स्वप्ना बर्मन: इनसे मिलकर आपको कुछ बड़ा करने की प्रेरणा मिलेगी

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सौतुक डेस्क/

अमूमन हाथ या पैर में पांच के बजाये छः उंगलिया हो तो भारत में इसे भाग्यशाली होने का प्रमाण माना जाता है. जैसे बॉलीवुड के सितारे ऋतिक रोशन को ही देख लें. ऋतिक के लिए यह भाग्य, हो सकता है महसूसने में बहुत आसान रहा हो लेकिन पश्चिम बंगाल से आने वाली स्वप्ना बर्मन के लिए यह उतना आसान नहीं रहा. शायद इसलिए देश को इंडोनिशया में चल रहे एशियाई खेलों में स्वर्ण दिलाने वाली इस खिलाड़ी की पदक जीतने के बाद सबसे अधिक चर्चा उसके इस संघर्ष पर हो रही है. वह इस स्पर्धा में स्वर्ण जीतने वाली भारत की पहली महिला खिलाड़ी हैं.

अठारहवें एशियाई खेलों में हेप्टाथलॉन स्पर्धा में पदक जीतने वाली इस खिलाड़ी के दोनों पैरों में छः उंगलियाँ हैं लेकिन पैसों के अभाव में ये उन्हीं जूतों के साथ अभ्यास करती रहीं जो सामान्य, यानि पांच उंगली वाले पैरों के लिए बनते हैं. ये जूते इनके पैर के पंजो के मुताबिक़ नहीं होते थे. इनकी चौड़ाई कम होती थी. अब आप सोचिये कि ऐसे जूते पहनकर आपको दौड़ना पड़े तो कैसी पीड़ा होगी. स्वप्ना के घर वाले बताते हैं कि इसकी वजह से उन्हें कई प्रतिस्पर्धा से निकाल दिया गया. इन छः उँगलियों वाले पैरों की वजह से उन्हें काफी दिक्कत हुई.

स्वप्ना आर्थिक रुप से कमज़ोर परिवार से आती हैं. स्वप्ना के पिता रिक्शा चलाते थे. लेकिन 2013 में उन्हें अघात (स्ट्रोक) आया था. तब से वो बिस्तर पर पड़े हैं. फिलहाल, इनकी मां चाय बगान में काम करती हैं और इसी से इनके घर का गुजारा होता है.

इसी गरीबी की वजह से उन्होंने इन्हीं जूतों से काम चलाया. वैसे विशेषज्ञों की मानें तो पैरों में छह उंगलियां होने से आम जीवन में कोई ख़ास कठिनाई नहीं होती. पर एक खिलाड़ी के लिए जिसकी तैयारी में दौड़ना एक अभिन्न हिस्सा हो उसके लिए थोडा मुश्किल हो जाता है. स्वप्ना के लिए तो ये सफर कुछ ज्यादा ही मुश्किल भरा रहा.

स्वप्ना के पिता रिक्शा चलाते थे. लेकिन 2013 में उन्हें अघात (स्ट्रोक) आया था. तब से वो बिस्तर पर पड़े हैं.

जो भी हो इस महिला ने वह कर दिखाया जो पांच उंगली वाले भी आसानी से नहीं कर सकते. इतना ही नहीं एशियाई खेलों से ठीक तीन दिन पहले, स्वप्ना के दांतों का दर्द शुरू हुआ, जिससे इनके जबड़े में बहुत सूजन आ गयी. फिर आयोजन समिति से जुड़े डॉक्टरों से परामर्श किया गया, कम समय के कारण उन्हें एंटीबायोटिक्स  पर रखा गया.  इस दर्द से लड़ते हुए, उन्होंने अपने करियर का सबसे बड़ा पदक हासिल किया और एशियाई खेलों में स्वर्ण जीत कर न केवल अपना, अपने परिवार का बल्कि पूरे देश का नाम रौशन किया.

उनके स्वर्ण पदक जीतने की खबर आते ही स्वप्ना के घर पर बधाई देने वालों का ताँता लग गया. स्वप्ना के परिवार वालों ने मीडिया को बताया है कि स्वप्ना को दौड़ने में कभी कोई दिक्कत नहीं हुई. लेकिन दूकान में उनके पैर के नाप के जूते मिलते ही नहीं थे. अपने नाप के जूते खरीदने पर पंजो पर दबाव पड़ता था. इनके अनुसार स्वप्ना को भारी दिक्कत का सामना करना पड़ा. ट्रेनिंग से लेकर गेम तक, कई बार जूतों की वजह से वो चुनी नहीं जाती थी. फिर घरवालों ने कई डॉक्टरों से सलाह-मशविरा भी किया पर जहां जूते के पैसे नहीं थे वहाँ महँगी सर्जरी की बात ही बेमानी है.

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