छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव: जीत-हार को लेकर भविष्यवाणी मुश्किल

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अनिमेष नाथ/

सत्रह साल के छत्तीसगढ़ में पांचवां विधानसभा चुनाव होने वाला है और पूरे राज्य में चुनावी चर्चाएँ ज़ोरों पर हैं. दो चरणों में होने वाले इस चुनाव में चुनावी विशेषज्ञ भी अनुमान लगाने में असमर्थ दिख रहे हैं कि जीत किसके हाथ लगेगी. यहाँ चुनाव 12 नवम्बर और 20 नवम्बर को होने हैं.

छत्तीसगढ़ के चुनावी नतीजे का अनुमान इसलिए भी मुश्किल है क्योंकि यहाँ वोट प्रतिशत में अंतर काफी कम रहता है और उसी से जीत या हार तय होती है. जैसे  2013 के चुनाव परिणामों का विश्लेषण किया जाए तो कांग्रेस को 40.29 प्रतिशत वोट मिले थे, जबकि भाजपा ने 41.04 प्रतिशत वोट हासिल करके सरकार बनायी थी. बसपा ने 4.27 फीसदी वोट हासिल किये थे.

चुनाव के शुरूआती माहौल में कांग्रेस और बसपा के साथ आने की बात चल रही थी. अगर ऐसा हो जाता तो चुनावी परिणाम को लेकर इतना उहापोह नहीं रहता. लेकिन मायावती ने अजीत जोगी के साथ जाकर तस्वीर को और धुंधला किया है.

सन् 2000 में स्थापित छतीसगढ़ राज्य, गंभीर रूप से नक्सली प्रभावित राज्य के रूप में जाना जाता रहा है. इस राज्य में अब तक केवल दो ही नेता इसका प्रतिनिधित्व करते आ रहे हैं- अजित जोगी और रमन सिंह. रमन सिंह पिछले 15 वर्षो से सत्ता में हैं.

रमन सिंह के नेतृत्व वाली राज्य की भाजपा सरकार और केंद्र की भाजपा सरकार ने अपने विकास कार्यों का हवाला देते हुए जनता से वोट की गुहार लगाईं है.

इस राज्य में अब तक केवल दो ही नेता इसका प्रतिनिधित्व करते आ रहे हैं;अजित जोगी और रमन सिंह. रमन सिंह पिछले 15 वर्षो से सत्ता में हैं

यह लाजिमी भी है क्योंकि यह चुनाव भाजपा के लिए 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले लिटमस टेस्ट साबित हो सकता है. इसलिए भाजपा पूरा ज़ोर लगाये हुए है.

कागज़ पर भाजपा अधिक मजबूत दिख रही है. रमन सिंह तीन बार मुख्यमंत्री रहने के बाद भी अभी भी सबसे लोकप्रिय चेहरा बने हुए हैं. तोड़-फोड़ की राजनीति में अव्वल भाजपा, कांग्रेस के नेताओं को घेरने में भी लगी हुई है. कांग्रेस के जनजातीय विधायक राम फाताल को भी भाजपा ने प्रभावित करने की कोशिश की है. ख़बरें तो यह भी हैं कि कई कांग्रेस नेता पक्ष बदलने का इंतज़ार कर रहे हैं. प्रतिद्वंदियों को तोड़ना भाजपा की एक सफल रणनीति रही है.

उधर अजीत जोगी-मायावती के गठबंधन का पूरा फायदा भाजपा को ही होगा क्योंकि इस गठबंधन के फलस्वरूप वोट विभाजित होंगें और भाजपा का वोट शेयर बढ़ जाएगा. जोगी यहाँ भी कर्नाटक जैसी स्थिति की उम्मीद कर रहे हैं, जहाँ बिना गठबंधन कोई भी पार्टी सामान्य बहुमत के आस-पास भी नहीं पहुँच पायी थी.

जोगी-मायावती का गठबंधन चुनाव परिणाम परिवर्तक साबित हो सकता है, क्योंकि इस गठबंधन का प्रत्यक्ष असर 39 आरक्षित सीटों के नतीजों पर दिखने को मिल सकता है.

लेकिन पंद्रह साल तक सत्ता में रहे भाजपा के लिए मुश्किल यह है कि अब यह दल कोई स्वप्न बेचने की स्थिति में नहीं है. यह पार्टी भले ही पिछले चुनावों में अच्छा प्रदर्शन करती आई हो फिर भी रमन सिंह इस बार के चुनावों में बड़ी कठिनाइयों का सामना करने वाले हैं, क्योंकि उनके सामने कृषि संकट से परेशान मतदाता हैं. वहीँ भाजपा उम्मीद कर रही है कि महिलाओं को स्मार्टफोन और साइकिलें वितरित कर देने मात्र से ही वे मतदाताओं को लुभाने में कामयाब रहेंगे.

अब देखना यह  है कि रमन सिंह अपने 15 साल के कार्यकाल में किये गए कार्य, सत्ता बरकरार रखने के लिए पर्याप्त होंगे अथवा नहीं.

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