विश्व पर्यावरण दिवस विशेष: हमारे खून में शामिल होने लगा है यह प्लास्टिक

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जिस प्लास्टिक को हम बाहर फेंककर निश्चिंत होते रहे हैं वह अब हमारे शरीर का हिस्सा है. इसी खतरे को देखकर इस साल पर्यावरण दिवस का थीम प्लास्टिक को बनाया गया है.

शिखा कौशिक/

पिछले सप्ताह थाईलैंड में एक व्हेल मछली बीमार अवस्था में मिली. थाईलैंड के दक्षिणी प्रान्त सोंगखला में डॉक्टर लागातार पांच दिन तक कोशिश करते रहे कि उस व्हेल मछली को बचाया जा सके. पर वे नाकाम रहे. डॉक्टरों के प्रयास से बस इतना हुआ कि मछली के पेट से पांच प्लास्टिक का थैला बाहर निकाला जा सका.पोस्टमॉर्टेम के बाद पता चला कि उस मछली के पेट में 80 प्लास्टिक के थैले अभी और मौजूद थे. इन अस्सी थैलों का कुल वजन आठ किलोग्राम था.

खैर इस खबर से यह उम्मीद करना बेमानी है कि लोग प्लास्टिक से होने वाले खतरे को समझेंगे और अपने जीवन शैली में कोई सुधार लायेंगे. हर छोटी बात पर प्लास्टिक का इस्तेमाल करने वाले लोगों को तब तक कोई दिक्कत नहीं है जब तक उनके घर में कोई दिक्कत न आ जाए.

लेकिन वो दिन दूर नहीं जब प्लास्टिक बतौर खतरनाक वस्तु आपके और हमारे ऊपर अपना असर दिखाने वाली है. इससे जुड़े कुछ ऐसे तथ्य सामने आने लगे हैं जिसे जानकार आपके होश उड़ जायेंगे.

प्लास्टिक  का बहुत बड़ा हिस्सा नदी और नदियों के रास्ते समुद्र में चला जाता है. उसे मछलियाँ खाती हैं और वह मछली मनुष्यों का आहार बनती हैं

हम जो प्लास्टिक इस्तेमाल करते हैं और कूड़े में डालकर निश्चिंत हो जाते हैं कि यह कचरा सामने से गया. सरकार हमारी और आपकी बेपरवाह तरीकों से कहीं और आगे है. इसलिए यह कचरा और खासकर उस प्लास्टिक  का बहुत बड़ा हिस्सा नदी और नदियों के रास्ते समुद्र में चला जाता है. उसे मछलियाँ खाती हैं और वह मछली मनुष्यों का आहार बनती हैं और उस प्लास्टिक का कुछ अंश हमारे भोजन का हिस्सा बन हमारे शरीर में प्रवेश कर जाता है. इस तरह एक चक्र पूरा होता है और हम अपने बेपरवाह तरीकों के शिकार हो रहे हैं.

बात अभी यहीं ख़त्म नहीं होती. अगली खबर यह है कि यह प्लास्टिक अब हमारे हवा और पानी का हिस्सा बन गया है. यानी कि हम जो पानी पीते हैं और जो हवा सांस के लिए इस्तेमाल करते हैं उसमें भी प्लास्टिक के कण शामिल हो गए हैं.

आपको लग रहा होगा कि ऐसा कैसे हो सकता है!

प्लास्टिक एक ऐसा पदार्थ है जो सड़ता और गलता नहीं है. यही प्लास्टिक से जुडी सबसे बड़ी समस्या है. लेकिन लागातार सूर्य की रौशनी में रहने या पानी में रहने की वजह से प्लास्टिक का कुछ हिस्सा महीन कण में टूटता है. यही बारीक टुकड़ा हवा और पानी में जाकर मिल जाता है. हमारे शरीर का हिस्सा बन जाता है.

उपलब्धि जो अभिशाप बन गई

जैसा कि स्पष्ट हो चुका है कि प्लास्टिक सड़ता गलता नहीं है. इसका मतलब यह है कि जो प्लास्टिक बनाया जा रहा है वह ऐसे ही कहीं पड़ा हुआ है. अनुमान लगाईये यह कितना होगा!

कैलिफ़ोर्निया विश्वविद्यालय और अन्य संस्थाओं के विद्वानों ने अध्ययन कर के अनुमान लगाया है जो किसी का भी दिमाग चकरा देने के लिए काफी है. इनके अनुसार सन् 1950 से 2015 तक कुल 830 करोड़ मीट्रिक टन (BMT) प्लास्टिक बनाया जा चुका है. इसका 76 प्रतिशत यानी 630 करोड़ BMTके करीब कूड़ा में तब्दील हो चुका है.

इस 630 करोड़ BMT प्लास्टिक के कचड़े का महज 9 प्रतिशत ही पुनः प्रयोग में लाया गया है. इस नौ प्रतिशत का भी महज 10 प्रतिशत एक से अधिक बार पुनः प्रयोग किया गया है. इसका मतलब यह कि साढ़े छह सौर करोड़ BMT प्लास्टिक, कूड़ा बनकर पृथ्वी पर मौजूद है. यह या तो हमारे आसपास पड़े कूड़े के ढेर पर है या नदियों के रास्ते समुद्र में चला गया.

प्लास्टिक का कूड़ा बनाने में भारत भी पीछे नहीं हैं. केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार साठ शहर मिलकर 25,940 टन प्लास्टिक का कूड़ा पैदा करते हैं. ऐसा प्रत्येक साल होता है. एक दूसरा अध्ययन वर्ष 2016 में आया था जिसने अनुमान लगाया कि देश में कुल 1.6 मिलियन टन प्लास्टिक का कूड़ा इक्कठा होता है और इसमें आधा तो अकेले गुजरात और महाराष्ट्र से आता है. वैसे तो यह आंकड़ा बहुत अधिक है लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि यह अभी कम है और वास्तविक आंकड़ों को नहीं दर्शाता है.

प्लास्टइंडिया फाउंडेशन का एक आंकड़ा बताता है कि भारत में हर साल 1.65 करोड़ टन प्लास्टिक की खपत है जो पहले दिए गए दो आंकड़ो से कहीं ज्यादा है. अगर इतनी खपत है तो जाहिर है कि इसी अनुपात में प्लास्टिक तैयार भी हो रहा होगा.

विडम्बना देखिये कि जिस गंगा की भारत में पूजा होती है और जिसका धार्मिक महत्व है लोग उसी गंगा का इस्तेमाल कर यह प्लास्टिक समुद्र में बहा रहे हैं. हाल ही में आये एक अध्ययन से पता चला है कि कुल प्लास्टिक जो समुद्र में जाता है उसका 90 % एशिया की नदियों से जाता है. दक्षिण एशिया में गंगा और सिन्धु नदी प्रमुख नदियाँ हैं जिसमें प्लास्टिक बहकर समुद्र तक पहुँच रहा है.

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