इंडियन एक्सप्रेस ने ‘दी कारवां’ की रिपोर्ट को गलत और न्यायधीश लोया की मौत को सामान्य बताया

0

सौतुक डेस्क/

दी इंडियन एक्सप्रेस खोजी अखबार माना जाता रहा है. इसने इतिहास में ढेरों खुलासे किये हैं पर यह नहीं मालूम कि इसके उन खोजबीनों को फिर किसी और मीडिया संस्थान ने जांच कराकर अपना निर्णय पास किया है कि नहीं. लेकिन इस अखबार ने अंग्रेजी पत्रिका दी कारवां में प्रकाशित न्यायधीश बृजमोहन हरिकिशन लोया की असामान्य मौत पर प्रश्न पूछती खबर पर जांच कराया और एक सप्ताह के भीतर उसको सामान्य घोषित कर दिया.

इंडियन एक्सप्रेस की खबर ने इसके लिए उन दोनों न्यायधीशों से बात की जो बृजमोहन लोया को तैयार कर नागपुर ले गए थे और उनकी मृत्यु के पश्चात करीब डेढ़ दो महीने बाद परिवार से मिलने आये थे.

इस अखबार ने अपनी जांच में पाया कि दी कारवां में छपी खबर में किये गए दावे जमीने सच्चाई और सरकारी कागजों से मेल नहीं खाते. दी कारवां में यह दावा किया गया है कि जब न्यायधीश लोया को अस्पताल ले जाया गया तो वहाँ ईसीजी काम नहीं कर रहा था. उसमें यह भी दावा था कि दोनों न्यायधीश जो लोया के साथ नागपुर गए थे वे लोग लोया की मौत के बाद उनसे दूर हो लिए.

इस अखबार ने अपनी जांच में पाया कि दी कारवां में छपी खबर में किये गए दावे जमीने सच्चाई और सरकारी कागजों से मेल नहीं खाते.

इंडियन एक्सप्रेस ने अपने ‘खोजी’ खबर में दावा किया है कि बॉम्बे उच्च न्यायालय के दो न्यायधीश भूषण गवई और सुनील सिकरे ने  इस अखबार से विस्तार से बात किया. ये वही न्यायधीश हैं जिनके कहने पर लोया नागपुर गए थे. इनलोगों ने एक्सप्रेस को बताया कि लोया की हुई मौत में संदेह करने जैसा कुछ भी नहीं है.

इस अखबार से बात करते हुए न्यायधीश भूषण गवई ने बताया कि उस रात लोया अपने सहकर्मी न्यायधीश श्रीधर कुलकर्णी और शिराम मधुसुदन मोदक के साथ ठहरे थे. अलसुबह चार बजे उनको कुछ परेशानी महसूस हुई. उस समय स्थानीय न्यायधीश विजयकुमार बरदे और बॉम्बे हाई कोर्ट के नागपुर बेंच के डिप्टी रजिस्ट्रार रुपेश राठी लोया को तुरंत दांडे अस्पताल ले गए. ये दोनों अपनी अपनी गाड़ी में गए. इस न्यायधीश ने यह भी बताया है कि लोया को ऑटोरिक्शा में ले जाने का सवाल ही नहीं उठता.

दी कारवां के रिपोर्ट और लोया के बहन के दावे को कि दांडे अस्पताल में ईसीजी क्यों नहीं किया गया, इंडियन एक्सप्रेस ने ख़ारिज किया है. सरकारी दस्तावेज के हवाले से आखबार ने यह दावा किया है कि इस अस्पताल में लोया का ईसीजी हुआ था. इस अखबार के दावे के अनुसार दांडे अस्पताल में ईसीजी हुआ फिर डॉक्टर ने पाया कि लोया की स्थिति गंभीर है और उन्हें किसी ख़ास इलाज की जरुरत है जो वहाँ मौजूद नहीं है. इसलिए उनको बड़े अस्पताल भेजा दिया गया. इस समाचार के मुताबिक जब लोया को मेडित्रिना अस्पताल ले जाया गया तो वहां के डॉक्टर ने उनको मृत घोषित कर दिया.

गवई ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि इसी अस्पताल में दोनों न्यायधीश जो लोया को मुंबई से लेकर नागपुर आये थे, वे भी पहुंचे. एक्सप्रेस को गवई ने बताया, “मुझे इसका तब पता चला जब उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार का फ़ोन आया. हमको खबर मिलते ही हमलोग ने बिना ड्राईवर का इंतज़ार किये खुद से गाड़ी चलाकर मेडित्रिना अस्पताल की तरफ भागे. मेरे साथ सिकरे भी थे. कुछ और न्यायधीश भी वहाँ पहुंचे जिसमे मुख्य न्यायधीश मोहित शाह भी थे. दुर्भाग्य से लोया को नहीं बचाया जा सका. लेकिन लोया की मौत और उससे जुड़ी घटनाओं में कुछ भी संदेहास्पद होने की सम्भावना एकदम नहीं है.”

कारवां की खबर में एक और दावा किया गया था कि पोस्टमार्टम के लिए परिजनों का इंतज़ार नहीं किया गया और किसी अजनबी को जो खुद को लोया का रिश्तेदार बताया उसके हस्ताक्षर पर सारे कार्य कर दिए गए. जबकि लोया के परिजनों का कहना है कि उनका वैसा कोई रिश्तेदार नागपुर में है ही नहीं. इसपर इंडियन एक्सप्रेस ने उस आदमी को ट्रैक करने का दावा किया है और कहा है कि उस आदमी का नाम प्रशांत राठी है जिसने पोस्टमार्टम के बाद शरीर लिया था.

राठी ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया है कि उसको उसके मौसा रुक्मेश पन्नालाल जकोटिया का फ़ोन आया. उन्होंने कहा, “उनके भाई लोया मेडित्रिना अस्पताल में भर्ती हैं . जब मैं अस्पताल पहुंचा तो लोया का देहांत हो चुका था. मैंने यह खबर फ़ोन पर मौसा को बताई तो उन्होंने कहा कि बाकि के जरूरतों को देख लेना”

राठी ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया है कि उसको उसके मौसा रुक्मेश पन्नालाल जकोटिया का फ़ोन आया. उन्होंने कहा, “उनके भाई लोया मेडित्रिना अस्पताल में भर्ती हैं . जब मैं अस्पताल पहुंचा तो लोया का देहांत हो चुका था. मैंने यह खबर फ़ोन पर मौसा को बताई तो उन्होंने कहा कि बाकि के जरूरतों को देख लेना.” इसने यह भी दावा किया कि उस समय अस्पताल में और भी न्यायधीश मौजूद थे.

राठी ने दावा किया है कि वह वहाँ तब तक था जब तक लाश का पोस्टमार्टम हुआ और जब मृतक के शरीर को लातूर जाने के लिए एम्बुलेंस में डाला गया उसके बाद वह वहाँ से लौटा.

दी कारवां की खबर के अनुसार उस एम्बुलेंस के साथ कोई नहीं आया. इंडियन एक्सप्रेस ने इसके खिलाफ भी एक नया दावा ठोंका है कि गवई के निर्देशानुसार स्थानीय न्यायधीश ने दो लोगों को जिसमे योगेश रहांगडाले और स्वयं चोपड़ा शामिल हैं उनको उस एम्बुलेंस के साथ भेजा गया था. उनकी गाड़ी रास्ते में कुछ देर के लिए खराब हो गई. इसलिए वो थोड़ी देर से पहुंचे.

सनद रहे कि लोया की 2014 में मृत्यु के बाद आये नए न्यायधीश ने एक महीने के भीतर वर्तमान के भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह को शोहराबुद्दीन की हत्या के मामले में क्लीन चिट दे दिया. इस फैसले के खिलाफ तब से अबतक  सीबीआई ने कोई अपील नहीं डाली है.

अपनी खबर में इंडियन एक्सप्रेस ने वैसे लोगों से बात की है जिसपर दी कारवां की खबर ने सवाल खड़े किये हैं और यह स्वाभाविक है कि उनसे ऐसे ही जवाब मिलने वाले थे. उनके जवाब को अगर सही माना भी जाए फिर भी इंडियन एक्सप्रेस ने निष्कर्ष पर पहुँचाने में थोड़ी जल्दी कर दी है. अभी भी कुछ सवाल ऐसे हैं जिनका जवाब आना बाकी है.

दी इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के बाद भी लोया की मृत्यु सम्बंधित कुछ जरुरी सवाल.

  • क्या किसी रिश्तेदार के रिश्तेदार के कहने पर न्यायधीश जैसे लोगों का पोस्टमार्टम हो जाता है?
  • इस रिश्तेदार के रिश्तेदार ने जब पोस्टमार्टम जैसे बड़े फैसले ले लिए तो वह खुद शव के साथ लोया के घर क्यों नहीं गया?
  • जो न्यायधीश लोया को समझा-बुझा कर नागपुर लेकर गए थे वे कितने दिनों के बाद लोया के परिजन से मिले?
  • लोया का मोबाईल फ़ोन दो तीन बाद परिजनों को क्यों दिया गया और उस फ़ोन की सारी मेमोरी मिटा क्यों दी गई थी?
  • जिस ईश्वर बहेटी ने यह फ़ोन दिया. जिसे कारवां ने संघ का सदस्य होना बताया है. कारवां के अनुसार वह शख्स परिवार के लिए अज़नबी था. पर एक्सप्रेस का दावा है कि वह लोया से मिलता जुलता रहता था. उसको लोया का फ़ोन किसने दिया? यह फ़ोन पुलिस सीधा परिवारवालों को क्यों नहीं दे पाई?

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here