क्यों मर रहे हैं गुजरात में गिर के शेर

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अनिमेष नाथ/

पिछले दो दिनों में गिर के जंगलों में दो और शेरों की मृत्यु के साथ ही पिछले पंद्रह दिन में मरने वाले शेरों की संख्या बढ़कर बढ़कर 13 हो गई है. इन मरने वाले शेरों में एक महीने का एक शेर का बच्चा भी शामिल है. इससे घबराए गुजरात के वन विभाग ने आनन-फानन में गिर के सभी शेरों की गिनती करने की घोषणा कर दी है.

सनद रहे कि गुजरात एशियाई शेरों का आखिरी आश्रय है जहां पिछले पंद्रह दिनों में 13 शेर अपनी जान गंवा चुके हैं. ये शेर मुख्यतः गुजरात के गिर राष्ट्रीय उद्यान में निवास करते हैं.

लेकिन सवाल यह उठता है कि आखिर गिर में इतनी संख्या में शेरों की मृत्यु हो क्यों रही हैं? इसको समझने के लिए थोडा पीछे जाना होगा. सन् 2011 में यहाँ इन शेरों की संख्या 411 थी. वहीँ 2015 में यह संख्या बढ़कर 523 पहुँच गई. पिछले वर्ष की गई गणना के अनुसार इनकी संख्या बढ़कर 650 हो गई है. करीब सौ साल पहले यानी 1913 में एशिया के शेरो की संख्या घटकर 20 हो गई थी. जूनागढ़ के गिर के जंगलों में ही पाए जाने वाले ये जीव चार जिलों तक भ्रमण करते पाए जाते हैं और चूंकि गिर के शेर विलुप्त होने की श्रेणी में हैं इसलिए इन्हें भारत सरकार वाइल्डलाइफ एक्ट के तहत सुरक्षा प्रदान किया जाता है.

इन आंकड़ो को जानने के बाद वन्य जीवों के प्रति संवेदना रखने वाले सभी लोगों को यह सकारात्मक एहसास होगा.  पर जब आपको यह पता चलेगा कि  पिछले दो सालों में 184 शेरों की मृत्यु हो गई है. यानि कि एक साल में करीब 92 शेर तो आपको इस कहानी का दूसरा पहलू समझ में आएगा. यह दो साल, यानि 2016 और 2017 की बात हो रही है.

पिछले दो सालों में यानि 2016-17 में शेरों के मरने के कारणों का अध्ययन हुआ तो पता चला कि 32 शेर अप्राकृतिक मौत मरे

इसके पहले के पांच सालों में 310 शेरों की मौत हुई थी. प्रत्येक साल करीब 62 शेर मरे. यानि साल दर साल शेरों के मरने की संख्या बढ़ रही है.

पिछले दो सालों में यानि 2016-17 में शेरों के मरने के कारणों का अध्ययन हुआ तो पता चला कि 32 शेर अप्राकृतिक मौत मरे. जिसमें कुँए में गिरना, रेल से दुर्घटना या किसानों द्वारा अपने फसल को बचाए जाने के लिए जो बिजली के तार लगाये गए हैं उसमें फंसकर मृत्यु शामिल हैं. इन शेरों की मौत, आदमी और जानवर के द्वन्द का नतीजा है जिसे अंग्रेजी में मैंन-एनिमल कनफ्लिक्ट कहते हैं.

इसकी वजह है कि पहले ये शेर गिर के जंगलों में ही रहते थे लेकिन अब इनके लिए जंगल कम पड़ रहा है.  यह जंगल 1412 वर्ग किलोमीटर में फैला है. लेकिन इस अभयारण्य की कुल क्षमता बस 260 शेरों की है. मतलब इस वन में इससे अधिक शेर नहीं रह सकते. इस वजह से ये शेर अब पोरबंदर, भावनगर और अमरेली जैसे जिलों में भी पाए जाने लगे हैं.

यद्यपि वन विभाग और राज्य सरकार इस सफलता के लिए अपनी पीठ थपथपाते हैं पर एक सच्चाई यह भी है कि वहाँ शेरो के लिए अब जगह बची नहीं है. जिन नए इलाकों में ये शेर घूमते पाए जा रहे हैं, ऐसा माना जाता है कि इतिहास में ये क्षेत्र भी जंगल का हिस्सा रहा हो और गिर के शेर इन क्षेत्रों में भी भ्रमण करते रहते हों.

लेकिन तथाकथित विकास की वजह से मनुष्यों ने इन जंगलों को अपने लिए साफ़ कर दिया और वहाँ अब खेती किसानी होने लगी है. सड़क, रेल लाइन इत्यादि बन गए हैं.

2013 में सर्वोच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को आदेश दिया था कि कुछ शेरो को पड़ोसी राज्य मध्य प्रदेश के कुनो पालपुर वन्यजीव अभयारण्य पहुंचा दिया जाए. लेकिन गुजरात सरकार ने ऐसा नहीं होने दिया. नरेन्द्र मोदी जो उस समय गुजरात के मुख्यमंत्री थे, उन्होंने इन शेरों को गुजरात का गौरव बता कर इन्हें मध्य प्रदेश भेजने से इनकार कर दिया था.

धीरे धीरे यह स्पष्ट होता जा रहा है कि अगर अब भी गुजरात सरकार इस ‘गुजरात गौरव’ के फर्जी लिफ़ाफ़े से बाहर नहीं निकली तो शेरों को बचाने की यह सफल कहानी भविष्य में बड़ी असफलता के लिए याद की जायेगी.

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