जुझारूपन की मिसाल: वर्ल्ड वेटलिफ्टिंग चैम्पियन सैखोम मीराबाई चानू

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शिखा कौशिक/

लड़ना, गिरना, संभालना और फिर से भिड़कर लक्ष्य को हासिल करना क्या होता है यह सैखोम मीराबाई चानू से बेहतर कौन बता सकता है. इस लड़की ने  बृहस्पतिवार को वर्ल्ड वेटलिफ्टिंग चैम्पियनशिप में स्वर्ण जीतकर देश का नाम रौशन किया. यह वही चानू हैं जिन्होंने हाल ही में अपने पिता से इस शर्त पर इम्फाल में रहकर ट्रेनिंग लेने की छूट मांगी कि अगर उनको रियो में होने वाले ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधत्व करने का मौका नहीं मिला तो वह इस खेल से ही तौबा कर लेंगी. यह पिछले साल की बात है.

उसी 48 किलोग्राम की सैखोम मीराबाई चानू ने बृहस्पतिवार को अपने वजन से करीब चार गुना वजन यानि 194 किलोग्राम वजन उठाकर वर्ल्ड वेटलिफ्टिंग चैम्पियनशिप में स्वर्ण पदक जीत लिया. इसके साथ ही सैखोम यह उपलब्धि हासिल करने वाली भारत की दूसरी महिला बन गईं. इसके पहले कर्णम मल्लेश्वरी ने 1994 और 1995 में विश्व चैंपियनशिप जीता था जिस साल सैखोम (1994) का जन्म हुआ था.

तब से अब तक इस प्रतियोगिता में भारत के लिए स्वर्ण पदक का टोटा ही रहा. करीब 22 साल के लम्बे अंतराल के बाद मणिपुर की रहने वाली सैखोम भारत को पुनः इस श्रेणी में विश्व चैम्पियन बनाया. इसके बाद उनको राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री समेत बधाई देने वालों का तांता लगा गया.

सैखोम का जीवन बहुत उतार-चढ़ाव भरा रहा है. वर्ष 2014 में ग्लासगो में होने वाले कॉमनवेल्थ गेम में 48 किलो वजन वाले श्रेणी में इन्होंने रजत पदक जीता था. तब वह अपने ही राज्य की खुमुकचम् संजीता से  पिछड़ गयी थीं जिसने वहाँ स्वर्ण जीता.

उसके बाद सैखोम मीराबाई ने रियो में 2016 में होने वाले ओलंपिक में क्वालीफाई किया था, जिससे उनका खेल का करियर बचा पाया.  अलबत्ता ओलंपिक में वह अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाईं थीं.

वर्ष 2004 में ओलंपिक में कुंजरानी देवी को टीवी पर पदक लेते हुए इस लड़की ने देखा और तय किया कि एकदिन वह भी इसी तरह पोडियम पर खड़ी होकर पदक लेगी

हुआ यह था कि सैखोम रियो में अच्छा प्रदर्शन करने के लिए इम्फाल में रहकर तैयारी करना चाहती थी पर उनके परिवार पर यह खर्च भारी पड़ने वाला था. सैखोम मीराबाई भी पीछे नहीं हट रही थीं. उनके पिता ने उनसे स्पष्ट कर दिया था कि अगर वह ओलंपिक के लिए क्वालीफाई नहीं करती हैं तो उनको इस खेल से हमेशा के लिए तौबा करना होगा.

सैखोम बताती हैं कि उनके पास और कोई चारा भी नहीं था. एक तरफ घर की आर्थिक तंगी थी तो दूसरी तरफ उनका ओलंपिक में खेलने का सपना था. उन्होंने शर्त स्वीकार की और जी-जान से तैयारी में लग गयीं और ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व करने के लिए चुन ली गयीं.

उनके परिवार की माली हालत का अंदाजा ऐसे लगाया जा सकता है कि खेल के लिए जो जरुरी भोजन उन्हें सुझाया गया था जैसे दूध, अंडा, चिकेन इत्यादि वो भी उनको नहीं मिल पाता था. प्रैक्टिस करने के लिए भी उनको रोज मीलों साईकिल से यात्रा करनी होती थी. इसलिए वह इम्फाल में रहना चाहती थीं.

महज नौ साल की उम्र में ही इस लड़की ने खेल को अपने जीवन का हिस्सा बनाने का सपना देख लिया. वर्ष 2004 में ओलंपिक में कुंजरानी देवी को टीवी पर पदक लेते हुए इस लड़की ने देखा और तय किया कि एकदिन वह भी इसी तरह पोडियम पर खड़ी होकर पदक लेगी.

उनका संघर्ष शुरू हुआ ट्रेनिंग के लिए साईकिल चलाकर दूर तक जाने से. शुरूआती छः महीने तक सैखोम मीराबाई को लोहा उठाने ही नहीं दिया गया. इन छः महीनों में उन्हें बांस उठाने को कहा जाता था. घर की माली हालत के बावजूद इस लड़की ने संघर्ष जारी रखा क्योंकि उसका मानना था कि यह एक दौर है जो गुजर जाएगा.

ग्यारह साल की अवस्था में ही उन्होंने सब-जूनियर लेवल की प्रतियोगिता में स्वर्ण जीता. वर्ष 2011 में उन्होंने जूनियर लेवल पर भी स्वर्ण जीता. उसके बाद से इस जुझारू खिलाड़ी ने वापस मुड़कर नहीं देखा और आज इसने अपने पूरे देश को गौरवान्वित किया.

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