नाबालिग पत्नी के साथ सेक्स अब बलात्कार की श्रेणी में: सर्वोच्च न्यायालय

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सौतुक डेस्क/ 

अन्तर्रष्ट्रीय कन्या दिवस पर सर्वोच्च न्यायालय ने देश की महिलाओं को बड़ा तोहफा दिया. सर्वोच्च न्यायलय ने बुधवार को दिए अपने फैसले में कहा कि किसी भी पुरुष का अपनी 18 वर्ष या उससे कम उम्र की पत्नी के साथ यौन सम्बन्ध बनाना अब बलात्कार के श्रेणी में रखा जाएगा. यह फैसला इंडिपेंडेंट थॉट नामक एक एनजीओ द्वारा दायर याचिका पर आया है. इस एनजीओ ने उस बलात्कार पर बने क़ानून को चुनौती दी थी जो किसी भी व्यक्ति को अपने 15 वर्ष की उम्र से अधिक की पत्नी के साथ यौन सम्बन्ध बनाने की  इजाज़त देता है, तब जबकि आपसी सहमति की तय उम्र सीमा 18 वर्ष है. सौतुक के लिए यह खुशी की बात है कि आज ही के दिन सौतुक ने सुबह-सुबह इस मामले पर एक लेख प्रकाशित किया था . देखिये उस लेख में हमने इस मुद्दे पर प्रकाश डाला था.

अक्टूबर के पहले सप्ताह में भारत के मानवाधिकार के सुरक्षा की स्थिति की चर्चा संयुक्त राष्ट्र राईट काउंसिल में हुई. इसके जेनेवा कार्यालय में इस समीक्षा में अन्य मुद्दों के साथ महिलाओं के स्वास्थ्य खासकर हिंसा, वैवाहिक जीवन के अन्दर ही बलात्कार (मैरिटल रेप) इत्यादि पर भारत सरकार के प्रयास की खिंचाई हुई.

इसके सब के लगभग महीने भर पहले भारत सरकार ने सर्वोच्च न्यायलय में एक हलफनामा दायर करते हुए कहा कि शादी में बलात्कार जैसी घटना को अपराध की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता. इससे शादी नामक संस्था खतरे में पड़ सकती है और इसे पतियों के प्रताड़ना का हथियार बनाया जा सकता है.  केंद्र सरकार ने यह हलफनामा एक केस की सुनवाई के दरम्यान दायर किया जिसमें शादी के बाद भी जबरदस्ती सम्बन्ध बनाने को बलात्कार की श्रेणी में रखने की मांग की जा रही थी. इस मामले की सुनवाई अभी भी लंबित है.

इतनी बड़ी संख्या में जिस देश में बाल विवाह हो रहे हों वहाँ सरकार से इस तरह के जवाब की अपेक्षा नहीं की जाती है.

पापुलेशन फाउंडेशन ऑफ़ इंडिया की कार्यकारी  निदेशक पूनम मुर्तजा का कहना है कि तकरीबन 40 प्रतिशत से अधिक महिलाएं किसी न किसी तरह की घरेलू हिंसा का शिकार होती हैं. खासकर, कम उम्र (15-19 साल) में ब्याही लड़कियों के बारे में तो ये आंकड़े डराने वाले हैं. कई राज्यों में 70 प्रतिशत से अधिक महिलायें जिनकी शादी कम उम्र में कर दी जाती हैं, उनके साथ शारीरिक हिंसा होती है. मुर्तजा ने ये आंकड़े तीसरे राष्ट्रीय परिवार स्वास्थय सर्वेक्षण से लिए हैं जो 2006 में आया था.

सनद रहे कि धारा 375 बलात्कार को परिभाषित करता है. लेकिन यह पति के द्वारा जबरदस्ती शारीरिक संबंध बनाना या किसी और तरह की जबरदस्ती करने को बलात्कार में शामिल नहीं करता. खासकर पंद्रह साल और उससे बड़ी उम्र की महिलाओं के साथ. इसके मद्देनजर अगर उन लड़कियों की संख्या देखी जाए जिनकी शादी अभी भी कम उम्र में कर दी जाती है तो यह अनुमान आसानी से लगाया जा सकता है कि कितनी बड़ी संख्या है जो शारीरिक और मानसिक हिंसा के हिसाब से असुरक्षित है.

इस संस्था का कहना है कि महिलाओं के अधिकार को सुरक्षित करने के लिए सर्वोच्च न्यायलय को इस समस्या को मानना चाहिए कि बहुत बड़ी संख्या में महिलाएं डरी सहमी अपना जीवन काट रही हैं. सर्वोच्च न्यायलय अगर इसको ज़रूरी कानूनी सुरक्षा नहीं देता है तो इससे पतियों को नाबालिग पत्नियों के साथ मनमानी करने की छूट मिलेगी, हौसला बढ़ेगा.

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