क्या जनवरी में भाजपा को नया पार्टी अध्यक्ष मिलने वाला है?

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उमंग कुमार/

क्या अमित शाह की पार्टी अध्यक्ष की कुर्सी खतरे में हैं? क्या 2019 का लोकसभा चुनाव भारतीय जनता पार्टी, गुजरात के दो धुरंधर- नरेन्द्र मोदी और अमित शाह के नेतृत्व में नहीं लड़ेगी? संकेत तो कुछ ऐसे ही मिल रहे हैं.

हाल में तीन राज्यों में मिली करारी हार के बाद अंदरखाने में इसकी सुगबुगाहट होने लगी है. हाल के नितिन गडकरी के बयानों को ही देख लें. गडकरी बार बार भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को आईना दिखा रहे हैं. कभी हार की जिम्मेदारी लेने की बात कहकर तो कभी जवाहलाल नेहरु की तारीफ़ कर के. उन्होंने तो यहाँ तक कह दिया कि सिर्फ अच्छा भाषण दे देने भर से चुनाव नहीं जीता जा सकता. सनद रहे कि नरेन्द्र मोदी को अच्छा भाषण देने वाला कहा जाता है.

हालांकि ये सारी बातें गडकरी अलग कलेवर में छिपा कर कह रहे हैं. लेकिन याद करिए कि छः महीने पहले तक पार्टी के किसी नेता को चूँ तक करने की इजाज़त नहीं थी और न ही ये नेता लोग पार्टी आलाकमान के खिलाफ कुछ कहने की हिम्मत जुटा पा रहे थे.

अब अगर गडकरी बोल पा रहे हैं तो इसकी वजह भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से उनकी नजदीकियां हैं जो उनको बोलने की ताकत दे रही है. बल्कि राजनितिक गलियारे की आवाजाही पर दिनरात नजर रखने वालों का मानना है कि गडकरी के माध्यम से संघ बोल रहा है. अगर ऐसा है, तो संघ आखिर क्या सिग्नल देना चाहता है! नेतृत्व परिवर्तन?

अब न केवल सहयोगी दल बल्कि अंदरखाने से भी विरोध के स्वर उठने लगे हैं. संघ इसी मौके का फायदा उठाकर मोदी-शाह जोड़ी की निरंकुशता से निजात पाना चाहता है

अगर हाँ तो यह नेतृत्व परिवर्तन कैसा होगा? क्या नरेन्द्र मोदी के बदले पार्टी किसी और प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के साथ मैदान में उतरेगी. इसकी सम्भावना कम है. पिछले दो साल से मोदी ऐसी किसी स्थिति से बचने की तैयारी में लग गए थे और अपनी विचारधारा के लोगों के बीच यह बात फैलानी शुरू कर दी थी कि आखिर मोदी नहीं तो कौन?

अब अगर मोदी को नहीं हटाया जा सकता तो क्या संघ जनवरी महीने में अमित शाह के ख़त्म हो रहे कार्यकाल को निशाना बनाकर सिग्नल भेज रहा है. अमित शाह को भाजपा के अध्यक्ष पद से हटाना भी मोदी को पार्टी के अन्दर कमजोर करना ही है. क्योंकि मोदी की सफलता का चाणक्य अमित शाह को माना जाता रहा है. 2014 के लोकसभा चुनाव में शाह ने उत्तर प्रदेश की कमान संभाली थी और पार्टी को अस्सी में से 73 सीटों पर जीत दिलाई थी. उत्तर प्रदेश को लोकसभा चुनाव के मद्देनज़र सबसे महत्वपूर्ण राज्य माना जाता है. बाद में उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों में विधानसभा में भी विजय दिलाई थी, जिसे मोदी वेव का नाम दिया गया.

लेकिन अब मौसम बदल गया है. भाजपा का विजय रथ अब रुक चुका है. यह सिलसिला नरेन्द्र मोदी और अमित शाह के गढ़ गुजरात से शुरू हुआ जब 2017 में हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा बड़ी मुश्किल से सरकार बनाकर अपनी इज्जत बचा पाई. फिर कर्नाटक के विधानसभा चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद भी भाजपा को विपक्ष में बैठना पड़ा. अब तीन महत्वपूर्ण राज्यों के चुनाव में तो अमित शाह के नेतृत्व में पार्टी को चारों खाने चित्त होना पड़ा–मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में.

अब न केवल सहयोगी दल बल्कि अंदरखाने से भी विरोध के स्वर उठने लगे हैं. संघ इसी मौके का फायदा उठाकर मोदी-शाह जोड़ी की निरंकुशता से निजात पाना चाहता है और इसलिए गडकरी को आगे बढ़ाया है.

सनद रहे कि अमित शाह ने पार्टी अध्यक्ष का पदभार जनवरी 2016 में संभाला था. तीन साल का उनका कार्यकाल जनवरी 2019 में ख़त्म हो रहा है. अगर पार्टी उनको तीसरी बार अध्यक्ष बनाना चाहती है तो पार्टी के संविधान में परिवर्तन करना होगा क्योंकि शाह दो बार पार्टी अध्यक्ष बन चुके हैं. पहली बार जब राजनाथ सिंह पार्टी अध्यक्ष थे और मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद उनके सरकार में शामिल हो गए. बाकी बचे हुए समय के लिए जुलाई 2014 में शाह ने पार्टी अध्यक्ष का पदभार संभाला था. फिर 2016 में पार्टी अध्यक्ष बने और अब उनका तीन साल का कार्यकाल पूरा होने वाला है.

ऐसा प्रतीत होता है कि शाह को भी इसका एहसास हो गया है कि अब शायद वो पार्टी अध्यक्ष न रहे. इसीलिए आनन्-फानन में वो सबकुछ कर देना चाहते हैं जो 2019 के चुनाव परिणाम के लिए जरुरी है. चुनाव के लिए फील्डिंग अभी से शुरू हो चुकी है. 26 दिसंबर यानी बुधवार को उन्होंने सत्रह राज्यों के लिए चुनाव की जिम्मेदारी अलग अलग नेताओं को दे दी. गुजरात के गोर्धन ज़दाफिया को उत्तर प्रदेश का इन-चार्ज बनाया गया है.

ये सारी बातें यही इशारा कर रही हैं कि भाजपा को करीब पांच साल बाद नया अध्यक्ष मिलने वाला है.

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