ऐतिहासिक फैसला: सुप्रीम कोर्ट ने माना निजता का अधिकार है मौलिक

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सौतुक डेस्क/

ऐतिहासिक फैसला देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने बृहस्पतिवार को निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार बताया. इस फैसले के दूरगामी परिणाम होने की सम्भावना है.

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का लोगों को शिद्दत से इन्तजार था जिसमे कोर्ट को यह तय करना था कि भारतीय नागरिकों को संवैधानिक तौर पर निजता का मौलिक अधिकार मिला हुआ है कि नहीं. नौ जजों की बेंच ने आखिरकार यह फैसला सुना दिया जिसका भारतीय परिप्रेक्ष्य में बहुत असर होने वाला है.

नौ जजों के बेंच के गठन का आदेश वर्ष 2015 में ही आ गया था और जो लोग आधार को निजता के हनन के तौर पर देख रहे थे जैसे एक्टिविस्ट, शिक्षा के क्षेत्र से जुड़े लोग, वकील और जिनलोगों ने सुप्रीम कोर्ट में केस दर्ज कर रखा था वे बेसब्री से इस फैसले का इंतज़ार कर रहे थे. लेकिन इस बीच सरकार ने कोर्ट के आदेश के खिलाफ जाते हुए आधार को लगभग सारी सुविधाओं के लिए जरुरी करार दिया. जैसे-जैसे आधार का प्रसार होता गया है लोगों में इससे सम्बंधित असुरक्षा की भावना घर करती गई.

सनद रहे कि भारत सरकार ने कोर्ट में लगातार यह दलील दी है कि भारतीय नागरिकों के पास निजता का मौलिक अधिकार नहीं है. कुछेक दफा तो सरकार ने यह तक कह दिया कि भारतीय नागरिकों के पास अपने शरीर पर भी पूर्ण रूप से  अधिकार नहीं है.

इन नौ जजों के बेंच में मुख्य न्यायाधीश जगदीश सिंह खेहर,  न्यायधीश जस्ती चेल्मेश्वर, न्यायमूर्ति एसए बोबडे, आरके अग्रवाल, रोहिंटन नरीमन, एएम सप्रे, डीवाय चंद्रचूड, एसके कॉल और एस अब्दुल नजीर शामिल हैं.

 सनद रहे कि वेणुगोपाल के पहले रहे अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने 22 जुलाई 2015 को न्यायधीश केएस पुतुस्वामी बनाम केंद्र सरकार के मामले में यह दलील दी थी कि देश के नागरिकों को निजता का मौलिक अधिकार नहीं मिला हुआ है.
आधार का भविष्य अधर में
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से आधार का भविष्य अधर में जान पड़ता है. उम्मीद यह है कि सरकार अब आधार को देश के नागरिकों के ऊपर थोप नहीं पाएगी.
जब से आधार के बारे चर्चा शुरू हुई तब से लोगों को अपनी निजता या कहें प्राइवेसी की चिंता से परेशान रहे हैं. वर्ष 2011 में तो राज्यसभा की एक कमिटी ने इस बिल को इसी निजता के नाम पर लौटा दिया कि पहले इस देश में इस निजता की सुरक्षा करने वाला कोई कानून बनाना होगा तब जाकर आधार को लागू किया जा सकता है.
30 जून 2017 को देश के कई हिस्से में लोगों ने आधार के जबरन थोपे जाने पर प्रदर्शन किया. यह तस्वीर बंगलौर की है.
आधार से लोगों को यह डर है कि उनसे से जुड़े सारे ब्योरे, आंकड़े सरकार एक जगह ला रही है. इस आधार के बूते सरकार या जिसके पास भी यह डाटा होगा वह बड़ी आसानी से सारी जानकारी प्राप्त कर सकता है. लोगों का कहना है कि कोई एक क्लिक करने पर  आसानी से पता कर सकता है कि फलां व्यक्ति के पास कितने का कर्ज है, उन्होंने हाल फिलहाल कहाँ की यात्रा की है. ऐसे में लोगों पर निगरानी करना आसान हो जाएगा. इसको लेकर लोग न्यायलय का दरवाजा खटखटाते रहे हैं. देश भर में कई जगह प्रदर्शन भी होता रहा है. न्यायालय में भी 20 के करीब तो केस चल रहे हैं थे.
अब तक देश में कुल 115 करोड़ लोगों को आधार नंबर दिया जा चूका हैं.  सरकार के अनुसार 18 वर्ष से ऊपर के करीब 99 प्रतिशत लोगों को आधार मुहैया कराया जा चूका है. ऐसा तब हुआ है जब सरकार यह कहती रही है कि आधार किसी के ऊपर थोपा नहीं जाएगा.
यह भी याद रहे कि एक तरफ न्यायालय  आदेश देता रहा है कि आधार को देश की किसी सुविधा के लिए अनिवार्य नहीं किया जाए और दूसरी तरफ केंद्र सरकार ने लगभग सभी सरकारी सुविधाओं में इस अनिवार्य कर दिया  है.
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद आधार का भविष्य अधर में रहेगा. उम्मीद यह की जा रही है कि सरकार अब आधार किसी पर थोप नहीं पाएगी.

 

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