पीएम किसान: चुनावी महीनों में किसानों को दो हज़ार रुपये देना रिश्वत से कम नहीं

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उमंग कुमार/

रविवार को नरेन्द्र मोदी ने गोरखपुर में एक बटन दबाया और करीब एक करोड़ एक लाख किसानों के मोबाईल पर मेसेज आगया कि आपके खाते में दो हज़ार रुपये जमा कर दिए गए हैं. मोदी ने चुनावी साल में पीएम किसान नाम की बड़ी योजना का शुभारम्भ गोरखपुर से किया और साबित करने की कोशिश करते रहे कि कैसे उनकी सरकार पूर्ववर्ती सरकारों से अलग हैं और किसानों के हित की सोचती है.

प्रधानमंत्री की इस योजना के तहत 21 राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों के किसानों को फायदा पहुँच चुका है. मोदी के एक क्लिक से 2,021 करोड़ रुपए सीधे उनके खाते में पहुँच गए. यह बताते हुए मोदी ने दावा किया कि बाकि किसानों को भी इसी तरह पहली किस्त के 2,000 रुपए अगले कुछ हफ्तों में मिल जाएंगे और देश में करीब-करीब 12 करोड़ किसानों के खाते में दो-दो हजार की पहली किस्त जमा होगी.

मोदी सरकार ने अपने आखिरी बजट में इस योजना की घोषणा के साथ यह बताया था कि हर वर्ष लगभग 75 हजार करोड़ रुपये किसानों के खाते में सीधा भेजे जायेंगे. सरकार के वादे के अनुसार देश के वो 12 करोड़ छोटे किसान जिसके पास 5 एकड़ या उससे कम भूमि है ऐसे सभी किसानों को इस योजना का सीधा लाभ मिलेगा.

केंद्र सरकार की तरफ से प्रत्येक छोटे और मझोले किसान के खाते में हर साल छ: हजार रुपये जमा किये जाएंगे. किसानों की तथाकथित हमदर्द सरकार ने आनन-फानन में दो हजार रुपये की पहली क़िस्त किसानों के खाते में जमा भी करना शुरू कर दी. मोदी ने वादा किया कि जिन किसानों को आज पहली किस्ते नहीं मिली है, आने वाले कुछ ही समय में, कुछ ही हफ्तों में पहली क़िस्त  की राशि उनके बैंक खाते में जमा हो जाएगी.

यह उन्हीं किसानों को फायदा देगी जिनके पास जमीन है. जो लोग एकदम गरीब हैं और जिनके पास जमीन भी नहीं हैं उनको इससे कोई फायदा नहीं मिलने वाला है

हालांकि इस योजना के लाभार्थी मुख्यतः उन्हीं राज्यों से हैं जहां भाजपा और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार है. बाकि के राज्यों में इस योजना को लेकर कोई ख़ास उत्सुकता नहीं हैं. वजह भी है. कई जानकार कृषि के मुद्दे पर बुरी तरह फेल इस सरकार के इस कदम को चुनाव से जोड़कर देख रहे हैं और मानते हैं कि इसी वजह से सरकार आनन-फानन में कुछ पैसा किसानों के खाते में भेज रही है ताकि चुनाव में इसका फायदा उठा सके.

जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय के प्रोफेसर सीपी चंद्रशेखर लिखते हैं कि पीएम किसान एक तरह से बेसिक इनकम स्कीम की तरह है जिसमें गरीबों के खाते में सीधे पैसा भेज दिया जाता है. इस स्कीम का किसानों की समस्या से कोई लेना-देना नहीं है. न तो इस योजना से किसानों की फसल का उचित दाम मिलने वाला है और न ही उनको कर्ज मुक्ति मिलने वाली है.

और यह बेसिक इनकम वाली स्कीम भी एक तरह से बिना तैयारी के लाई गई है. यह उन्हीं किसानों को फायदा देगी जिनके पास जमीन है. जो लोग एकदम गरीब हैं और जिनके पास जमीन भी नहीं हैं उनको इससे कोई फायदा नहीं मिलने वाला है. इसके अतिरिक्त यह भी कि पांच सौ रूपया महीना या कहें प्रति व्यक्ति 100 रूपया कोई मायने नहीं रखता. इससे कई गुना बेहतर तेलंगाना का रायथू बंधू योजना है जिसके तहत प्रत्येक किसान को प्रति एकड़ 8,000 रूपया दिया जाता है. इसके तहत दो एकड़ जमीन के मालिक को सालाना 40,000 रुपये तक मिल जाता है. इसी तरह उड़ीसा की सरकार भी कालिया नाम से एक स्कीम लाई है जो एक किसान को 10,000 रुपये सालाना और भूमिहीन किसान को 12,500 रुपये सालाना देने का वादा करती है.

इससे भी अहम है कि साढ़े चार सालों तक किसानों के मुद्दे पर चुप्पी साधने वाली सरकार ने आखिरी बजट में घोषणा कर केआने वाली सरकार पर छोड़ दिया कि इस योजना को चलाया जाता है कि नहीं. इस सरकार का मुख्य उद्देश्य बस वही 20,000 करोड़ रूपया है जो इसने इस बजट में इस योजना के लिए सुनिश्चित किया है. सरकार चाहती है कि यह पैसा किसी तरीके से किसानों के खाते में चुनाव के पहले पहुँच जाए.

ये पैसा भी सरकार कई महत्वपूर्ण योजनाओं से कटौती कर के लाई है. सीपी चंद्रशेखर लिखते हैं कि मनरेगा को और अधिक पैसा चाहिए था जिसपर सरकार ने ध्यान नहीं दिया. इसके साथ ही प्रधानमंत्री आवास योजना और स्वच्छ भारत मिशन जैसे कई योजनाओं को सरकार ने पिछले साल के मुकाबले कम पैसा दिया है. इसका मतलब स्पष्ट है कि सरकार के पास इस पीएम किसान को चलाने के लिए न तो भरपूर पैसा है और न ही इच्छाशक्ति. ऐसे में नरेन्द्र मोदी का खुद को किसानों का हमदर्द बताना थोडा हास्यास्पद है.

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