गौरी लंकेश की हत्या: भारत पत्रकारों की सुरक्षा के मामले में फिसड्डी होता देश

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सौतुक डेस्क/

मंगलवार को कातिलों ने वरिष्ठ पत्रकार गौरी लंकेश की गोली मारकर हत्या कर दी. इस हत्या से पत्रकार बिरादरी सदमे में है.

गौरी लंकेश, 55, ने नई दिल्ली में भी कई प्रतिष्टित अखबारों के साथ कई सालों तक काम किया है. हाल ही में उन्होंने स्थानीय भाषा में अपनी ही एक पत्रिका निकालनी शुरू की थी.

लंकेश कम्युनल हारमनी फोरम के संस्थापकों में से एक थीं. बैंगलोर स्थित यह पत्रकार अपने विचारों को खुलकर रखने के लिए जानी जाती थीं. भारत में आजकल चल रहे सेक्युलर बनाम कम्युनल बहस में लंकेश सेक्युलर लोगों के पक्ष में खुलकर बोलतीं थी.

इसी साल मार्च के महीने में दिल्ली में कार्यक्रम के दौरान उन्होंने 2015 में हुए एम एम कलबुर्गी की हत्या पर अपनी बात रखी थी और उन्होंने इस बात को रेखांकित किया था कि कैसे कलबुर्गी की हत्या के बाद बजरंग दल के एक कार्यकर्ता ने ट्वीट किया था ‘मोक हिंदूइज्म विल डाई अ डॉग्स डेथ.” इसका मतलब होता है कि हिन्दू धर्म की बुराई करने वाला कुत्ते की मौत मरेगा. कलबुर्गी ने कुछ धार्मिक पुस्तकों की पुनःव्याख्या की थी जो इनलोगों को पसंद नहीं आई थी.

लंकेश ने एक बार मीडिया से बात करते हुए यह तो कहा था कि उनको भरोसा है कि कर्नाटक में चरमपंथियों के पास एक हिट लिस्ट है. लेकिन उन्हें भी यह अंदाजा नहीं होगा कि उनके मरने की खबर पाकर भी कुछ लोग ट्वीट कर खुशियाँ मनाएंगे. दुःख की बात है कि खुशियाँ मनाने वाले पत्रकार बिरादरी  से भी थे.

उनकी मृत्यु की खबर आते ही जी न्यूज़ की एक पूर्व रिपोर्टर ने कुछ ऐसा ही ट्वीट किया.

उनकी हत्या इस बात की पुनः याद दिलाती है कि भारत पत्रकारों के सुरक्षा की दृष्टि से और खतरनाक होता जा रहा है.

अप्रैल में आये वर्ल्ड फ्रीडम इंडेक्स से भी यह साबित हुआ था जब पिछले साल की तुलना में भारत और नीचे खिसक गया था. कुल 180 देशों की रैंकिंग में भारत को 136वाँ  स्थान मिला था. वर्ष 2016 में भारत इससे थोड़ी बेहतर स्थिति में था. तब भारत की रैंकिंग 133 थी.

इससे भी जरुरी बात यह है कि इस रैंकिंग में भारत से ऊपर अफगानिस्तान, फिलिस्तीन, युगांडा और अल्जीरिया जैसे देश हैं जहां के पत्रकार भारत के पत्रकारों से अधिक सुरक्षित हैं. अलबत्ता पकिस्तान, बांग्लादेश, रूस और चीन की रैंकिंग भारत से पीछे है. पकिस्तान (139) महज तीन स्थान पीछे हैं.

गौरी लंकेश की हत्या के बात शशि थरूर ने ट्वीट कर कहा कि भारत को ऐसा देश तो नहीं होना था जहां पत्रकारों को चुप कराने के लिए गोली मार दी जाती हो. यह एक सटीक वाक्य है जो दर्शाता है कि भारत किस दिशा में आगे बढ़ रहा है.

कमिटी फॉर द प्रोजेक्शन ऑफ़ जर्नलिस्ट के अनुसार वर्ष 1992 से भारत में करीब 40 पत्रकारों की हत्या हुई है. यद्यपि अधिकतर पत्रकार इनमे छोटे शहर से आते हैं. जिसमे बिहार के सिवान जिले में हाल ही मरे राजदेव रंजन जैसे पत्रकार आते हैं. इनकी हत्या के खिलाफ जांच चल रही है और शक की सुई सिवान से नेता शहाबुद्दीन पर जाती है.

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