योगेन्द्र यादव की नोटा दबाने की अपील और इसके खतरनाक पहलू

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शिखा कौशिक/

स्वराज इंडिया के राष्ट्रीय अध्यक्ष योगेंद्र यादव ने बीते शनिवार को दिल्ली के लोगों से ‘उपरोक्त में से कोई नहीं’ जिसे प्रचलित शब्दों में ‘NOTA (None of the above)’ कहते हैं दबाने की अपील की. बड़ी संख्या में लोगों ने, इस तरह की अपील करने के लिए योगेन्द्र यादव की भर्त्सना की.

देश में लोकसभा का चुनाव चल रहा है और तीन चरण के चुनाव संपन्न हो चुके हैं. दिल्ली में 12 मई को मतदान होना है और नामांकन की आखिरी तारीख 23 अप्रैल को समाप्त हुई. इसी मतदान के मद्देनज़र यादव ने कहा कि सभी तीन प्रमुख दल अपने किये गए वादों पर खरे नहीं उतरे हैं इसलिए दिल्ली वासियों को NOTA का बटन दबाकर अपनी नाराजगी दर्ज करनी चाहिए.

कई लोगों ने इस वक्तव्य को लेकर यादव की समझ पर सवाल खड़ा किया. जैसे वरिष्ठ पत्रकार जितेन्द्र कुमार ने फेसबुक पर लिखा “क्या किसी राजनीतिक पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष इतना ग़ैरराजनीतिक हो सकता है? निजी हताशा या विरोध ने योगेन्द्र यादव को इतना विचलित कर दिया है कि वह लोकतंत्र और समाज को बचाने के बदले नोटा पर वोट देने की अपील कर रहे हैं! धन्य हैं महाराज…मैं तो सबसे यही अपील करूँगा कि चाहे जितनी भी नाराज़गी हो, बीजेपी और उसके सहयोगियों को हराने के लिए छोटे-मोटे दुश्मनी को भूला दें और उसे हर हाल में हराएँ! देश-समाज रहेगा तो निजी दुश्मनी बाद में भी निपटा ली जाएगी.”

इसी तरह, ट्वीटर पर महात्मा गाँधी के परपोते तुषार गांधी ने अपील की कि जब देश ख़ास चौराहे पर खड़ा है तो नोटा दबाकर कृपया अपने मत बर्बाद न करें. बल्कि अधिक से अधिक संख्या में जाकर अच्छे उम्मीदवार को जिताने का हरसंभव प्रयास करें.

क्या है नोटा?

भारतीयों को साल 2013 में पहली बार मतदान करने के बावजूद किसी उम्मीदवार को नहीं चुनने का अधिकार दिया गया था. तब से नोटा के इस प्रावधान का इस्तेमाल दो आम चुनावों (2019 के आम चुनावों सहित) और 42 विधान सभा चुनावों (वर्तमान आम चुनावों के साथ-साथ होने वाले चुनावों सहित) में किया जा चुका है. एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स के एक विश्लेषण के अनुसार, 2013 और 2017 के दौरान, 1.33 करोड़ लोगों ने विभिन्न चुनावों में इस विकल्प का उपयोग किया है. वर्ष 2014 में हुए लोकसभा चुनाव में साठ लाख लोगों ने इस अधिकार का उपयोग किया था.

सर्वोच्च न्यायालय ने भारतीय मतदाताओं को यह अधिकार देते हुए कहा था कि एक व्यक्ति की ऐसी भी इच्छा हो सकती है. ऐसा करते हुए न्यायालय का तर्क था कि इससे मतदान में लोगों की भागीदारी बढ़ेगी.

एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स के एक विश्लेषण के अनुसार, 2013 और 2017 के दौरान, 1.33 करोड़ लोगों ने विभिन्न चुनावों में इस विकल्प का प्रयोग किया है. वर्ष 2014 में हुए लोकसभा चुनाव में साठ लाख लोगों ने इस अधिकार का उपयोग किया था

ह्यूस्टन विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए एक विश्लेषण से ऐसा होता भी दिखा है. इसके अनुसार 2006 और 2014 के बीच NOTA की वजह से मतदान में 1.2 प्रतिशत की वृद्धि हुई. अलबत्ता भारत में ऐसा कोई अध्ययन नहीं हुआ है जिससे यह बात साबित होती हो कि इस नोटा के आने के बाद से लोगों का मतदान के प्रति रुझान बढ़ा है.

दुसरे यह भी कि नोटा से उम्मीदवारों के भविष्य पर कोई असर नहीं होता. भारतीय चुनाव पद्धति के अनुसार जिसको सबसे अधिक मत प्राप्त हुए हों वही विजयी घोषित होता है. ऐसे में योगेन्द्र यादव जैसे लोग जो किसी राजनितिक दल के मुखिया भी हों, अगर वही लोग नोटा को बढ़ावा देने लगें तो पूरी चुनावी प्रक्रिया को नुकसान होगा.

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