सीबीआई की प्रासंगिकता पर गहरे होते सवाल

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फोटो: साभार NDTV

शिखा कौशिक/

पश्चिम बंगाल में सीबीआई और स्थानीय पुलिस प्रशासन के बीच जो ड्रामा चल रहा है उससे एक बात तो साफ़ हो गई है कि केंद्रीय जांच एजेंसी अपना महत्व खोते जा रही है. सोमवार को सीबीआई और पश्चिम बंगाल सरकार दोनों सर्वोच्च न्यायालय में दरवाजा खटखटा रहे हैं कि उनके साथ ज्यादती हो रही है. उधर पश्चिम बंगाल के राज्यपाल के पास सीबीआई के वो अधिकारी पहुँचने वाले हैं.

यह दुखद ही है कि सीबीआई के अधिकारियों को यह दिन देखना पड़ रहा है कि वे एक अधिकारी के पास पहुंचे और उन्हें खुद बंधक बना लिया जाए. इतिहास में शायद ऐसा कभी नहीं हुआ है.

लेकिन यह भी गौर करने वाली बात है कि पिछले पांच छः महीनों से सीबीआई के अन्दर ही इतना कुछ हो रहा है कि इस संस्था की विश्वसनीयता दांव पर लग गई है और कुछ राज्य तो घोषणा कर चुके हैं कि उनके यहाँ के मामलों में सीबीआई जांच नहीं करेगी.

आन्ध्र प्रदेश ने 8 नवम्बर को फैसला लिया. इसके तुरंत बाद पश्चिम बंगाल ने भी ऐसी ही घोषणा कर बताया कि अब सीबीआई से वो किसी मामले की जांच नहीं करवाएंगे

इसमें पश्चिम बंगाल और आंध्र प्रदेश सरकार शामिल हैं.आन्ध्र प्रदेश ने 8 नवम्बर को फैसला लिया. इसके तुरंत बाद पश्चिम बंगाल ने भी ऐसी ही घोषणा कर बताया कि अब सीबीआई से वो किसी मामले की जांच नहीं करवाएंगे.

आन्ध्र प्रदेश सरकार ने एजेंसी के वरिष्ठ अधिकारियों को बताया कि ऐसा इसलिए किया गया है क्योंकि सीबीआई के वरिष्ठ अधिकारियों के भ्रष्टाचार में लिप्त होने  के कारण अब एजेंसी में आत्मविश्वास की कमी दिखलाई पड़ रही है.

उन्होंने कहा था कि यह निर्णय पिछले छह महीनों में सीबीआई के अन्दर हो रही घटनाओं के कारण लिया गया है. उन्होंने कहा था “सीबीआई ने मोदी सरकार के हस्तक्षेप के कारण अपनी आज़ादी खो दी है,भाजपा सीबीआई का इस्तेमाल अपने राजनितिक विरोधियों के खिलाफ फर्जी बयान तैयार करने में कर रही है.”

इस पर प्रतिक्रिया देते हुए पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा था कि चन्द्रबाबू नायडू द्वारा सीबीआई को लेकर लिया गया निर्णय एकदम सही है.

कुल मुद्दा यह है कि जब सीबीआई को लेकर ऐसी बातचीत होने लगे तो क्या यह डर सही नहीं है कि यह संस्था अपनी प्रासंगिकता खो रही है.

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