नरेन्द्र मोदी नोटबंदी पर वोट क्यों नहीं मांग रहे हैं?

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उमंग कुमार/

वर्तमान सरकार के कुछ सबसे क्रन्तिकारी कदमों में नोटबंदी शामिल है जब नरेन्द्र मोदी अचानक से टीवी स्क्रीन पर प्रकट होकर यह बता दिया कि हज़ार और पांच सौ के नोट अवैध माने जायेंगे. फिर ऐसा क्या है कि सत्तारूढ़ दल इस क्रांतिकारी कदम का जिक्र चुनावी प्रचार में नहीं कर रहा है. क्या आपने इसके बारे में सोचा है?

कौन भारतीय वह दृश्य भूलेगा जब रोजमर्रे के खर्चे के लिए लम्बी लम्बी कतारों में खड़ा होना पड़ता था! नोटबंदी के घोषणा के दिन से सरकार इस जिद्द पर अड़ी है कि यह देश के भले के लिए उठाया गया कदम था. कभी आतंकवाद, भ्रष्टाचार, वेश्यावृति इत्यादि ख़त्म करने के नाम पर तो कभी अर्थव्यवस्था में कैश को कम करने के नाम पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी या वित्त मंत्री अरुण जेटली इस कदम की सराहना करते रहे हैं.

जबकि दूसरा खेमा हमेशा इस कदम की आलोचना करता रहा है. विरोधी दलों का यह मानना रहा है कि नोटबंदी बिना सोचे समझे उठाया गया कदम था. इसकी वजह से न केवल करोड़ो लोगों को कई कई दिन कतार में गुजारना पड़ा या सैकड़ो लोग इस कतार में खड़े होने की वजह से जान से चले गए. बल्कि यह भी कि इस बेवकुफाना कदम की वजह से अर्थव्यवस्था अभी तक प्रभावित हो रही है और लोग बड़ी संख्या में बेरोजगार हो रहे हैं.

इन सबके जवाब में मोदी यह कहते रहे कि नोटबंदी की शिकायत करने वाले लोग वहीँ हैं जो काले धन का आनंद ले रहे थे. अगर ऐसा है तो सरकार अपनी इस उपलब्धि का जिक्र इस लोकसभा चुनाव में क्यों नहीं कर रही है! आखिर उसे किसका डर सता रहा है!

मोदी यह कहते रहे कि नोटबंदी की शिकायत करने वाले लोग वहीँ हैं जो काले धन का आनंद ले रहे थेतो फिर इसका चुनावी रैली में जिक्र क्यों नहीं

हाल ही में इंडिया टूडे टीवी को दिए साक्षात्कार में नरेन्द्र मोदी से यही सवाल पूछा गया. उनका जवाब कुछ ऐसा था जैसे वो फिर बात में उलझाकर इस मुद्दे से बचना चाहते हों. उन्होंने कहा कि नोटबंदी चुनाव के मद्देनज़र नहीं किया गया था और इसीलिए नरेन्द्र मोदी या उनकी पार्टी के नेता इसका चुनावी सभाओं में जिक्र नहीं कर रहे हैं.

उनके इस बयान से तो यही मतलब निकलता है कि पुलवामा और बालाकोट की घटना सिर्फ चुनाव के मद्देनज़र की गई थी. ऐसा इसलिए कि इस लोकसभा चुनाव में नरेन्द्र मोदी या अमित शाह की शायद ही कोई ऐसी रैली रही हो हो जिसमें इनलोगों ने बालाकोट, देश की सुरक्षा इत्यादि का जिक्र नहीं किया हो.

मोदी के इस तर्क से साफ़ है कि सत्तारूढ़ दल के नेता भी यह मानते हैं कि नोटबंदी एक बिना सोचे समझे उठाया गया कदम था जिसका सबसे अधिक खामियाजा आम आदमी को ही उठाना पड़ा था. अगर गलती से लोगों को वह तकलीफ याद आ गई तो वो फिर सरकार से लोग इसका हिसाब मांग सकते हैं. यही बात है कि सरकार नहीं चाहती है कि नोटबंदी चुनावी मुद्दा बनें.

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