानूनी सुरक्षा नहीं देता है तो इससे पतियों को नाबालिग पत्नियों के साथ मनमानी करने की छूट मिलेगी, हौसला बढ़ेगा.

(इस खबर में इस्तेमाल तस्वीर ipleaders.in से साभार लिया गया है)

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