भारत में पुरुषों के मुकाबले महिलाओं की स्थिति हुई पिछले साल से भी बद्तर 

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वैश्विक स्तर पर वर्तमान गति से महिलाओं को पुरुषों के बराबरी पर आने में सदी का इंतज़ार करना पड़ेगा  

सौतुक डेस्क/

क्या इत्तेफाक है कि दो दिन पहले विश्व बैंक ने इज़ ऑफ़ डूइंग बिज़नेस की रिपोर्ट प्रकाशित की और बताया कि भारत ने इस लिस्ट में 30 स्थानों की उछाल लगाई है. सरकारी अमला अति उत्साह में आ गया. प्रधानमंत्री की तरफ से देशवासियों को ट्वीट पर बधाई मिली, वित्त मंत्री का प्रेस कांफ्रेंस हुआ. लेकिन बृहस्पतिवार को ऐसी ही एक वैश्विक संस्था ने एक और रिपोर्ट प्रकाशित की और बताया कि स्त्री-पुरुष की बराबरी के मामले में भारत की स्थिति और खराब हुई है तो सरकारी पक्ष ऐसे चुप्पी साधे रहा जैसे यह किसी और देश की बात हो.

बृहस्पतिवार को आये वर्ल्ड इकनोमिक फोरम के ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट में भारत 87वें रैंक से गिरकर 108 पर पहुँच गया है. इस रैंकिंग में भारत न केवल चीन बल्कि बांग्लादेश से भी काफी पीछे है. भारत की यह रैंकिंग वैश्विक औसत से भी नीचे है. इसका मतलब यह हुआ कि भारत की अर्थव्यस्था में महिलाओं की भागीदारी और घटी है. महिलाओं का स्वास्थ्य भी इस खराब रैंकिंग के पीछे की एक वजह है.

भारत के इस खराब रैंकिंग के पीछे सबसे बड़ी वजह है अर्थव्यवस्था में महिलाओं की कम भागीदारी. इस श्रेणी में देश का 139वाँ रैंक है. इस रिपोर्ट के अनुसार, देश में 66 प्रतिशत महिलायें मुफ्त में कार्य करती है.  मतलब उनके कार्य का कोई आर्थिक मूल्यांकन नहीं होता. इसकी तुलना में महज 12 प्रतिशत पुरुष ही हैं जिनके कार्य का कोई आर्थिक मूल्यांकन नहीं होता.

यह जेंडर गैप यानी महिला-पुरुष की स्थिति में असामनता को दिखलाता है. इस रिपोर्ट के लिए महिलाओं और पुरुषों की मुख्य क्षेत्र में भागीदारी का अध्ययन किया जाता है. जैसे सामजिक, राजनीतिक, बौद्धिक, सांस्कृतिक और आर्थिक गतिविधियों में इनकी भागीदारी आंकलन किया जाता है.

कुल 144 देशों की प्रगति को मापती यह रिपोर्ट पुरुषों की तुलना में महिलाओं की भागीदारी- खासकर चार क्षेत्रों-स्वास्थ्य, शिक्षा, अर्थव्यवस्था और राजनीति- का अध्ययन करता है. इन चारों श्रेणियों में भारत की स्थिति पिछले साल बेहतर थी और देश को 86वां स्थान मिला था.

भारत के इस खराब रैंकिंग के पीछे सबसे बड़ी वजह है अर्थव्यवस्था में महिलाओं की कम भागीदारी. इस श्रेणी में देश का 139वाँ रैंक है. इस रिपोर्ट के अनुसार, देश में 66 प्रतिशत महिलायें मुफ्त में कार्य करती है.  मतलब उनके कार्य का कोई आर्थिक मूल्यांकन नहीं होता. इसकी तुलना में महज 12 प्रतिशत पुरुष ही हैं जिनके कार्य का कोई आर्थिक मूल्यांकन नहीं होता. स्वास्थय के मामले में भारत की रैंकिंग और बुरी रही है. देश को इस श्रेणी में 141वाँ स्थान मिला है जो नीचे से चौथा है.

अगर यह गति बनी रही तो विश्व स्तर पर महिलाओं को पुरुषों के बराबर पहुँचने में एक सदी तक इंतज़ार करना पड़ेगा.

जबसे वर्ल्ड इकनोमिक फोरम ने ऐसी रिपोर्ट प्रकाशित करना शुरू किया है, 11 साल पहले से अब तक में महिलाओं की स्थिति और बिगड़ी है. और अगर इस रिपोर्ट की मानें तो विश्व में महिलाओं को चार क्षेत्रों- राजनीतिक, आर्थिक, शिक्षा और स्वास्थय में बराबरी पर आने में लगभग और सौ साल लगेंगे. जेनेवा स्थित इस संस्था ने पिछले साल अनुमान लगाया था कि स्त्रियों को पुरुषों की बराबरी पर आने में करीब 83 साल का समय लगेगा.

इस संस्था में शिक्षा, लिंग और रोजगार के प्रमुख सादिया जाहिदी का कहना है कि महिलाओं की प्रगति के मामले में यह साल निराशाजनक रहा है. उनके अनुसार वर्तमान रिपोर्ट से यह पता चलता है कि इस दिशा में हो रहे प्रयास धीमे हुए हैं. अमेरिका भी 45वें स्थान से गिरकर 49 स्थान पर पहुँच गया है. ग्यारह साल पहले इस देश की रैंकिंग 23 थी.

भारत के बारे में उन्होंने कहा कि ग्यारह साल के पहले देश की रैंकिंग 98 थी. इस रिपोर्ट से पता चलता है कि महिलाओं को भारत की राजनितिक गतिविधियों में जगह मिलनी शुरू हुई है और स्थिति पहले से बेहतर है. पर स्वास्थय, शिक्षा और रोजगार के क्षेत्रों में स्थिति खराब हुई है

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