तकनीकी निर्माता अब इसके बुरे प्रभाव को लेकर हो रहे लामबंद

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उमंग कुमार/

फेसबुक, ट्वीटर, गूगल और ऐसे तमाम तकनीकी ने इंसानी दुनिया पर गहरा प्रभाव डाला है. अच्छे और बुरे प्रभाव को लेकर विवाद रहा है. कुछ लोगों का कहना है कि इन तकनीकी प्लेटफार्म ने सुविधाओं को लोकतान्त्रिक बनाया है और अब यह सबके लिए उपलब्ध है. दूसरी तरफ एक तबके का कहना रहा है कि तकनीकी मनाव समाज के बुनियादी ढाँचे में ही परिवर्तन लाने लगा है. इस बात को तब और बल मिला जब इन बड़ी कंपनियों के पुराने कर्मचारी ही अब खुलकर आवाज उठाने लगे हैं.
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बीते दिसम्बर महीने में फेसबुक में काम करने वाले एक बड़े अधिकारी ने कहा कि यह कंपनी सामाजिक सरंचना को बुरी तरह से ध्वस्त कर रही है. इसके कुछ सप्ताह बाद ही फेसबुक ने भी इस सम्भावना को माना और कहा कि हो सकता है कि इस प्लेटफार्म की वजह से समाज पर नकारात्मक असर पड़ रहा हो.

अब अमेरीका के सिलिकॉन वैली में एक नया समूह तैयार हुआ है जो अपने ही द्वारा तैयार किये गए तकनीकी तंत्र के खिलाफ अभियान चला रहा है. इसके लिए इनलोगों ने बाकायदा एक संस्था बनाई है.

सिलिकॉन वैली में एक नया समूह तैयार हुआ है जो अपने ही द्वारा तैयार किये गए तकनीकी तंत्र के खिलाफ अभियान चला रहा है

इस समूह को अधिकारिक तौर पर चार जनवरी को स्थापित किया गया. इसको स्थापित करने वालो में गूगल, फेसबुक और मोज़िला के पूर्व कर्मचारी शामिल हैं. बतौर स्वयंसेवी संस्था, इसका मकसद है तकनीकी के सामाजिक ढाँचे पर पड़ने वाले बुरे प्रभाव के प्रति लोगों को जागरुक करना. इनलोगों का मानना है कि इस तकनीकी की लोगों का लत लग जाना स्वाभाविक है. और इसके बुरे प्रभाव के प्रति लोगों को सचेत किया जाना जरुरी है.

ये लोग आने वाले समय में अमेरिका में कानून भी बनवाना चाहते हैं और उसके लिए ये लोग लॉबी भी करेंगे. इनकी मांग है कि अमेरिका में एक ऐसा कानून बने जो इन नई तकनीकी का बच्चों के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले बुरे प्रभाव का अधिक से अधिक अध्ययन करे. इतना ही नहीं, इनकी यह भी मांग है कि इन तकनीकी का समाज पर कैसा प्रभाव पड़ रहा है, इसका भी अध्ययन हो.

इसके लिए इस संस्था के एक सदस्य एड मार्के ने एक कानून का खाका भी तैयार कर रखा है. इन्होंने इस विषय पर एक पुस्तक भी लिखी है.

इसके एक संस्थापक त्रिस्तान हर्रिस ने मीडिया से कहा कि सभी कंपनिया अधिक से अधिक मुनाफा के लिए इंसानों के निजी जीवन में प्रवेश कर रही हैं. इनका मुनाफा इस पर तय होता है कि ये हमारे दिमाग में किस हद तक प्रवेश कर सकती हैं और हमें अधिक से अधिक इस तकनीकी का इस्तेमाल करने के लिए प्रेरित कर सकती हैं.

हर्रिस पहले गूगल में भी काम कर चुके हैं और इस संस्था के बहुत बड़े आलोचक हैं. इन्होंने एक और संस्था बनायी है जिसका नाम है टाइम वेल स्पेंट और इसके जरिये एक अभियान छेड़ रखा है जिससे लोगों को यह बताते हैं कि अपने समय का बेहतर से बेहतर इस्तेमाल क्या हो सकता है.

धीरे-धीरे नए ज़माने के इन तकनीकी के बुरे प्रभाव पर अध्ययन आने लगे हैं. भारत में इसी सप्ताह आये एक सर्वेक्षण से यह बात सामने आई कि ऑनलाइन दुनिया में समय बिताने से लोगों के आपसी सम्बन्ध पर बुरा असर पड़ रहा है.
मैकेफे द्वारा किए गए इस अध्ययन में 67 फीसदी लोगों का मानना है कि उनका साथी उनसे ज्यादा इंटरनेट से जुड़े डिवाइसों में रुचि लेता/लेती है. छः सौ लोगों पर हुए इस सर्वेक्षण में 77 फ़ीसदी लोगों ने यह भी माना कि मोबाईल का उनके रिश्ते पर बुरा प्रभाव पड़ता है. इस सर्वेक्षण में 81 प्रतिशत लोगों ने माना कि मोबाईल पर अधिक समय देने से उनका उनके जीवनसाथी के साथ विवाद हो चुका है.

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