गुमला में लिंचिंग: तीन घंटे तक पुलिस के पास तड़पता रहा पीड़ित, इलाज में देरी से हुई मौत

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उमंग कुमार/

लिंचिंग के शिकार आदिवासी और उनके साथी पुलिस के पास चार घंटे तक पड़े रहे लेकिन पुलिस ने उन्हें नजदीक के स्वास्थय केंद्र पर ले जाना जरुरी नहीं समझा और इस तरह एक पीड़ित की मौत हो गई. अगर पुलिस इन्हें तुरंत अस्पताल पहुंचाई रहती तो शायद उनकी जान बच जाती.

झारखण्ड के गुमला जिले में 10 अप्रैल 2019 को हुए लिंचिंग को लेकर जांच पर गई फैक्ट फाइंडिंग रिपोर्ट में ऐसे कई खुलासे हुए हैं जो पुलिस की भूमिका पर सवाल खड़े करते हैं.

गुमला के डुमरी ब्लॉक के जुरमु गाँव के रहने वाले 50 वर्षीय आदिवासी प्रकाश लकड़ा को पड़ोसी जैरागि गाँव के साहू समुदाय के लोगों की भीड़ ने पीट-पीट कर मार दिया. जुर्मू के तीन अन्य पीड़ित – पीटर केरकेट्टा, बेलारियस मिंज और जेनेरियस मिंज – भीड़ द्वारा पिटाई के कारण गंभीर रूप से घायल हो गए.

फैक्ट फाइंडिंग टीम की रिपोर्ट के अनुसार, इन आदिवासियों पर हमला करने के बाद ये हमलावर  इन्हें पुलिस थाने ले गए और वहाँ पुलिस से मुलाक़ात भी की. पुलिस के पास चारों पीड़ित आदिवासी करीब चार घंटे तक पड़े रहे. इसके बाद जब पुलिस उन्हें स्वास्थय केंद्र ले गई तो वहाँ एक को मृत बताया गया.

इस रिपोर्ट के अनुसार थाना प्रभारी अमित कुमार ने डॉक्टर पर दबाव भी बनाया ताकि डॉक्टर यह घोषित करे कि प्रकाश लकड़ा की मौत स्वास्थय केंद्र पर आने के बाद हुई है. डॉक्टर के अनुसार प्रकाश की मौत स्वास्थय केंद्र पर लाने के एक घंटे पहले ही हो चुकी थी. इसके मायने ये हुए कि पुलिस के पास प्रकाश करीब तीन घंटे तक तड़पता रहा और पुलिस ने कुछ नहीं किया.

झारखंड जनाधिकार महासभा की एक तथ्यान्वेषण दल, जिसमें कई सामाजिक कार्यकर्ता और सदस्य संगठनों के प्रतिनिधि शामिल थे, ने 14-15 अप्रैल को इस घटना की जाँच की.

इस फैक्ट फाइंडिंग टीम के अनुसार 10 अप्रैल 2019 को कई आदिवासी जिसमें पुरुष, महिला और बच्चे सभी शामिल हैं वे गाँव के पास बहने वाली नदी के किनारे पर एक मृत बैल का मांस काट रहे थे. सनद रहे कि इस क्षेत्र के आदिवासी और अन्य समुदाय (जैसे घासी और लोहरा) पारंपरिक रूप से गौमांस खाते हैं.

फैक्ट फाइंडिंग टीम को लोगों ने बताया है कि इन आदिवासियों को मृत बैल के मालिक ने मांस काटने और खाल निकालने के लिए कहा था. आदिवासी वही कर रहे थे जब उनपर जैरागी गाँव के लगभग 35 – 40 लोगों की भीड़ ने हमला बोला. रिपोर्ट के अनुसार इस कातिल भीड़ का नेतृत्व संदीप साहू, संतोष साहू, संजय साहू और उनके बेटे कर रहे थे. हमला होने पर कुछ आदिवासी तो भागने में सफल रहे पर प्रकाश, पीटर, बेलरियस और जेनेरियस को भीड़ ने पकड़ लिया और लाठियों से हमला कर दिया.

घटनास्थल पर पीटने के बाद भीड़ इन्हें पीटते हुए उन्हें जैरागी चौक तक ले गए. घटनास्थल से लेकर इस चौक की दूरी करीब एक किलोमीटर की है. भीड़ ने इन्हें करीब तीन घंटे तक पीटा और आधी रात को पुलिस के हवाले कर आराम से घर लौट गए.

इस रिपोर्ट के अनुसार स्थानीय पुलिस की भूमिका संदिग्ध है. पीड़ितों के बार-बार कहने के बावजूद भी कि वे मृत बैल की मांस काट रहे थे, पुलिस ने उनके और गाँव के 20-25 अज्ञात व्यक्तियों के विरुद्ध गौ हत्या के आरोप में प्राथमिकी दर्ज की है.

झारखंड में लिंचिंग की यह एक और घटना है. पिछले पांच वर्षों में, कम-से-कम 11 व्यक्तियों की भीड़ द्वारा, गायों के संरक्षण या अन्य सांप्रदायिक मुद्दों के नाम पर, हत्या कर दी गयी और आठ को पीटा गया. अधिकांश मामलों में स्थानीय प्रशासन और पुलिस की भूमिका पर कई सवाल खड़े हुए हैं.

पिछले साल, रामगढ़ और गोड्डा में लिंचिंग के दोषियों को जयंत सिन्हा, एक केंद्रीय मंत्री और निशिकांत दुबे भाजपा से सांसद, द्वारा सम्मानित किया गया था.

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