इस चुनाव ग्रामीण जनता बनेगी भाग्य विधाता!

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शिखा कौशिक/

दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक उत्सव का दिन तय हो चुका है और भारत के आम चुनाव (2019) में लगभग 90 करोड़ (900 मिलियन) मतदाता भाग लेंगे. प्रमुख चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा ने 10 मार्च, 2019 को आम चुनाव के तारीख़ की घोषणा की थी.

इस चुनाव में बहुत कुछ दांव पर है. दोनों खेमा जिसमें सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन जिसकी सबसे बड़ी पार्टी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भारतीय जनता पार्टी है और विपक्षी दलों का गुट, जिसमें सबसे बड़ा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस है, बहुत कुछ दाव पर लगाने वाले हैं.

यूं तो 14 फरवरी को पुलवामा में हुए आतंकी हमले और कभी सर्जिकल स्ट्राइक मुख्य मुद्दा बनता दिख रहा है पर वास्तविकता में ये मुद्दे शायद ही मतदाता को प्रभावित करेंगे.  इस मौके पर हम इस सप्ताह आपको उन मुद्दों से अवगत करायेंगे जो इस चुनाव में राजनीतिक दलों के भाग्य तय करने वाले हैं.

गाँव तय करेगा राजनीति की दिशा

आज़ादी के बाद से राजनेता और राजनीति ने हमेशा शहरीकरण को ही बढ़ावा दिया है. आर्थिक उदारीकरण यानि सन् 1991 के बाद से तो यह लगभग अघोषित सत्य है. शहर और विकास. विकास और सुविधाओं का मतलब शहर और यहाँ का जीवन.

उधर गाँव में किसान आत्महत्या करते रहे.. कृषि में आने वाली लागत बढ़ती रही और किसानों को उनके फसलों का दाम मिलना कम होता गया. शिक्षा और स्वास्थ्य के लिए ग्रामीण संघर्ष करते रहे. व्यवस्था से नज़रअंदाज किये गए ग्रामीण युवा शहरों की तरफ रोजगार की तलाश में भागते रहे. इसकी वजह से शहरों में जनसँख्या विस्फोट हुआ. फिर भी गाँव के जनसँख्या अभी भी शहरों के मुकाबले काफी अधिक है.

साल 2011 की जनगणना के अनुसार 68.84 प्रतिशत भारतीय गांवों में ही रहते हैं. और अगर ग्रामीण जनता चाह ले तो किसी भी पार्टी का भविष्य बदल सकती है

फिर भी, 2011 की जनगणना के अनुसार 68.84 प्रतिशत भारतीय गांवों में ही रहते हैं. और अगर ग्रामीण जनता चाह ले तो किसी भी पार्टी का भविष्य बदल सकती है.

गुजरात के विधान सभा चुनाव में ग्रामीणों ने भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ मतदान किया था और वहाँ भी इस दल को सत्ता की चाभी पाने में पसीने आ गए. भाजपा वहाँ बाल-बाल इस लिए बच पायी क्योंकि गुजरात में शहरी लोगों की जनसँख्या ग्रामीणों से अधिक है.

तब से भाजपा की जो गाड़ी उतरी वापस पटरी पर नहीं आ पायी है. मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ का चुनावी नतीजा भी देख लें. इन राज्यों में ग्रामीण जनसँख्या अधिक है और अजेय लगती भाजपा को इन राज्यों में हार का सामना करना पड़ा.

इसलिए यह स्पष्ट है कि इस बार केंद्र में सत्ता की चाभी ग्रामीणों के ही पास है. देखना है कि यह किसे मिलती है!

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