नई सरकार की सबसे बड़ी चुनौती क्या होगी?

0

उमंग कुमार/

भारत जैसे देश के लिए सही नीतियाँ बहुत ज़रूरी हैं. वजह यह कि जितने बड़े स्तर पर इन नीतियों का क्रियान्वयन होता है और व्यापक असर की उम्मीद की जाती है उसके लिए सही आंकड़ों का होना निहायत ही जरुरी है. अन्यथा नीति-निर्माता हवा में तीर चलाते रहेंगे और जनता जमीन पर संघर्ष करती रहेगी. इन मुद्दों के मद्देनज़र नई सरकार के पास अन्य चुनौतियों के साथ-साथ जो सबसे बड़ी चुनौती होगी, वह आकड़ो की विश्वसनीयता को पुनःस्थापित करना.

आधिकारिक आर्थिक आंकड़ो के आधार पर ही नीतियां बनाई जाती हैं. निवेशक निवेश करने को लेकर निर्णय लेते हैं और देश की अर्थव्यवस्था कैसी चल रही है इसका अनुमान भी लगाया जा सकता है. आंकड़ों की विश्वसनीयता को लेकर भारत अग्रणी देशों में शामिल रहा है क्योंकि हाल तक देश के अधिकारिक आंकड़े पारदर्शी होते थे और इनको तैयार करने की विधि दुनियाभर में सर्वमान्य होती थी.

लेकिन, वर्तमान सरकार में यह तस्वीर बदलती नज़र आ रही है. आंकड़े को लेकर हाल में सरकार और और विशेषज्ञों के बीच मतभेद के कारण विश्व समुदाय की नज़र में भी भारत के आंकड़े को लेकर विश्वसनीयता का संकट गहराया है. यह सब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शासनकाल के दौरान हुआ है. इस सरकार के आते ही सबसे पहले राष्ट्रीय आय की गणना के तरीके को बदल दिया गया. इसके साथ ही सरकार ने राष्ट्रीय आय की गणना के लिए इस्तेमाल हो रहे आधार वर्ष को भी बदल दिया. ऐसा इसलिए किया गया ताकि संशोधित आंकड़े में वृद्धि दर अधिक दिखे.

हाल ही में  NSSO ने पाया कि नए राष्ट्रीय विकास के आंकलन के लिए जो आंकड़े सरकार द्वारा प्रस्तुत किये गए उनमें से 36 फ़ीसदी कम्पनियां यह तो फर्जी थीं या उनका पता नहीं लगाया जा सकता था

इसके बचाव में यह तर्क दिया जा सकता है कि ऐसे बदलाव में कुछ गलत नहीं है. बात सही भी है लेकिन तब, जब देश दुनिया को इस परिवर्तन से सम्बंधित जरुरी तथ्य और बारीकियां समझाई जाए. पर ऐसा नहीं किया गया था.  यह दर्शाता है कि इस परिवर्तन के पीछे सरकार की नियत साफ़ नहीं थी. इनका मुख्य उद्देश्य बस अपने लोगों को यह दिखाना था कि देश बहुत तेजी से विकास कर रहा है. इसकी एक बानगी तब देखने को मिली जब सरकार ने राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण (NSSO) द्वारा तैयार की गई रिपोर्ट को प्रकाशित नहीं किया गया. ऐसा इसलिए कि इस रिपोर्ट में बताया गया था कि देश में बेरोजगारी अभी 45 वर्षों में सबसे अधिक है.

हाल ही में  NSSO ने पाया कि नई राष्ट्रीय विकास के आंकलन के लिए जो आंकड़े सरकार द्वारा प्रस्तुत किये गए उनमें 36 फ़ीसदी कम्पनियां यह तो फर्जी थीं या उनका पता नहीं लगाया जा सकता था. इस सरकार के अब तक के कार्यकाल को देखें तो यह सहज पता चलता है कि इनकी रूचि उन्हीं आकड़ों को प्रकाशित करने में है जिसमें सबकुछ अच्छा दिखाया गया हो. उसके लिए भले ही फर्जी आंकड़े इस्तेमाल किये जाएँ. अन्यथा ये आंकड़े को छिपा देते हैं. अगर ऐसे आंकड़े गलती से बाहर आ भी जाते हैं तो पूरा सरकारी महकमा उसपर प्रश्न खड़े करना शुरू कर देता है. इनमें प्रधानमंत्री से लेकर वित्तमंत्री, भारतीय जनता पार्टी और यहाँ तक नीति आयोग के अधिकारी तक शामिल होते हैं.

इसका नुकसान देश को उठाना पड़ेगा. अव्वल तो देश से उत्त्पन्न हो रहे आंकड़े की विश्वसनीयता घटेगी. बल्कि ऐसा हो चुका है और नई सरकार को इस विश्वसनीयता को पाने के लिए लागातार प्रयास करना पड़ेगा. दूसरे निवेशकों द्वारा अपना खुद का आंकड़ा रखने का रिवाज चल निकलेगा. सरकारी नीतियाँ गलत आंकड़े के आधार पर तैयार की जाएंगी और नतीजा यह होगा कि यह नीतियाँ प्रभावशाली नहीं रहेंगी.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here