स्वच्छता के नाम पर ज़बरदस्ती कितनी जायज़?

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उमंग कुमार/

आजकल स्वच्छता अभियान के नाम पर लोगों को परेशान किये जाने की खबर आम बात हो गई है. क्षेत्र विशेष और देश को ओपन डेफेकेशन फ्री (ओडीएफ) बनाने के लिए, सरकार किसी हद तक जाने को तैयार दिख रही है. करीब दो महीने पहले राजस्थान से खबर आई कि एक अधिकारी शौच करती महिलाओं की तस्वीर उतार रहा था. महिला के पति ने जब इसका विरोध किया तो उसे पीट-पीट कर मार डाला गया.

इसी साल 11 सितम्बर को मध्य प्रदेश के अशोकनगर जिले में पदस्थ एक सहायक अध्यापक महेंद्र सिंह यादव को इसलिए निलम्बित कर दिया गया क्योंकि वे घर में शौचालय होते हुए भी शौच के लिए बाहर जाते थे. उसी जिले में प्रकाश प्रजापति को भी निलंबित कर दिया गया क्योंकि उनकी पत्नी शौच करने के लिए बाहर जाती हैं. इन दोनों को निष्काषित किये जाने का पत्र सोशल साइट्स पर घूम रहा है. सौतुक ने इन पत्रों की वास्तविकता नहीं जाँची हैं.

स्वच्छता के अनेकों फायदे हैं जिसपर कोई विवाद नहीं है और सरकार का अधिकतम स्वच्छता के लक्ष्य के प्रति आग्रह सराहनीय है. पर स्वच्छता को ऐसे थोपे जाने पर विवाद जरुर है. बहुत सारे लोग इन तरीकों से नाखुश है.

लोक स्वास्थय के विशेषज्ञ और छत्तीसगढ़ में स्थित गरीबों के लिए काम कर रही  संस्था जन स्वास्थ्य सहयोग के संस्थापक योगेश जैन ने ऐसे ही सवाल करते हुए फेसबुक पर एक पोस्ट लिखा. इस पोस्ट में उन्होंने ओडीएफ के पूरे कांसेप्ट पर ही सवाल खड़ा किया.

ओडीएफ मतलब जहां शौच के लिए कोई बाहर नहीं जाता हो. सरकार उस क्षेत्र को ओडीएफ घोषित करती है जहां के लोग बाहर शौच जाना बंद कर देते हैं. लेकिन क्या ऐसा लक्ष्य पाना संभव भी है.

इस पर योगेश जैन लिखते हैं कि मैं सच में यह जानना चाहता हूँ कि वास्तव में ओडीएफ का क्या मतलब होता है. गांवो पर दबाव बनाया जा रहा है कि वो जल्द से जल्द अपने को ओडीएफ घोषित करें. ऐसे में जो लोग शौच के लिए बाहर जा रहे हैं उन्हें सामाजिक बहिष्कार तक झेलना पड़ रहा है.

जैन आगे लिखते हैं कि अव्वल तो मैं इसी से सहमत नहीं हूँ कि लोगों को बाहर शौच नहीं करने जाना चाहिए तब जब सेप्टिक टैंक्स और शहरों के सीवर साफ़ पानी में जाकर मिल जाते हैं और इस तरह वह पानी पीने लायक नहीं रहा जाता.

सनद रहे कि भारत में मल के निष्काषन के लिए बहुत सुव्यस्थित व्यस्था नहीं है. इसलिए जब आखिर में मैला जाकर इसी तरह पानी में मिल जाता है तो इतना जोर-जबरदस्ती करने का फायदा क्या है.

इनका कहना है कि चलिए मान लिया जाए कि आपने सबको टॉयलेट में शौच के लिए मजबूर कर भी दिया तो क्या उसमे एक, दो या तीन साल के छोटे-छोटे बच्चे भी शामिल होंगे? क्या नवजात शिशु, छोटे छोटे बच्चे कभी शौचालय में जायेंगे? स्वाभाविक जवाब होगा नहीं तो उनका मल भी होते-होते उन्ही तालाब और अन्य पानी के श्रोतों, जैसे चापाकल में जाएगा. और इस उम्र के बच्चो की संख्या अच्छी खासी है. तीन साल तक के बच्चों की जनसँख्या लगभग कुल आबादी की दस प्रतिशत तो होगी.

इन बच्चों के अतिरिक्त वे लोग भी इन शौचालय का इस्तेमाल नहीं कर सकेंगे जो किन्ही वजह से बिस्तर पर पड़े हैं. जैसे बूढ़े-बीमार. इनके भी गंदे बिस्तर तो इन्ही पानी के स्रोत जैसे नदी, तालाब इत्यादि में धोये जायेंगे. देश की करीब एक प्रतिशत आबादी तो इस श्रेणी में आ ही जायेगी.

इन सब को देखते हुए क्या अगर 89 प्रतिशत लोग शौचालय का इस्तेमाल करेंगे तो इसे ओडीएफ के श्रेणी में कैसे रखा जाएगा? क्या वैज्ञानिक तौर पर इसका कोई मतलब बनता है? फिर क्या हमें ओडीएफ होने का प्रयास भी करना चाहिए.

ऐसे उपलब्धि के लिए किस सामाजिक कीमत को चुकाने को तैयार हैं हम?

इसको पढने के बाद जो सवाल आपके मन में चल रहा होगा वही उनके पोस्ट पर एक सौम्यदीप भौमिक पूछते हैं कि क्या आप यह कहना चाहते हैं कि खुले में शौच करना स्वास्थय के लिए हानिकारक नहीं है.

इस पर योगेश जैन का जवाब इस पूरे तर्क को और सही तरीके से स्पष्ट करता है. वो कहते हैं कि नहीं मैं नहीं कह रहा हूँ कि खुले में शौच को रोकने का प्रयास नहीं होना चाहिए. मेरा बस इतना कहना है कि जिस तरीके से यह थोपा जा रहा है वह सही नहीं है और ओडीएफ संभव भी नहीं है. बहुत तो हमलोग लेस ओडी मतलब जहां कम से कम लोग खुले में शौच के लिए जाते हों, वही बन सकते हैं.

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