सरकार चुनाव के लिए जीएसटी कम कर सकती है, महिलाओं के स्वास्थ्य के लिए नहीं

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सौतुक डेस्क/

सैनिटरी नैपकिन पर जीएसटी क्यों लगाया जाना चाहिए इस पर महिलाओं ने ऑनलाइन कैम्पेन चलाया सरकार नहीं समझी. कुछ कलाकारों ने अपने कला के माध्यम से विरोध दर्ज कराया, सरकार नहीं समझी. अब न्यायलय की बारी है.

मंगलवार को दिल्ली उच्च न्यायलय ने केंद्र सरकार को आड़े हाथों लेते हुए इससे जुड़े कई सवाल पूछे. न्यायालय ने पूछा कि यदि सिन्दूर, बिंदी, काजल को जीएसटी के दायरे से बाहर रखा जा सकता है तो सेनेटरी नैपकिन जैसी जरुरत की चीजों को क्यों नहीं. दो न्यायधीशों गीता मित्तल और सी हरीशंकर की बेंच ने कहा कि सेनेटरी नैपकिन एक जरुरत है जिसपर कर लगाया गया है. दूसरी तरफ अन्य चीज़ों को आवश्यक आवश्यकता वाली सूची में लाकर उनपर से कर हटाना समझ से परे हैं.

न्यायालय ने पूछा, आपने बिंदी, सिन्दूर और काजल को कर मुक्त कर दिया. पर सेनेटरी नैपकिन पर कर लगा दिया. क्या सरकार अपने इस फैसले के पीछे की वजह समझा सकती है?

इसी सुनवाई में एक और बात सामने आई. न्यायालय ने पाया कि 31- सदस्यी जीएसटी पैनल में एक भी महिला नहीं है. इस पर भी न्यायालय ने अपना विरोध दर्ज कराया.

इस केस की सुनवाई के दौरान न्यायालय ने सरकार से पूछा कि सिर्फ आयात-निर्यात को ध्यान में रखकर ही फैसला लिया है या इसपर महिला एवं बाल विकास मंत्रालय से भी मशविरा किया गया. इस पर न्यायालय का कहना था कि इस तरह के फैसले, बड़े लक्ष्य को ध्यान में रखकर लिए जाने चाहिए. इस केस की अगली सुनवाई की तारीख दिसंबर 14 होगी.
दिल्ली उच्च न्यायालय में इस सन्दर्भ में याचिका जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय की रिसर्च स्कॉलर ज़र्मिना इसरार खान ने दायर की थी. अपनी याचिका में इन्होंने सेनेटरी नैपकिन्स पर 12 प्रतिशत के जीएसटी को गैर-कानूनी और असंवैधानिक बताया है.

तिरुवनंतपुरम की करीब 300 छात्राओं ने केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली के कार्यालय को ढेर सारी नैपकिन्स भेजी. इन नैपकिंस पर एक सन्देश लिखा था , ‘ब्लीड विदाउट फियर, ब्लीड विदाउट टैक्स’. ये नैपकिंस स्पीड पोस्ट के द्वारा भेजे गए. इन छात्राओं का उद्देश्य यह था कि मंत्री जी सन्देश देखकर एक बार सेनेटरी नैपकिन्स पर लगे कर पर पुनर्विचार करें

जीएसटी, नई कर प्रणाली की शुरुआत जुलाई में की गई तभी से यह विवादों के घेरे में रहा है. हाल ही में गुजरात चुनाव के मद्देनजर, केंद्र सरकार कई चीजों पर जीएसटी दर को कम करने पर मजबूर हुई है.

शुरुआत से ही जीएसटी का विरोध हो रहा है और सेनेटरी नैपकिन्स को 12 प्रतिशत कर के दायरे में लाना लोगों को बहुत नागवार गुजरा है. सरकार के इस कदम का विरोध करने के लिए लोगों ने नए-नए तरीके का ईजाद किये.

जैसे स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ़ इंडिया, तिरुवनंतपुरम की करीब 300 छात्राओं ने केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली के कार्यालय को ढेर सारी नैपकिन्स भेजी. इन नैपकिंस पर एक सन्देश लिखा था , ‘ब्लीड विदाउट फियर, ब्लीड विदाउट टैक्स’. ये नैपकिंस स्पीड पोस्ट के द्वारा भेजे गए. इन छात्राओं का उद्देश्य यह था कि मंत्री जी सन्देश देखकर एक बार सेनेटरी नैपकिन्स पर लगे कर पर पुनर्विचार करें.

राजकमल अपने इस पेंटिंग के माध्यम से सवाल कर रहे हैं कि नैपकिन पर कर लगाना कितना जायज है.

सरकार के इस कर थोपने का विरोध सिर्फ महिलाएं ही नहीं कर रही थी बल्कि पुरुष भी सरकार की अनदेखी पर सवाल उठा रहे थे. एक प्रतिष्ठित मीडिया हाउस से जुड़े कलाकार राज कमल ने अपनी बात रखने के लिए एक बिलकुल अलग तरीका अपनाया. अपनी इस कलाकारी में उन्होंने असली सेनेटरी नैपकिन्स का प्रयोग कर इससे जुडी भ्रांतियों को हटाने के लिए माहवारी को बड़ी ही खूबसूरती से दिखाने का प्रयास किया. वे अपने कला के माध्यम से इस सन्देश को अधिक से अधिक लोगों के बीच पहुँचाना चाहते हैं. इस खबर के साथ प्रकाशित पेंटिंग राजकमल ने बनाई है.

सरकार का पक्ष

सनद रहे कि सरकार ने इन नैपकिंस पर तो कर लगाया है पर सिन्दूर जैसी चीजों को कर-मुक्त श्रेणी में रखा है.
इस मुद्दे के ज़ोर पकड़ने के बाद सरकार ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर सफाई दी. इसके अनुसार, नैपकिंस पर कर स्त्री-विरोधी नहीं है. सरकार का दावा है कि जीएसटी से पहले सैनिटरी नैपकिन पर 13.68 प्रतिशत कर लगाया जाता था, जिसमे 6 प्रतिशत उत्पाद शुल्क और 5 प्रतिशत वैट शामिल था. नई कर प्रणाली में तो महज 12 प्रतिशत का कर लगाया गया है. इस तरह सरकार ने सेनेटरी नैपकिन्स पर वर्तमान में 12 प्रतिशत जीएसटी को एकदम सही बताया. सरकार का अन्य तर्क यह हैं कि मुख्य कच्चे माल पहले से ही उच्च जीएसटी दर के दायरे में हैं तो स्वाभाविक रूप से अंतिम उत्पाद पर भी उचित रूप से कर लगाया जाना चाहिए.

सरकार के इस जवाब पर सवाल

पहले तो सरकार से यही पूछा जाना चाहिए कि गुजरात चुनाव के मद्देनजर जो जीएसटी कम किया गया है उसपर ये सारे तर्क लागू क्यों नहीं होते. यह सरकार के हाथ में है कि अगर किसी चीज को ज़रुरी मानती है तो उसपर कर घटा सकती है.

दूसरे सरकार के पहले के करों को हवाला देकर अभी कर थोपना सही नहीं है. सैनिटरी नैपकिन्स पर वैट पहले से भी बहुत सारे राज्यों में वैध नहीं था, इसीलिए जीएसटी लागू होने के बाद इन राज्यों में सैनिटरी नैपकिन्स पर कर लगभग दोगुना हो जाएगा.

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