मामा या कंस मामा: पिछले नौ साल में मध्य प्रदेश के अस्पतालों में 72 000 नौनिहालों की मौत

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शिवराज सिंह चौहान खुद को बच्चों के मामा कहलाने पसंद करते हैं, क्या यही है उनकी मामागिरी?

सौतुक डेस्क/

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान 2015 में जब मध्याहन भोजन में बच्चों को मिलने वाले अंडे पर रोक लगा रहे थे उसी साल उस राज्य में हज़ारों नौनिहाल सिर्फ इसलिए मौत की आगोश में सो गए क्योंकि अस्पताल में होने के बावजूद भी उनके इलाज के लिए डॉक्टर मौजूद नहीं थे. ऐसा एक दो साल नहीं हुआ बल्कि पिछले नौ साल से ऐसा चल रहा है और हर साल हज़ारों की संख्या में बच्चे अस्पताल में अपना दम तोड़ रहे हैं.

शाकाहारी और मांसाहारी के इस राजनीति में उलझाने और डॉक्टरों की समुचित व्यवस्था नहीं करने से इस मुख्यमंत्री की प्राथमिकता का पता चलता है जो पिछले तेरह साल के शासन के बाद पुनः राज्य की जनता के पास वोट मांगने जाने वाला है. सनद रहे कि मध्य प्रदेश में दिसंबर में विधानसभा चुनाव होना है.

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की सरकार मध्य प्रदेश में पिछले पंद्रह साल से शासन में हैं. गुड गवर्नेंस या सुशासन का नगाड़ा पीटने वाली इस सरकार के कार्यकाल में बच्चों का पैदा लेना किसी बदनसीबी से कम नहीं रही है. जी हाँ, पिछले नौ साल में डॉक्टरों की कमी की वजह से इस राज्य के सरकारी अस्पतालों में करीब 72,000 नौनिहालों की मौत हो चुकी है.

मध्य प्रदेश विधान सभा में पेश हुए नेशनल हेल्थ मिशन के आंकड़ो के अनुसार राज्य के तमाम सरकारी अस्पतालों के विशेष नवजात देखभाल इकाई या सामान्य भाषा में कहें तो आईसीयु में पिछले नौ साल में  में 72,000 नौनिहाल अपनी जान गवां चुके हैं. सलाना हुई बच्चों की मौत के लिए बॉक्स देखें.

सनद रहे कि अस्पताल वह जगह है जहां डॉक्टर और सारी सुविधाएं होती हैं. लोग इसी उम्मीद से यहां आते हैं कि एक बार पहुँचने के बाद तो डॉक्टर उन्हें बचा ही लेगा. लेकिन मध्य प्रदेश में ऐसी स्थिति है कि इन अस्पतालों में पहुँचाने के बाद भी इन बच्चों के माँ-बाप इन्हें नहीं बचा सके.

इतना ही नहीं, इस किल्लत के बावजूद भी इन डॉक्टरों में से 277 डॉक्टर प्रशासनिक कार्य में लगे हैं

वजह यह कि अस्पताल में डॉक्टर ही मौजूद नहीं हैं जो मरीजों का इलाज कर सकें. इस राज्य में जितने डॉक्टरों की पोस्ट है उसके हिसाब से लगभग आधे ही मौजूद हैं. मार्च 2017 में पूरे राज्य में महज 4367 डॉक्टर मौजूद थे. जबकि कुल 8,156 डॉक्टर की पोस्ट मौजूद है.

इतना ही नहीं, इस किल्लत के बावजूद भी इन डॉक्टरों में से 277 डॉक्टर प्रशासनिक कार्य में लगे हैं. इससे भी आप सरकार की गंभीरता का अनुमान लगा सकते हैं. इस राज्य में कुल 3,2 73 विशेषज्ञ डॉक्टर की पोस्ट है जिसमें महज 1,126 डॉक्टर ही मौजूद है.

हाल ही में पब्लिक अफेयर सेंटर (PAC) नाम की एक संस्था ने अच्छी शासन व्यवस्था के आधार पर राज्यों की सूची जारी की जिसमें केरल को प्रथम स्थान मिला. इसी सूची में मध्य प्रदेश, दो अन्य भाजपा शासित राज्य- झारखण्ड और बिहार के साथ निचले पायदान पर पाया गया.

एक मुख्यमंत्री को किसी राज्य की स्थिति बदलने के लिए कितने साल चाहिए होते हैं! पांच साल, दस साल या उससे भी अधिक.. यह समझ से परे है कि मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह दिसम्बर में होने वाले विधान सभा चुनाव के लिए जब वोट मांगने जायेंगे तो क्या कहकर वोट मानेंगे. उनको इतनी संख्या में हुई इन बच्चों की मौत परेशान करेगी!

मध्य प्रदेश के विभिन्न अस्पतालों के विशेष नवजात देखभाल इकाई में हुई बच्चों की मौत
2010-11 3,281
2011-12 5,600
2012-13 7,499
2013-14 9,785
2014-15 9,683
2015-16 11,481
2016-17 12, 963
2017-18 11,978

स्रोत: नेशनल हेल्थ मिशन के आंकड़े जो मध्य प्रदेश विधान सभा में पेश किये गए

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