कांचा इलैया से सम्बंधित विवाद को समझने के लिए पढ़ें उनका साक्षात्कार

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सौतुक डेस्क/

कांचा इलैया शेफर्ड सेंटर फॉर दी स्टडी ऑफ़ सोशल एक्सक्लूज़न एंड इनक्लूसिव पालिसी के निदेशक है. उन्होंने भारतीय जाति व्यवस्था को निशाना बनाते हुए कुछ पुस्तकें लिखी हैं जिसकी वजह से वह विवाद के शिकार होते रहे हैं. उनकी पुस्तक में व्हाई आई ऍम नॉट अ हिन्दू और पोस्ट-हिन्दू इंडिया  शामिल हैं. इस दूसरी पुस्तक की वजह से जिसमे उन्होंने बनिया समाज को सामाजिक स्मगलर बताया है, आजकल इलैया को जान से मारने की धमकी मिल रही है. कहीं से समर्थन न मिलता देख इलैया ने खुद को एक घर में बंद कर रखा है.  हाल ही में उन्होंने इस  मामले पर लोगों की चुप्पी पर भी सवाल खड़े किये. इस पूरे मामले को समझने के लिए सौतुक उनका एक साक्षात्कार उपलब्ध करा रहा है जो उन्होंने अंग्रेजी वेबसाइट स्क्रॉल को दिया था.

किस तरह की धमकी आपको मिल रही है?

पहली धमकी मुझे 10 सितम्बर को मिली जब मैं अपनी संस्था तेलंगाना मास (टी-मास) की बैठक में शामिल होने गया था. तब आर्य वैश्य समाज के लोग मुझे धमकी देने लगे. जल्दी ही वे लोग मेरा पुतला जलाने लगे, तस्वीर फाड़ने लगे और मुझे गालियाँ देने लगे. उस दिन मेरे खिलाफ एक सुनियोजित कैम्पेन शुरू हुआ. उस दिन से मेरे पास रोज एक के बाद एक करीब सौ फ़ोन काल आने लगे. ये लोग रात भर फ़ोन करते थे. पूरे देश से ये फ़ोन आ रहे थे. ये लोग गन्दी-गन्दी गलियां देते थे. मैंने परेशान होकर अनजान नंबर से आये फ़ोन उठाना ही बंद कर दिया.

उसके एक सप्ताह बाद 17 सितम्बर को तेलगु देशम पार्टी के एक सांसद टीजी वेंकटेश जो कि आर्य वैश्य समाज से हैं- उन्होंने एक प्रेस कांफ्रेंस बुलाया. वहाँ बोलते हुए उन्होंने कहा कि मुझे बीच चौराहे पर फांसी पर लटका देना चाहिए जैसा कि अरब देशों में होता है.

मैंने दस सितम्बर की घटना के लिए पुलिस में शिकायत दर्ज की. फिर मैंने टीजी वेंकटेश के खिलाफ भी केस दायर किया. हमलोग एक रैली निकालकर केस दर्ज करने जाना चाहते थे पर सरकार ने इसकी इजाज़त नहीं दी. फिर भी हमलोग दर्जन की संख्या में गए और केस दायर किया. मैंने दोनों बार तेलंगाना सरकार से सुरक्षा की मांग की, पर कोई फायदा नहीं हुआ.

फिर 23 सितम्बर को मैं अपनी संस्था की बैठक में भाग लेने गया. जब मैं वहाँ से लौट रहा था तो आर्य वैश्य समाज के लोगों ने पाराकल शहर के पास मेरी गाड़ी को घेर लिया. उनके हाथों में पत्थर, चप्पल इत्यादि थे और वे मेरे गाड़ी पर हमला करना चाहते थे. पर ड्राईवर की सूझ-बूझ से मेरी जान बची. उसने फुर्ती दिखाते हुए गाड़ी घुमा ली और सीधे पुलिस स्टेशन पहुँच गया.  भीड़ ने वहाँ तक हमारा पीछा किया. पुलिस ने उन्हें रोका. पुलिस सुरक्षा के बीच हम हैदराबाद वापस लौटे.

आर्य वैश्य सामाज के लोगों को रैली निकालने और मेरी किताब के लिए मुझे गाली देने की इजाज़त दी गई है. यह किताब मैंने 2009 में लिखी थी.

आपको क्या लगता है तेलंगाना सरकार आपको सुरक्षा क्यों नहीं दे रही है?

मुझे नहीं मालूम. तेलगु देशम पार्टी के सांसद को सरकार ने हैदराबाद आकर मेरे खिलाफ फतवा जारी करने की इजाज़त दी. मुझे सुरक्षा मुहैया कराने के मेरे निवेदन पर अब तक कोई कदम नहीं उठाया गया है. बल्कि इसके उलट राज्य के गृह मंत्री ने अपना बयान जारी किया है कि कांचा इलैया गलत हैं और उन्हें ऐसी किताब नहीं लिखनी चाहिए. आर्य वैश्य समाज के लोगों के सामने उन्होंने मेरी भर्त्सना की. एक और मंत्री हरीश राव ने तो यहाँ तक कहा कि मुझे अब लिखना बंद कर देना चाहिए. मुख्यमंत्री के तरफ से अब तक कोई बयान नहीं आया है और न ही मुझे सुरक्षा दी गई है. नहीं मालूम क्यों?.. यह सब देखते हुए मैंने 24 सितम्बर की सुबह खुद को हाउस अरेस्ट करने का फैसला किया.

ऐसी स्थिति आपकी पुस्तक पोस्ट हिन्दू इंडिया  की वजह से बनी है जिसमे आपने ‘सोशल स्मगलिंग’ के बारे में बात की है. क्या आप इसके बारे में कुछ बता सकते है कि क्यों उसपर इतना विवाद हो रहा है?

देखिये, यह किताब तब लिखी गई जब 2006-07 में हमलोग निजी क्षेत्र में आरक्षण को लेकर किसी नतीजे पर नहीं पहुँच सके. उस समय की यूपीए सरकार ने इसका प्रस्ताव दिया था पर उद्योग जगत ने इसका विरोध किया. इनका कहना था कि दलित, अन्य पिछड़ा वर्ग, आदिवासी के पास क्षमता (मेरिट) नहीं है. इसलिए मैंने यह किताब लिखी जिसमे बहुजन समाज की क्षमता का विवरण है. दलित बहुजन समाज ने इस देश के लिए पूंजी का निर्माण किया है. इस पुस्तक का पहला अध्याय आदिवासी समाज के बारे में बात करता है जिसका शीर्षक है ‘अनपेड टीचर’. दूसरा अध्याय चमार के बारे में है जिसका शीर्षक है ‘सबालटर्न साइंटिस्ट्स’. यह चमड़ा तकनिकी, चमड़े से बना सामान, कृषि और ऐसे मुद्दों के बारे में बात करता है. तीसरा अध्याय महार, माला इत्यादि के बारे में हैं जिसका शीर्षक है ‘प्रोडक्टिव सोल्डर्स’. इसमें  गाँव के सुरक्षा, जानवरों को ट्रेनिंग और सीमा सुरक्षा जैसी बात उठाई गई है.

सनद रहे कि बीआर अम्बेडकर के पिता एक सिपाही थे जो महार समुदाय से आते थे और ब्रिटिश इंडियन आर्मी के साथ जुड़े थे. इसके बाद यह पुस्तक धोबी समुदाय के बारे में बात करती है जिसका शीर्षक है ‘सबऑल्टअर्न फेमिनिस्ट्स’.

इन सबके बाद मैं बनिया (वैश्य) समाज की बात करता हूँ. मैंने इसका अध्ययन किया कि कैसे गुप्तकाल के बाद से व्यवसाय इसी समुदाय के लिए आरक्षित है. और कैसे ये लोग खरीदने और बेचने में धोखाधड़ी करते हैं. इतिहास के एक समय में तो ये अपने धन जमीन में गाड़कर छिपाते थे और उसे गुप्त धन बुलाते थे. इनलोगों ने कभी अपने धन को वापस कृषि इत्यादि में खर्च (इन्वेस्ट) नहीं किया. इनके यहाँ दान इत्यादि की कोई संस्कृति नहीं है. ये लोग त्योहारों में लोगों से घुलना मिलना पसंद नहीं करते. ये लोग अन्य सभी को अछूत की तरह मानते हैं.

यह संस्कृति अपने चरम पर पहुंची और अभी 46 प्रतिशत भारतीय व्यवसाय की पूँजी इनके कब्जे में हैं. इसलिए मैंने इस अध्याय का नाम रखा ‘सोशल स्मगलर्स’. स्मगलिंग से तात्पर्य देश की संपत्ति को बाहर ले जाना होता है. जबकि सोशल स्मग्ग्लिंग का तात्पर्य यहाँ देश की संपत्ति किसी एक समुदाय के पास सुरक्षित रखना है, जिसका आधार मनु धर्म है. वे लोग न इन्वेस्ट करते हैं, न बाँटते हैं बल्कि सिर्फ जमा करते जाते हैं. इस पैसे का कोई सामाजिक सरोकार नहीं है. मैंने यह भी साबित किया कि कैसे अडानी और अम्बानी की जो भी पूँजी आज तैयार हुई है उसमे सामाजिक जिम्मेदारी की कोई भूमिका नहीं रही है. इसमें मानवीय संवेदना नहीं है और यह किसी मानवीय समस्या के लिए जमा भी नहीं किया जा रहा है.

एक जाति के व्यवसाय पर पूरी तरह कब्ज़ा होने से स्थानीय स्तर पर कोई  उद्योग खड़ा नहीं हो पाया. ऐसा मध्यकालीन युग से है. बनिया ब्राह्मण नेटवर्क की वजह से बहुत बड़ी मात्रा में सोना मंदिरों में रखा जाने लगा. यह सब धन छिपाने के उद्देश्य से किया जाता रहा. इसकी वजह से कोई स्थानीय उद्योग नहीं पनप पाया. आज भी यही स्थिति है. इसी वजह से निजी क्षेत्र में ये लोग आरक्षण का विरोध करते हैं.

मेरा मानना है कि बनिया सोशल स्मगलर हैं वहीँ ब्राह्मणों ने मनु धर्म और शास्त्र के बूते अपने ‘स्पिरिचुअल फासिज्म’ के लिए एक किला खड़ा कर लिया है. इन्ही दोनों समुदाय के सम्बन्ध की वजह से जाति की संस्कृति बनी है.

यह पुस्तक एक शैक्षिक जांच पड़ताल है. ये लोग अपने बुद्धिजीवी को बहस के लिए बुला सकते थे. ये लोग इस पर एक और पुस्तक लिख सकते थे. लेकिन ये लोग आज सड़क पर हैं. इनकी नज़र में न्याय व्यस्था की कोई इज्ज़त नहीं है. सरकारें भी इनसे डरी हुई हैं क्योंकि ये लोग इन राजनितिक दलों को भारी भरकम चंदा देते हैं.

पोस्ट हिन्दू इंडिया 2009 में प्रकाशित हुई थी. अभी यह विवाद क्यों?

एक छोटे प्रकाशक ने तेलगु के अनुवाद को लेकर सभी अध्याय का अलग अलग बुकलेट छपवाया. इसके छपने के साथ यह विवाद शुरू हुआ. कुल मिलकर ये लोग इस तरह के विरोध के लिए सही माहौल भी पा रहे हैं.

 

(इस साक्षात्कार के साथ इस्तेमाल तस्वीर भी स्क्रॉल से ली गयी है.)

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