मूर्ति और बुलेट ट्रेन बनाने से सरकारी खजाने पर बोझ नहीं बढ़ता, और गरीबों को देने से ?

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शिखा कौशिक/

देश के इस चुनावी मौसम में जब राहुल गाँधी ने ब्रह्मास्त्र छोड़ दिया है. इसके अनुसार अगर कांग्रेस चुनाव जीतकर आती है तो 20 फीसदी गरीबों को न्यूनतम आय के तौर पर 6 हज़ार रुपये प्रति महीने दिए जायेंगे. न्यूनतम आय योजना (न्याय) के नाम से घोषित इस नए चुनावी वादे के मुताबिक़ देश के सबसे गरीब 5 करोड़ परिवारों को 72 हज़ार रुपये सालाना दिया जाएगा.

इस घोषणा का असर ऐसा हुआ कि मुख्य प्रतिद्वंदी यानि भारतीय जनता पार्टी की तरफ से आधिकारिक वक्तव्य तक आ गया. इसमें वित्त मंत्री अरुण जेटली और नीति योग के राजीव कुमार तक को आगे आकर यह बोलना पड़ा कि इससे देश पर आर्थिक बोझ काफी बढ़ जाएगा.

क्या सच में आर्थिक बोझ बढ़ेगा?

अगर साधारण गणित लगाया जाए तो इस योजना से  सरकारी खजाने पर 3.6 लाख करोड़ रुपये का सालाना बोझ पड़ने का अनुमान है. हालांकि कांग्रेस ने स्पष्ट किया है कि यह टॉप अप स्कीम होगा. इसके मायने यह कि पहले इन लोगों के आमदनी का हिसाब किया जाएगा और अगर यह 12,000 से कम हुआ तो बाकी की रकम सरकार इन गरीबों के खाते में ट्रान्सफर करेगी.

बैंकिंग क्षेत्र से राजनीति में आए प्रवीण चक्रवर्ती जिन्होंने इस न्याय योजना की तैयारी में अहम् भूमिका अदा की है, उनका कहना है कि केंद्र और राज्य सरकार मिलकर तमाम योजनाओं पर 60 लाख करोड़ रुपये खर्च करती है. ऐसे में 3.6 लाख करोड़ रुपये अधिक नहीं होंगे, अगर कुछ योजनाओं को हटाकर न्याय योजना को लागू कर दिया जाए.

आलोचना में राजनीति ज़्यादा मुद्दा कम

जब से राहुल गाँधी ने इस योजना की घोषणा की है, लोग अलग-अलग तरह से इसकी आलोचना कर रहे हैं. ख़ासकर, भाजपा समर्थक. भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने भी हाल ही में किसानों को छः हज़ार रुपये सालाना देने की घोषणा की है. इस सरकार ने बुलेट ट्रेन, विशालकाय मूर्तियों पर भी खर्च करने में कोई संकोच नहीं किया, लेकिन अब जब गरीबों की बात हो रही है तो सरकारी खेमें को यह खर्च गैरजरूरी लग रहा है. आपको बताते चलें कि सरदार पटेल की मूर्ति जो कथित तौर पर अब विश्व की सबसे ऊँची मूर्ति है, वह 2,989 करोड़ रुपये की लागत से बनी है. वहीं बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट जिससे बमुश्किल 10,000 लोग लाभान्वित होंगे, का कुल खर्चा 1.1 लाख करोड़ रुपये है.

यह तब और महत्वपूर्ण हो जाता है जब भारत में आय असमानता व्यापक होती जा रही है. साल 2019 में सबसे अमीर एक प्रतिशत लोगों के आमदनी में 39 प्रतिशत बढ़ोत्तरी हुई है. इनलोगों के पास देश का कुल 51.53 प्रतिशत  पूँजी है.

बैंकिंग क्षेत्र से राजनीति में आए प्रवीण चक्रवर्ती जिन्होंने इस न्याय योजना की तैयारी में अहम् भूमिका अदा की है, उनका कहना है कि केंद्र और राज्य सरकार मिलकर तमाम योजनाओं पर 60 लाख करोड़ रुपये खर्च करती है. ऐसे में 3.6 लाख करोड़ रुपये अधिक नहीं होंगे, अगर कुछ योजनाओं को हटाकर न्याय योजना को लागू कर दिया जाए

नरेन्द्र मोदी का कार्यकाल ऐसा रहा जब कुछेक क्षेत्र से काफी आमदनी हुई लेकिन सरकार ने इस पैसे को गरीबों पर खर्च करना उचित नहीं समझा बल्कि वही मूर्ति और बुलेट ट्रेन जैसे कार्यों को प्राथमिकता दी. जैसे देश में अकेले कच्चे तेल से पिछले पांच साल में लगभग 6,71,272 करोड़ रुपये की आमदनी हुई. यह एक्साइज ड्यूटी से जमा किया गया. 2009-14 कच्चे तेल के अधिक दाम होने की वजह से सरकार को आमदनी की जगह घाटा हो रहा था. वर्तमान सरकार ने इस आमदनी का कोई सार्थक इस्तेमाल नहीं किया और गरीबी के स्तर में कोई सुधार नहीं हुआ.

यही नहीं, इसी सरकार के कार्यकाल के अन्दर अकेले 2017-18 में, भारतीय बैंकों ने कॉर्पोरेट का करीब 1.44 लाख करोड़ का ऋण माफ़ किया. इसके बावजूद भी किसी को भारतीय खजाने पर बढ़ता बोझ नहीं दिखा.

साल 2018-19 में, भारत ने शेयर, स्टॉक इत्यादि के माध्यम से PSU की सम्पति को बेचकर 85,000 करोड़ रुपये खजाने में जमा किया. अगर देखा जाए तो राष्ट्रीय परिसंपत्तियों पर पहला अधिकार गरीबों का है और अगर सरकार इन्हें बेचती है तो इससे आये पैसे पर सबसे पहला अधिकार इन सबसे कमजोर लोगों का होना चाहिए.

सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि देश में पहली बार ऐसे किसी समाधान की तरफ ध्यान राष्ट्रीय आर्थिक सर्वेक्षण 2016-17 में आकर्षित किया गया. यह नरेन्द्र मोदी सरकार के आर्थिक सलाहकार अरविन्द सुब्रमण्यम की तरफ से आया मशविरा था जिसमें उन्होंने कहा था कि अब समय आ गया है कि देश अगर न्यूनतम आय योजना की शुरुआत नहीं करता है तो कम से कम इसकी सम्भावना पर विचार जरुर करे. जब यह रिपोर्ट आई तो किसी ने इसकी भर्त्सना नहीं की कि इससे देश के खजाने पर बोझ बढेगा पर अब जब कांग्रेस ने इस मुद्दे को लपक लिया है तो भाजपा और सरकारी संस्था, जैसे, नीति आयोग तक भी विपरीत बयान दे रहे हैं.

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