पारदर्शिता कम करने वाले इलेक्टोरल बांड ही नीति आयोग के लिए अहम राजनितिक सुधार

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निर्वाचन आयोग ने इलेक्टोरल बांड को पारदर्शिता कम करने वाला कदम बताया है. इस सुधार के खिलाफ सरकार को चिट्ठी भी लिखी है.

उमंग कुमार/

राजनितिक दलों की फंडिंग के लिए वित्त मंत्री के इलेक्टोरल बांड वाले सुझाव की चहुँओर भर्त्सना के बावजूद भी नीति आयोग ने सरकार को इसे आगे बढाने का सुझाव दिया है. निर्वाचन आयोग ने इसके खिलाफ सरकार को पत्र भी लिखा था.

अपने तीन साल के एक्शन प्लान रिपोर्ट में नीति आयोग कहता है कि केंद्रीय बजट 2017-18 ने राजनितिक दलों की फंडिंग को लेकर कई अभूतपूर्व कदम उठाये थे जैसे इलेक्टोरल बांड्स. आयोग ने इसे जल्द से जल्द लागू करने पर बल दिया है.

मालूम होना चाहिए कि वित्त मंत्री अरुण जेटली ने इस साल के अपने बजट भाषण में राजनितिक दलों की फंडिंग के लिए इलेक्टोरल बांड का प्रस्ताव रखा था. इस प्रस्ताव की चारों तरफ जमकर खिंचाई हुई थी. यहाँ तक कि चुनाव आयोग ने भी कई बार इसपर उंगली उठाई है.

चुनाव आयोग ने मई में सरकार को पत्र लिखकर स्पष्ट किया था कि इस प्रस्तावित इलेक्टोरल बांड से चुनावी प्रक्रिया और राजनितिक दलों की फंडिंग-सम्बन्धी पारदर्शिता और कम होगी.

चुनाव आयोग के पूर्व प्रमुख नसीम जैदी ने भी जाते जाते इसपर सवाल खड़ा किया था.

हाल ही में निर्वाचन आयुक्त ओपी रावत ने भी इसपर सवाल खड़ा किया था. वे एसोसिएशन ऑफ़ डेमोक्रेटिक रिफार्म के एक प्रोग्राम में बोल रहे थे. यहाँ बोलते हुए उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित इलेक्टोरल बांड राजनितिक दलों के फंडिंग में पारदर्शिता के हिसाब से और पीछे जाने वाला कदम है. उन्होंने कहा था कि उन समूहों के द्वारा राजनितिक प्रक्रिया में अत्यधिक पैसा लगाना गलत होगा जिनका अपना एक स्वार्थ है. ऐसा होने से लोकतान्त्रिक शासन व्यवस्था कमजोर होगी क्योंकि वे दल सरकार के फैसलों को भी प्रभावित करेंगे.

नए बने राजनितिक दल स्वराज इंडिया के प्रमुख योगेन्द्र यादव ने भी ‘द हिन्दू’ अखबार में इस नए ‘सुधार’ पर सवाल खड़े किये थे. उनका कहना था कि एक बार यह इलेक्टोरल बांड प्रक्रिया में आ गया तो राजनितिक दलों के फंडिंग को लेकर जो थोड़ी बहुत पारदर्शिता बची है वह भी ख़त्म हो जायेगी. इनके अनुसार सामान्यतः काले धन को सफ़ेद करने का प्रयास किया जाता है. पर इस इलेक्टोरल बांड से सफ़ेद पैसे को ग्रे किया जाएगा.

क्या है इलेक्टोरल बांड?

चुनाव आयोग ने पहले यह सुझाव दिया था कि राजनितिक दलों को मिलने वाले कैश चंदे को 20,000 रुपये से घटाकर 2,000 रुपये तक सीमित किया जाना चाहिए. अलबत्ता अरुण जेटली ने अपने भाषण में यही कहा कि सरकार चुनाव योग के सुझाव पर काम कर रही है पर वास्तव में ऐसा नहीं है. सनद रहे कि राजनितिक दलों को इस बीस हजार तक के चंदे का स्रोत नहीं बताना होता है.

योगेन्द्र यादव लिखते हैं कि सरकार ने 20,000 रुपये चंदे वाले हिस्से को छुआ तक नहीं है बस एक नया तरीका और जोड़ दिया है. इस नए तरीके में  एक स्रोत से साल में सिर्फ एक बार 2,000 रुपये का चंदा दिया जा सकता है. यह चंदा इलेक्टोरल बांड के रूप में होगा जो चंदा देने वाला किसी बैंक से खरीदेगा.

इलेक्टोरल बांड के बारे में समझाते हुए यादव लिखते हैं कि एक शख्स अगर किसी राजनितिक दल को चंदा देना चाहता है तो वह बैंक से एक इलेक्टोरल बांड खरीदेगा. यह सिर्फ चेक या डिजिटल पैसे से खरीदा जायेगा. इस बांड पर उस राजनितिक दल का नाम नहीं होगा जिसको यह चंदा दिया जाना है.  यह बांड एक खास खाते में सीमित समय के भीतर ही भंजाया जा सकता है. इस तरह बैंक यह तो जान सकेगा कि किसने कितने इलेक्टोरल बांड खरीदे पर किस राजनितिक दल को यह पैसा गया यह उसके लिए रहस्य रहेगा.

इसी तरह के चंदा लेने वाले राजनितिक दलों के बैंक को यह तो पता रहेगा कि इस बांड के तहत कितना पैसा जमा हुआ पर किसने दिया यह इसके लिए रहस्य बना रहेगा.

लेकिन सबसे अहम् बात यह कि आयकर विभाग और चुनाव आयोग के लिए दोनों चीजें रहस्य बनी रहेंगी. इस तरह राजनितिक दलों के समर्थकों और जनता के लिए भी सबकुछ रहस्य बना रहेगा.

ऐसे में अगर यह सोचा जाए कि किसी बड़े व्यवसायी को एक राजनितिक दल को चंदा देना हो तो कई लोगों की मदद से वह ख़ास रकम इस रास्ते जमा कर सकता है जिसका कोई माई-बाप नहीं होगा. इसका उदहारण नोटबंदी के दौरान देखा जा चुका है.

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