प्राइड मंथ: भारत में एलजीबीटी समुदाय का संघर्ष जारी है

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एलजीबीटी समुदाय के लोग लखनऊ में प्रदर्शन करते हुए

उमंग कुमार/

एलजीबीटीक्यूआई (लेस्बियन, गे, बाइसेक्सुअल, ट्रांसजेंडर, क्वीर और इंटरसैक्स) समुदाय के लिए ख़ास महीना है. यह समुदाय इसे प्राइड मंथ के तौर पर मनाता है. ऐसा इसलिए क्योंकि 1969 में पहली बार इस समुदाय के लोगों ने अपने अधिकारों के लिए आन्दोलन किया था.

अमेरिका में सामान्य पुलिस के विरोध से शुरू हुआ यह आन्दोलन नागरिक स्वतंत्रता के आन्दोलन में तब्दील हो गया था.

इसकी कहानी कुछ ऐसी है. वर्ष 1969 के 28 जून को न्यू यॉर्क पुलिस ने एक गे बार पर छापा डाला. कहने को सुरक्षा अधिकारी यह कहते रहे कि इस बार में अवैध शराब बेचा जा रहा था पर वास्तविक वजह यही थी कि पुलिस ऐसी ही किसी बहाने से गे बार इत्यादि को निशाना बनाने लगी थी. उस दिन जब पुलिस ने एक शख्स (गे) को अपनी गाड़ी में बैठाया तो उस बार में मौजूद लोगों ने हमला कर दिया. स्थिति को नियंत्रित करने के लिए सुरक्षा बल बुलाये गए. हिंसा की घटना गली-मुहल्लों से फैलते हुए पूरे शहर में फ़ैल गई और धीरे धीरे यह आन्दोलन एक बड़ा रूप ले लिया.

एलजीबीटी समुदाय से आने वाले लोग इस महीने को ख़ास मानते रहे पर इसका महत्व तब और बढ़ गया जब बराक ओबामा अमेरिका के राष्ट्रपति बने और सरकारी तौर इसे प्राइड मंथ मनाने की घोषणा की. अलबत्ता डोनाल्ड ट्रूम के अमेरिका के राष्ट्रपति बनने के बाद सरकार ने इसे मानने से इनकार कर दिया है पर दुनिया भर में इस समुदाय के लोग अब भी इसे प्राइड मंथ के तौर पर ही मनाते हैं.

भारत में एलजीबीटी समुदाय और उसका संघर्ष

परंपरा और संस्कृति के चिल्ल-पों के बीच वर्तमान में यह उम्मीद करना बेमानी है कि एलजीबीटी समुदाय के लोग यहाँ सामान्य जीवन जी रहे होंगे. इंडियन पेनल कोड की धारा 377 वैसे किसी भी सेक्स को अवैध मानता है जिसे लोग प्रजनन के प्राकृतिक तरीकों में नहीं गिनती करते हैं. यह धारा 1860 में अस्तित्व में आया था और आज भी मौजूद है. एलजीबीटी समुदाय के लोगों के लिए अब भी यह एक डरावना कानून है.

इस समुदाय के लोग  लंबे समय से तमाम ऐसे प्रश्नों का सामना करते आ रहे हैं, जो उनके जीवन का एकदम निजी हिस्सा है. ये लोग अपने अधिकारों के लिए लड़ रहे हैं. सरकार समय समय पर कानून बदल देती है.

2009 में दिल्ली के उच्च न्यायालय ने इस धारा 377 को मौलिक अधिकारों के हनन के रूप में बताया था. यह फैसला एलजीबीटी समुदाय के लोगों के लिए बहुत राहत लेकर आया था. लेकिन कुछ धार्मिक समूहों ने इस फैसले के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में अपील की और 2013 में सर्वोच्च न्यायालय दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले को ख़ारिज कर दिया. इसी साल जनवरी में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि इस धारा 377 की बैधता की जांच एक बड़ी बेंच करेगी.

अलबत्ता सर्वोच्च न्यायालय के एक संवैधानिक पीठ ने आधार पर सुनवाई करते हुए निजता को मौलिक अधिकार माना था. इस फैसले का धारा 377 और इसके बेजा इस्तेमाल पर दूरगामी प्रभाव पड़ने के आसार हैं.

इस आदेश को निरस्त करने के लिए उनके पास हालिया याचिकाएं हैं. शेफ ऋतु डालमिया के साथ नवतेज जौहर, सुनील मेहरा, आएशा कपूर और अमन सेठ ने धारा 377 की वैधता को चुनौती देते हुए याचिका दायर की है.

भारतीय दंड संहिता की धारा 377 को चुनौती देने वाले याचिकाकर्ताओं के अनुसार, किसी भी समलैंगिक गतिविधि को आपराधिक श्रेणी में लाने वाला कानून न केवल पुराना और अनुचित है, बल्कि औपनिवेश कालीन अपराध के बाद का खुमार है.

समुदाय के लिए जून गर्व का महीना है, लेकिन समुदाय के लोग कहते हैं कि वे खुद को अभी भी हाशिये पर महसूस करते हैं. वे जोर देकर कहते हैं कि भारत में गुलाबी मुद्रा की जरूरत है, जो गे समुदाय की क्रय शक्ति को वर्णित करती है.

गे अधिकारों के लिए काम करने वाले प्रसिद्ध कार्यकर्ता और ललित सूरी हॉस्पिटैलिटी समूह के कार्यकारी निदेशक केशव सूरी ने आईएएनएस से कहा, “कोई देश तबतक प्रगति नहीं कर सकता जबतक उसकी एक बड़ी जनसंख्या भय के वातावरण में जीती है या भेदभाव का अनुभव करती है. धारा 377 औपनिवेश कालीन अपराध के बाद का खुमार है. गलत को ठीक करने के लिए हमारे पास 70 साल थे.”

 संवैधानिक लोकतंत्र में धारा 377 का कोई स्थान नहीं है

सूरी ने कहा, “हमें अपने मानवाधिकारों और खुद के लिए जिम्मेदारी उठानी शुरू करनी चाहिए. एलजीबीटीक्यूआई समुदाय आज लाखों में हैं. अब हम उन्हें हाशिए पर नहीं रख सकते. भारत को आज गुलाबी मुद्रा की भी जरूरत है, आज जिसकी बड़ी मात्रा मौजूदगी है.”

नाम जाहिर न करने की शर्त पर एक याचिकाकर्ता ने आईएएनएस को बताया, “संवैधानिक लोकतंत्र में धारा 377 का कोई स्थान नहीं है. याचिकाकर्ता समुदाय को समानता, सम्मान और भाईचारे का अधिकार मांग रहे हैं.”

वेब श्रंखला ‘माया 2’ में लेस्बियन का किरदार निभाने वाली अभिनेत्री लीना जुमानी का कहना है कि सरकार को एलजीबीटी समुदाय को यह चुनने का अधिकार देना चाहिए कि वे किससे प्यार करें और किसके साथ अपना जीवन जीएं.

सूरी ने ब्रिटेन की प्रधानमंत्री द्वारा भारत या पूर्व में ब्रिटेन के अधीन रहे अन्य देशों में समलैंगिक यौन संबंधों को अपराध की श्रेणी में रखने की निंदा करने का उल्लेख किया.

सूरी ने कहा, “हमें खुद को, दोस्तों, सहकर्मियों, नागरिकों, बच्चों को सभी को स्वीकार करने और सबका सम्मान करना सिखाना होगा.”

अन्य याचिकाकर्ताओं की तरह आशावादी आएशा कपूर का कहना है कि इस चर्चा में मीडिया सकारात्मक प्रभाव डाल सकता है. वे  कहती हैं, “मेरी तरह लाखों भारतीयों में एक उम्मीद और सकारात्मकता है.”

–आईएएनएस के इनपुट के साथ

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