जानिये देश के पहले चुनाव में लाखों महिलाएं मतदान के अधिकार से क्यों वंचित रह गयीं

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उमंग कुमार/

दुनिया में महिलाओं को पुरुषों के बराबार स्थान पाने के लिए काफी संघर्ष करना पड़ा है. यहाँ तक कि महिलाओं को समान मतदान का अधिकार देने में अमेरिका जैसे विकसित देश को 144 साल लग गए. ब्रिटेन को यह उपलब्धि हासिल करने में लगभग एक सदी का समय लगा. यूरोप में कुछ जगहों पर तीस-चालीस साल पहले तक महिलाओं को वोट देने की आजादी नहीं थी. जैसे, 1974 में आकर स्विट्जरलैंड में कुछ जगहों पर महिलाओं को वोट देने का अधिकार मिला. सऊदी अरब साल 2011 में महिलाओं को मताधिकार देने वाला आखिरी देश बना. मगर अपने देश भारत में, महिलाओं को आजादी के बाद से ही पुरुषों के बराबर मतदान का अधिकार मिल गया था.

लेकिन भारत में महिलाओं के मतदाता बनने की कहानी भी कम मज़ेदार नहीं है. शुरुआत आज़ादी के बाद की है. देश आज़ाद हुआ और सबको वोट देने का अधिकार दे दिया गया. बारी थी देश के सारे वयस्क नागरिकों के बतौर मतदाता रजिस्टर होने की. उस समय देश में 8 करोड़ महिला मतदाता थीं. इनमें से 28 लाख इसलिए मतदाता नहीं बन पाईं क्योंकि इनके पास अपना नाम नहीं था. ये किसी की पत्नी थीं तो किसी की विधवा.

देश में हुए तीसरे आम चुनाव (1962) में महज 46.6 प्रतिशत महिलाएं मतदान करने के लिए बाहर आईंजबकि पुरुषों की भागीदारी 63.3 प्रतिशत थी. सन् 1962 में पुरुष और महिला मतदाताओं के बीच का अंतर 16.7 प्रतिशत थाजबकि 2014 के आम चुनाव आते- आते  यह घटकर महज़ 1.5 प्रतिशत रह गया

जब सितंबर 1947 से मार्च 1948 के बीच वयस्क मताधिकार के आधार पर मतदाता सूची तैयार करने के निर्देश तैयार किये जा रहे थे तब लोगों ने महिलाओं के नामांकन में आ सकने वाली ऐसी किसी कठिनाई के बारे में सोचा भी नहीं था. पर सन् 1948 में ड्राफ्ट मतदाता सूची की तैयारी का  काम शुरू होने के कुछ ही महीनों के भीतर कई जिला अधिकारी नए-नए किस्म की समस्या से जूझते हुए पाए गए. उन्होंने रिपोर्ट किया कि कई राज्यों में, जैसे मान लीजिये संयुक्त प्रांत में ही बड़ी संख्या में महिलायें अपना नाम नहीं बताना चाहती हैं. ये महिलाएं चाहती थीं कि उनका नाम किसी की बेटी, किसी की पत्नी, किसी की विधवा के तौर पर या घर के किसी पुरुष सदस्य के नाम पर जिक्र किया जाए.

ब्रिटिश हुकूमत में कुछेक महिलाओं को मतदान करने का अधिकार था और इसी तरह अपना नाम देने का भी. पर आज़ाद भारत में सरकार ने स्पष्ट कर दिया कि किसी भी मतदाता को दूसरे के नाम से जोड़कर मतदाता सूची में शामिल होने की इजाज़त नहीं दी जायेगी.

अपने नाम के साथ मतदाता सूची में डालने के निर्वाचन आयोग के तमाम प्रयासों के बावजूद, बहुत बड़ी संख्या में महिलाओं ने अपने नाम के साथ सूची में खुद को रजिस्टर नहीं करवाया. उस समय के मुख्य निर्वाचन आयुक्त सुकुमार सेन ने अनुमान लगाया था कि अनुमानित 8 करोड़ महिला मतदाताओं में से लगभग 28 लाख अपना नाम बताने में असफल रहीं और उनसे सम्बंधित  जो भी आंकड़े मतदाता सूची में डाले गए थे उन्हें मिटाना पड़ा. इस तरह इतनी बड़ी संख्या में महिलायें चुनाव प्रक्रिया में भाग लेने से वंचित रह गईं.

देश में हो रहे पहले चुनाव की पूर्व संध्या पर सेन ने इन महिलाओं का जिक्र करते हुए कहा था कि अगले चुनाव में इन महिलाओं का नाम मतदाता सूची में ज़रुर शामिल किया जाएगा.

तब से अब तक,लोकतंत्र में भागीदारी की अगर बात की जाए तो महिलाओं ने लम्बी यात्रा तय की है. महिलाओं की मतदाता के रूप में बढ़ती भागीदारी को इस बात से समझा जा सकता है कि देश में हुए तीसरे आम चुनाव (1962) में महज 46.6 प्रतिशत महिलाएं मतदान करने के लिए बाहर आईं, जबकि पुरुषों की भागीदारी 63.3 प्रतिशत थी. सन् 1962 में पुरुष और महिला मतदाताओं के बीच का अंतर 16.7 प्रतिशत था, जबकि 2014 के आम चुनाव आते- आते  यह घटकर महज़ 1.5 प्रतिशत रह गया.

इस पूरी यात्रा को अगर देखा जाए तो यह काफी संतोषप्रद माना जाएगा. लेकिन यह यात्रा तब तक अधूरी मानी जायेगी जब तक महिलाएं सिर्फ मतदाता ही नहीं बल्कि नीतिनिर्माता के तौर पर भी पुरुषों की बराबरी करती नज़र आयें. वर्तमान में यह स्थिति काफी निराशाजनक है. विशेषज्ञों की मानें तो विधानसभाओं में महिलाओं का प्रतिशत 7 से 8 और संसद में लगभग 11 प्रतिशत है.

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