बाढ़ को भी कुछ देशों ने काबू में कर लिया है, जानिये कैसे!

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सी चंदन/

केरल इन दिनों भीषण बाढ़ की चपेट में है और साढ़े तीन सौ से भी अधिक लोग अपनी ज़िन्दगी गँवा चुके हैं. मानसून के दौरान ऐसी ही बिभीषिका कमोबेश हर साल देश के कुछ हिस्सों को झेलनी पड़ती है. चाहे वह मुंबई की बाढ़ हो या कोसी का कहर, चाहे वह चेन्नई की आपदा हो या असम के हालात. हर वर्ष ऐसी आपदाएं हजारों जिंदगियों को लील जाती हैं, लेकिन इनसे स्थायी तौर पर निपटने के लिए केंद्र अथवा कोई भी राज्य सरकार गंभीर नहीं दिखते. बस बाढ़ राहत के नामक पर खानापूर्ति करके अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ लेते हैं. लेकिन ऐसा हर जगह नहीं है. दुनिया के कई देशों ने न सिर्फ बाढ़ जैसी आपदाओं को नियंत्रित कर लिया है, बल्कि बाढ़ के पानी को रोजमर्रा के इस्तेमाल में लाने लायक बनाकर जल संकट से निपटने का उपाय भी ढूंढ निकाला है.

ब्रिटेन

ब्रिटेन में बाढ़ के ख़तरे से बचाव और पानी की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए कील्डर वॉटर नामक जलाशय का निर्माण वर्ष 1981 में उत्तर-पूर्वी इंग्लैंड के नोरथम्बरलैंड नामक शहर में किया गया। इस जलाशय की क्षमता 200 बिलियन लीटर की है। सर्दियों के मौसम में अक्सर इस जलाशय के जलस्तर को कम किया जाता है, ताकि बारिश के मौसम में जल संग्रहण के लिए इसमें जगह बनाई जा सके। लेकिन इस क्षेत्र को बाढ़ से बचाने के लिए मौसम विभाग के साथ तालमेल बिठाने की ज़रूरत पड़ती है, ताकि भीषण बारिश का पूर्वानुमान मिल जाए और जलाशय को इसके लिए तैयार किया जा सके।

कम्ब्रिया

वर्ष 2009  में कम्ब्रिया में भीषण बारिश की वजह से इडेन नदी में आये भयानक बाढ़ ने हज़ारों लोगों का जीवन संकट में डाल दिया था. इसके बाद 5.6 ब्रिटिश पाउंड की लागत से पेंरिथ के बाहरी हिस्से में स्थित ठेकाबेक में एक बाढ़ उन्मूलन योजना की शुरुआत की गई. पेंरिथ की सड़कों के नीचे 675 मीटर से अधिक लम्बाई के भूमिगत नालों की मरम्मत कर इसे बाढ़ के पानी के प्रवाह के लिए तैयार किया गया। इससे पेंरिथ के 263 घरों और 119 व्यावसायिक केंद्रों के जल आवश्यकताओं की अबाध आपूर्ति भी सम्भव हो पायी। इसके अलावा धारा के प्रतिकूल 76,000 क्यूबिक मीटर का एक बाढ़ जलाशय का निर्माण किया गया ताकि बाढ़ के पानी को रोककर रखा जा सके। यह जलाशय ओलम्पिक के तरण ताल के आकार का 30 गुना है। बाढ़ जलाशय के आसपास एक आर्द्रभूमि वन्यजीव आवास क्षेत्र विकसित किया गया है, जहां स्थानीय समुदाय शैक्षणिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का आनंद उठा सकते हैं। कम्ब्रिया वाइल्डलाइफ ट्रस्ट के अनुसार इससे इस क्षेत्र में बाढ़ का खतरा 20 प्रतिशत तक घट गया।

जापान

जापान की राजधानी टोक्यो में निवास कर रही करीब 13 मिलियन की आबादी पर बाढ़ और चक्रवात का खतरा हमेशा बना रहता है. इससे निपटने के लिए टोक्यो के बाहरी इलाके में एक छोटे सरकारी भवन के पीछे एक फुटबाल के मैदान और स्केटबोर्ड पार्क के नीचे “जल निष्कासन सुरंग’ यानि वाटर डिस्चार्ज टनल का निर्माण किया गया. वर्ष 1993 से 2006 के बीच करीब 3 बिलियन डॉलर की लागत से निर्मित इस सुरंग की लम्बाई 320 फीट से ज्यादा थी और ऊँचाई पांच मंजिले मकान के बराबर थी. इस काम्प्लेक्स में पांच बड़े शाफ़्ट या टैंक थे जो चार मील लम्बे सुरंग के माध्यम से पानी को निकालने में सक्षम हैं. इस क्षेत्र में अक्सर नका रिवर बेसिन से बाढ़ आ जाती है, लेकिन यह इस कृषि भूमि संरचना की वजह से बाढ़ में डूबने से बच जाता है. जब यह सुरंग और टैंक पानी से पूरी तरह से भर जाता है, तब इंजीनियर इस संरचना के अगले चरण को खोल देते हैं. यह चार टरबाइन की एक श्रृंखला है, जिसकी क्षमता बोईंग 737 प्लेन में इस्तेमाल किये जाने वाले जेट इंजन के समकक्ष हैं. यह टरबाइन बाढ़ के पानी को तीव्रता के साथ नजदीकी एडो नदी में छोड़ देते हैं.

स्विट्जरलैंड

स्विट्जरलैंड में उरी कैंटॉन रियुस नदी के किनारे बसा एक छोटा सा शहर है। यहां वर्ष 1987 में आई भीषण बाढ़ ने रियुस नदी के आसपास के क्षेत्रों में इस तरह के गम्भीर आपदा से निपटने के लिए बाढ़ नियंत्रण कार्यक्रम बनाने के लिए प्रेरित किया। वहां रियुस नदी पर बने बांध को इस तरह से तैयार किया गया कि नदी में तेज़ बहाव की स्थिति में पानी बांध के ऊपर से बहने लगे। इसके बाद पानी को नदी के समानांतर बने एक चौड़े रास्ते की तरफमोड़ दिया जाता था. ऐसी स्थिति में वह चौड़ा रास्ता एक ड्रेनेज चैनल के तौर पर काम करने लगता था. इसके साथ ही नॉइज़ बैरियर का निर्माण किया गया ताकि बाढ़ की स्थिति में, नदी बिना कोई नुकसान पहुंचाए अपने दायरे को बढ़ा सके और बाढ़ का पानी आसानी से लुसरने झील तक पहुँच जाए.

भारत आजादी से पहले से ही सूखा और बाढ़ की विभीषिका झेलता रहा है. एक ओर जल संकट की मार एक बड़ी आबादी को हर साल प्रभावित करती है, वहीँ बाढ़ के कारण हज़ारों लोग असमय ही काल कवलित हो जाते हैं. आखिर क्या वजह है कि आजादी के ७० साल बीत जाने के बाद भी हम इन दोनों आपदाओं से निपटने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठा पाते हैं. इसकी कई वजहें हो सकती हैं. पहला तो यह कि हमारे देश में किसी भी आपदा से निर्णायक लड़ाई लड़ने के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव है. दूसरा, सामुदायिक स्तर पर भी लोग इससे निपटने के लिए आमादा नहीं दिखते.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और दिल्ली में रहते हैं)

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