चट्टान सरीखी हुकूमतों के सामने खड़े कुछ मासूम फूल

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बोधिसत्व विवेक/

विवेक

बीते कुछ दिनों से इस 17 साल की लड़की की तस्वीर ने इन्टरनेट पर सनसनी फैला रखी  है और लाखो लोग इसे देखने और शेयर करने के साथ साथ ऐसे ही मासूम और निर्भीक प्रदर्शनकारियों को याद कर रहे हैं जिनकी तस्वीरे आज तक प्रेरणा स्त्रोत बनी हुई हैं.

ओल्गा मिसिक नाम की ये छात्रा उन 1000 लोगों में से एक है जो मोस्को में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की तानाशाही के खिलाफ प्रदर्शन करते हुए गिरफ्तार किये गए. पुतिन पर ये आरोप है की उन्होंने सितंबर में आने वाले चुनावो के पहले विरोधी दलों के नेताओं के चुनाव लड़ने पर प्रतिबन्ध लगा दिया है. पिछले 18 सालों से पुतिन राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री बनते हुए लगातार रूस पर निरकुंश शासन कर रहे हैं और लोकतान्त्रिक प्रक्रियाएं महज एक औपचारिकता बनकर रह गयी हैं.

राजनीतिक स्वंत्रतता और पारदर्शिता की मांग करते इन प्रदर्शनकारियो का सामना हथियारों से लैस पुलिस से हुआ और अचानक एक कम उम्र की लड़की उनके सामने जमीन पर पालथी मार बैठ गयी, उसके हाथ में रूस का संविधान था और वो जोर-जोर से उसे पढ़ने लगी कि संविधान के आर्टिकिल 31 के अनुसार शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना उनका हक है और हिंसा से इसे रोके जाना नाजायज है.

अचानक सबका ध्यान उस पर गया और अगले ही पल सब उसे ध्यान से सुनने लगे और तस्वीरें खीचने लगे. पुलिस भी इस तरह के विरोध के लिए तैयार नहीं थी इसलिए सब के सब हैरत से ये सब देखते रहे. बाद में ओल्गा को गिरफ्तार किया गया और कुछ समय बाद रिहा किया गया लेकिन तब तक वो बहुत मशहूर हो चुकी थी.

बाद में ओल्गा मिसिक ने मीडिया से कहा – मैं सिर्फ अपने संवैधानिक अधिकार बता रही थी और ये भी कि वहां जो कुछ भी किया जा रहा है वो गैरकानूनी हैं. अन्याय सभी के लिए चिंता का विषय है. आज ये मोस्को में हो रहा है तो कुछ ही समय में ये हर जगह होगा !

ओल्गा के पिता खुद व्लादिमीर पुतिन के बहुत बड़े समर्थक हैं लेकिन परिवार के जबरदस्त विरोध के बावजूद वो ऐसे प्रदर्शन में हिस्सा लेती हैं. उनके कम उम्र के होने के कारण इस गिरफ़्तारी के कुछ समय बाद उन्हें उनकी माँ को सौप दिया गया. वो कहती हैं –“मेरी माँ भी मेरे विरोध में हैं क्योकि वो किसी बुरे अंजाम से डरती हैं और मेरे पिता तो पुतिन और स्टालिन से बहुत ही प्यार करते हैं. उन्हें लगता है कि वो दोनों सबसे अच्छे शासक थे और मेरे जैसे प्रदर्शनकारियों से वो नफरत करते हैं. लेकिन मैं इस मामले में अपने माँ-बाप की बात नहीं मान सकती क्योकि न्याय ज्यादा जरुरी है.”

ओल्गा मिसिक पत्रकारिता की पढ़ाई करके राजनीति और मानवाधिकार के बारे में लिखना चाहती हैं. इसमें कोई संदेह नहीं की आज की तारीख में वो हजारो युवाओं की हीरो बन चुकी हैं और साथ ही साथ उनकी तस्वीरे लोगो को याद दिला रही हैं इतिहास में दर्ज कुछ ऐसे ही निर्भीक और शांतिपूर्ण विरोध की तस्वीरें खासकर चीन के उस युवा की जिसे टैंक-मैन के नाम से जाना जाता है.

1989 में चीन के बीजिंग शहर में लोकतंत्र की मांग कर रहे दस हजार युवाओं की निर्मम हत्या कर दी गयी थी. इस घटना को ‘तियान्नमेन स्कवायर नरसंहार’ के नाम से जाना जाता है. कम्युनिस्ट सरकार के इस क्रूर हत्याकांड के बाद सड़क पर पड़ी लाशो को बुलडोजर से हटाया गया. वहाँ फैले हुए खून को गटर में बहा दिया गया. अगले दिन जब सेना के टैंक वापस लौट रहे थे तो अचानक एक 19 साल का नौजवान उनके ठीक सामने रास्ता रोक कर चुपचाप खड़ा हो गया. उसके हाथों में दो शोपिंग बैग थे और जब टैंक चालक ने अपना रास्ता बदलना चाहा तो उसने फिर सामने खड़े होके रास्ता रोक लिया. टैंको की पूरी कतार रुक गयी और आसपास की इमारतों से चुपके से कई पत्रकारों ने इस घटना की फोटो ले ली. कुछ समय बाद उस नौजवान को जबरदस्ती रास्ते से हटा दिया गया और उसके बाद उसका क्या हुआ किसी को पता नहीं.

ये तस्वीरे दुनिया के सामने न आ पायें इसलिए सभी फोटोग्राफरों के यहाँ छापा मारा गया और फिल्म रील जब्त की गयी, लेकिन साहसी फोटोग्राफरों ने टॉयलेट में छिपाकर इसे बचाया और चाय के डब्बे में डालकर चीन से बाहर भेजने में सफल हुए. आज ये तस्वीर दमन के विरोध में खड़े साहस का प्रतीक हैं.

ऐसी ही एक तस्वीर जो ‘फ्लावर-पावर’ के नाम से मशहूर है, 1967 में खीची गयी थी जब अमेरिका में वियतनाम-युद्ध का विरोध करते हुए प्रदर्शनकारी पेंटागन की ओर जा रहे थे और उन्हें रोकने ले लिए पुलिस हथियार लिए सामने थी. अचानक भीड़ से एक युवा निकला, उसके हाथ में फूलो का गुच्छा था और वो एक-एक करके सभी फूलो को डंडियों उसकी ओर तनी हुई रायफल्स की नलियों में लगाने लगा. इसकी तस्वीर वाशिगटन स्टार न्यूज़पेपर के बर्नी बोस्टन ले ली और बाद में ये इतनी मशहूर और प्रभावशाली साबित हुई कि इसे पुलित्ज़र पुरूस्कार के लिए नामित भी किया गया. विरोध करने के इस तरीके ने बड़ा स्वरुप ले लिया, इस पर चर्चा हुई और सैकड़ो लेख लिखे गए. वियतनाम युद्ध के विरोध में फ्लावर-पावर अभियान ही शुरू हो गया.

ये तस्वीरे निश्चित ही ये प्रेरणा देती हैं की किसी भी हिंसा का सशक्त विरोध वैसी ही हिंसा से ही हो सकता है ये जरुरी नहीं. जब कोई साहस और अहिंसा के साथ अन्याय का विरोध करता है, तब उसका प्रभाव सिर्फ उस क्षण तक सीमित नहीं रहता बल्कि आने वाले दशको तक इतना प्रेरित करता है कि उससे बड़ी से बड़ी हुकूमतें घबरा जाती हैं. बंदूकें और बम बहुत जल्दी बुझ जाते हैं, किताबें और फूल हमेशा खिले रहते हैं !

पाब्लो नेरुदा ने एक बार कहा था कि आप सारे फूल तोड़ सकते हैं लेकिन वसंत को आने से नहीं रोक सकते!

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(काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से समाजकार्य की शिक्षा पूरी कर विवेक आजकल दिल्ली में रहते हैंविवेक एम्स होस्पिटल में कार्यरत है और भारत में नॉन वायलेंट कम्युनिकेशन के कौशल को विकसित करके प्रसार करने पर भी कार्य कर रहे हैं. बच्चो और युवाओ के साथ और उनके लिए काम करना इन्हें बेहद पसंद है और ये वाराणसी में 15 वर्षो से बच्चो के लिए कार्य कर रही कुटुम्ब संस्था के संस्थापक सदस्यों में से एक हैं. आप सामजिक मुद्दोंसाहित्य और सिनेमा से गहरा जुड़ाव रखते हैंइनसे मोबाईल नंबर 9999024748 पर संपर्क किया जा सकता है)

2 COMMENTS

  1. Bahut khoob, actually iss lekh Ko padhte hue me ek baat soch Raha tha ki, aap kitni mehnat se or kitna samay nikaal k ye sab jankari jutate ho, ye bahut sarahniye h, uske sath sath aapka ye baat Ko rakhne ka Jo tarika h wo bahut hi prabhavshali h, padhte hue ye sochta hu aksar khatam to nahi hone wala h…….shaanti har samashya ka samadhaan h, bas sacchai ho usme….. shukriya

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