पिछले बीस सालों में शिक्षित युवाओं की स्थिति अभी सबसे बदतर

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अनिमेष नाथ/

सरकारें चाहें जो भी दावा करे लेकिन भारत में बेरोजगारी की समस्या दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है. हाल ही में आये एक अध्ययन से इसकी पुष्टि होती है. अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय द्वारा किये गए इस अध्ययन में दावा किया गया है कि पिछले बीस सालों की अगर तुलना की जाए तो वर्तमान बेरोजगारी के हिसाब से सबसे बुरा है.

इस अध्ययन के मुताबिक़ भारत उच्च आर्थिक विकास के बावजूद नौकरियां पैदा करने में नाकाम रहा है.

अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय का यह अध्ययन 25 सितंबर को प्रकाशित हुआ. इसके मुताबिक जीडीपी में हुई 10 फीसदी की वृद्धि के मुकाबले रोजगार में एक फीसदी से कुछ अधिक की वृद्धि हुई है. इससे अर्थव्यवस्था में बढ़ती बेरोजगारी का पता चलता है.

युवाओं और उच्च शिक्षित लोगों के बीच बेरोजगारी की दर 16 प्रतिशत तक पहुच गई है. इस अध्ययन के अनुसार “भारत में बेरोजगारी की यह स्थिति कम से कम पिछले 20 वर्षो में सबसे ज्यादा है.

‘स्टेट ऑफ़ वर्किंग इंडिया’ (STATE OF WORKING INDIA) नामक अध्ययन के मुताबिक ये रुझान विशेष रूप से उत्तरी राज्यों में दिखाई दे रहे हैं.

रोजगार में असमानता

इस रिपोर्ट से यह भी जाहिर होता है कि निर्माण में लगी कंपनियों में श्रम की उत्पादकता करीब छः गुना बढ़ी है, वहीँ मजदूरी केवल डेढ़ गुना बढ़ी है. इससे जाहिर होता है कि इस विकास का फायदा कंपनियों को मिला है ना कि मजदूरों को.

अध्ययन में यह भी पता चला है कि, उपलब्ध रोज़गार में जाति एवं लिंग आधारित असमानता भीषण रूप से मौजूद है.

सभी श्रमिक क्षेत्रों में महिला श्रमिकों की भागीदारी मात्र 16 प्रतिशत है परन्तु घरेलू श्रमिकों की संख्या में महिला श्रमिकों की भागीदारी 60 प्रतिशत है. अध्ययन के अनुसार उत्तर प्रदेश में, प्रति 100 व्यक्ति सिर्फ 20 महिलाओं को भुगतान किया जाता है. जबकि यह संख्या तमिलनाडु में 50 और पूर्वोत्तर में 70 है.

हालाँकि अध्ययन में यह भी कहा गया है कि लिंग आधारित कमाई का अंतर समय के साथ घट रहा है. सभी श्रमिकों की संख्या में अनुसूचित जाति के श्रमिकों की संख्या मात्र 18.5 प्रतिशत है.

मौजूद रोजगार भी मुश्किल दौर में

इस रिपोर्ट के अनुसार निर्माण के क्षेत्र में पिछले दशक में वृद्धि हुई है, ख़ास तौर पर बुनाई, प्लास्टिक और जूते जैसे उद्योगों में. लेकिन इन क्षेत्रों में भी रोजगार के संकट गहराए हैं.

इन कंपनियों ने लोगों को पे रोल की जगह पर कॉन्ट्रैक्ट पर रखने लगी हैं. स्थायी श्रमिकों के स्थान पर कंपनियों ने नवागंतुक श्रमिकों को ठेके पर रखा है जो  कि स्थाई श्रमिकों की अपेक्षा बहुत कम भुगतान पर मजदूरी करते है.

सूचना प्रोद्योगिकी और आधुनिक खुदरा क्षेत्र में रोजगार 2011 में 11.5 से बढ़कर 2015 में 15 प्रतिशत हो गया है. अध्ययन दर्शाता है कि, “अधिकतर क्षेत्रों में मजदूरी प्रतिवर्ष करीब 3 प्रतिशत बढ़ी है. लेकिन 82 प्रतिशत पुरुष और 92 प्रतिशत महिला श्रमिक अभी भी 10,000 रुपये प्रति माह से भी कम कमाते हैं.”

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