सरकार, केंद्रीय सूचना आयोग को कोर्ट केस के नाम पर डरा रही है: पूर्व सूचना आयुक्त

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सौतुक डेस्क/

पूर्व सूचना आयुक्त श्रीधर आचार्युलु ने राष्ट्रपति को पत्र लिखकर बताया है कि सरकार, केंद्रीय सूचना आयोग को कोर्ट केस के नाम पर डरा रही है.

अंग्रेजी वेबसाइट स्क्रॉल.कॉम पर प्रकाशित एक खबर के मुताबिक़ आचार्युलु ने राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को पत्र लिखकर, हस्तक्षेप करने की मांग की है. इन्होंने कहा है कि लोगों को केस पर सुनवाई करते हुए, अगर सूचना आयुक्त संस्थाओं को सूचना देने का आदेश दे रहे हैं तो उन्हें केस कर डराने की कोशिश की जा रही है.

उदाहरण देते हुए पूर्व आयुक्त ने लिखा है कि गुजरात विश्वविद्यालय ने अब तक उन्हें तीन लीगल नोटिस भेजा है. श्रीधर आचार्युलु ने विश्वविद्यालय को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की डिग्री सार्वजनिक करने का आदेश दिया था. जवाब में विश्वविद्यालय ने इनके खिलाफ तीन नोटिस भेज दिए. पहला बतौर व्यक्ति, दूसरा बतौर सूचना आयुक्त और तीसरा बतौर केंद्रीय सूचना आयोग के प्रतिनिधि. इन्होंने अपने पत्र में राष्ट्रपति से पूछा है कि वे अकेले इन तीन रूपों में खुद का बचाव कैसे करेंगे?

उन्होंने लिखा है कि केंद्र सरकार ने सूचना आयोग को जवाब देते हुए कहा है कि किसी सरकारी कर्मचारी की शैक्षणिक योग्यता उसकी निजी सूचना है और उसे अगर सार्वजनिक किया गया तो यह उसकी निजता का हनन  कहा जाएगा. सनद रहे कि केंद्रीय सूचना आयोग भी सरकार के ही अधीन है. पूर्व आयुक्त ने लिखा है कि यह ऐसा है कि आपसे कहा जाए कि आप इसे सार्वजनिक करने का आदेश न दें, नहीं तो आपको कानूनी लफड़े में फंसा दिया जाएगा.

आचार्युलु ने लिखा है कि न्यायालय को अधिकार है कि सूचना आयोग के आदेश पर पुनर्विचार करे. लेकिन क्या सरकार केंद्रीय सूचना आयुक्त को हर मामले में पार्टी बना सकती है?

आचार्युलु ने लिखा है कि न्यायालय को अधिकार है कि सूचना आयोग के आदेश पर पुनर्विचार करे. लेकिन क्या सरकार केंद्रीय सूचना आयुक्त को हर मामले में पार्टी बना सकती है?

इन्होंने केंद्रीय रिज़र्व बैंक पर भी आरोप लगाया कि यह बैंक अमीर लोगों और संस्थाओं का बचा रहा है. खासकर उनको जिन्होंने देश और देशवासियों को अरबों रुपये का चूना लगाया है. रिज़र्व बैंक ने सूचना आयोग के आदेश को चुनौती दी है और इस आधार पर श्रीधर आचार्युलु ने यह आरोप लगाए हैं.

केंद्रीय बैंक ने आयोग के खिलाफ दो मामलों का उदाहरण दिया है जिसमें बैंक ने आयोग के फैसले के खिलाफ न्यायालय की शरण ली है.  एक मामला है स्थानीय स्वयंसेवी संस्थाओं को विदेशी चंदे के बाबत आदेश जिसमें इसका ब्यौरा देने को कहा गया था. इस मामले में बैंक ने बॉम्बे उच्च न्यायालय में अपील की है. दूसरा मामला है आयोग के उस फैसले पर जिसमें विलफुल  डिफाल्टर जिन्होंने जानबूझकर बैंक से लिया कर्ज नहीं लौटाया उसका नाम उजागर करने को कहा गया था.

आचार्युलु  ने लिखा है कि सूचना आयोग का काम है दूसरी अपील पर फैसला देना, वह भी बिना डरे-सहमे. लेकिन फिलहाल सूचना आयुक्त किसी भी कानूनी पचड़े में फंसाए जाने को लेकर डरे हुए हैं.

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