रोहिंग्या समुदाय:बड़े स्तर पर पलायन और राजनीति

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Credit- MintPress News

उमंग कुमार/

बुधवार को शान्ति के लिए नोबेल पुरस्कार से सम्मानित आंग सान सू की ने अपनी चुप्पी तोड़ते हुए रोहिंग्या समुदाय के बड़ी संख्या में हो रहे पलायन पर कहा कि हमारा देश मानवाधिकार के प्रति सचेत है. सनद रहे कि पिछले दो सप्ताह में लगभग पौने दो लाख लोग म्यांमार से सटे बांग्लादेश में पलायन कर चुके हैं और तमाम अंतर्राष्ट्रीय आलोचना के बाद भी सू की खामोश रहीं थीं.

फेसबुक पर अपना बयान जारी करते हुए म्यांमार की सबसे ताकतवर नेता सू की ने कहा कि सरकार लोगों की सुरक्षा के लिए अपने बूते जितना कर सकती है वो कर रही है.

मानवाधिकार की लड़ाई के लिए जानी जाने वाली इस नेता की लम्बे समय तक इस मुद्दे पर चुप्पी को लेकर लोग सवाल खड़े कर रहे थे. कुछ लोगों ने तो उनसे उनका नोबेल छीन लेने तक की सलाह दे डाली थी.

अपने बयान में उन्होंने कहा कि उनके देश के लोग बहुत अच्छी तरह जानते हैं कि जब मानवाधिकार का हनन होता है तो कैसा लगता है. इसलिए उनका देश इस बात की पूरी कोशिश कर रहा है कि सारे नागरिकों के अधिकारों की सुरक्षा हो.

उनका बयान ऐसे समय में आया है जब अगस्त 25 से रोहिंग्या समाज के लगभग 15,000 लोग रोज पड़ोसी देश बांग्लादेश में पलायन कर रहे हैं. ऐसा रखिने स्टेट में हुई हाल की हिंसक घटनाओं की वजह से हो रहा है. ये आंकड़े रिफ्यूजी पर काम करने वाली संयुक्त राष्ट्र की एक संस्था ने जारी किये हैं.

हाल की घटनाएँ करीब 12 दिन पहले शुरू हुईं जब रोहिंग्या विद्रोही और सेना के बीच संघर्ष शुरू हुआ जिसमें कम से कम 400 लोग मारे गए हैं. इसके बाद इस समुदाय के लोग पलायन करने लगे.

एक तरफ सेना इस एक प्रतिशत से भी कम जनसँख्या वाले समुदाय पर आरोप लगाती है कि ये अन्य धर्म के लोगों को परेशान करते हैं तो दूसरी तरफ रोहिंग्या समाज के लोग और  मानवाधिकार कार्यकर्ता सेना पर इस समुदाय के साथ अत्याचार करने का आरोप लगा रहे हैं.  

भारत में भी रोहिंग्या को लेकर है विवाद

भारत के प्रधानमंत्री बुधवार को म्यांमार में थे जहां उन्होंने रखिने स्टेट में विकास के कई  उपक्रम स्थापित करने का प्रस्ताव दिए. इस राज्य में रोहिंग्या समुदाय और सेना के बीच गोरिल्ला संघर्ष चल रहा है.

प्रधानमंत्री ने ‘चरमपंथी हिंसा’ पर चिंता जताई पर उन्होंने अल्पसंख्यक समुदाय पर हो रही हिंसा के बारे में कुछ नहीं कहा. इसी समस्या पर सयुंक्त राष्ट्र तक को कहना पड़ा है कि अगर अल्पसंख्यक समुदाय पर हो रहे अत्याचार नहीं रुके तो यह  बहुत बड़ी समस्या बन कर उभरेगा.

भारत के रुख का पता इससे भी लगाया जा सकता है कि एक तरफ यह रखिने राज्य में विकास के उद्यम स्थापित करना चाहता है और दूसरी तरफ मोदी सरकार ने पिछले महीने लगभग 40 हजार रोहिंग्या समुदाय के लोगों को वापस अपने मुल्क भेजने का निर्णय लिया है. ये लोग पिछले कुछ सालों में भारत में आ गए थे.

इन विस्थापितों के भारत में रहने को लेकर याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मोदी सरकार से 11 सितम्बर तक अपना रुख स्पष्ट करने को कहा है. यह आदेश सोमवार को आया जिसमे न्यायलय ने केंद्र सरकार से विस्तृत ब्यौरा देने को कहा है कि सरकार इन लोगों को क्यों देश से बाहर करना चाहती है.

मीडिया में आ रही खबरों के अनुसार, गृह मंत्रालय ने अगस्त में सभी राज्यों को पत्र लिखकर रोहिंग्या समुदाय के उन सभी लोगों को पहचान कर बाहर करने का आदेश दिया जो देश में अवैध रूप से रह रहे हैं.

सितम्बर 1 को सर्वोच्च न्यायलय इन विस्थापितों के याचिका पर सुनवाई को तैयार हुआ था.

 

 

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