जनता को यह जानने का अधिकार नहीं है कि राजनितिक दलों को कौन फण्ड कर रहा है: सरकार

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शिखा कौशिक/

वर्तमान सरकार पारदर्शिता को मुद्दा बनाकर सत्ता में आई थी और अब इसी सरकार का कहना है कि पारदर्शिता की जरुरत नहीं है. इस सरकार के अनुसार, जनता को यह जानने का अधिकार नहीं है कि राजनितिक दलों को पैसा कौन दे रहा है और क्यों दे रहा है.

यह बात कहीं और नहीं बल्कि देश के सर्वोच्च न्यायलय में बृहस्पतिवार को कही गई जब इलेक्टोरल बांड पर सुनवाई चल रही थी.

अटॉर्नी जनरल के के वेणुगोपाल, न्यायालय में सरकार का पक्ष रख रहे थे जब उन्होंने कहा कि पारदर्शिता की खातिर न्यायालय इलेक्टोरल बांड ख़त्म नहीं सकती. इनके अनुसार इलेक्टोरल बांड काले धन को मिटाने के लिए किया गया एक प्रयोग था और न्यायालय को इसमें हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए. जबकि इस मुद्दे पर चुनाव आयोग का रुख एकदम विपरीत है.

वेणुगोपाल के ऐसा बोलने के चौबीस घंटे पहले निर्वाचन आयोग ने अदालत में कहा था कि इस इलेक्टोरल बांड से राजनितिक दलों को चंदा देने वाले का नाम पता छिपाना वैध हो गया है. आयोग का कहना था कि मतदान का अर्थ है कि मतदाता सबकुछ जानते समझते हुए अपने मत का इस्तेमाल करे. इस दिशा में किया गया प्रयास जैसे अपने उम्मीदवार को जानना “आधी कवायद” भर थी. मतदाताओं को यह भी पता होना चाहिए कि उन राजनितिक दलों को पैसा कौन दे रहा है जिससे उनके उम्मीदवार जुड़े हुए हैं.

अब तक इलेक्टोरल बांड्स से मिले चंदे का 95 प्रतिशत भारतीय जनता पार्टी के हिस्से में गया है

इसी के जवाब में वेणुगोपाल ने तर्क रखा कि इन सब लोगों के पूरे बहस का आधार यह है कि मतदाता को जानने का अधिकार है. क्या जानने का अधिकार? इन्होंने आगे कहा कि मतदाताओं को यह जानने की जरूरत नहीं है कि राजनीतिक दलों का पैसा कहां से आता है.

इस सरकार से यह सुनना कि मतदाता को यह जानने का अधिकार नहीं है कि राजनितिक दलों को चंदा अडानी से आ रहा है कि अम्बानी से. यह अपने आप में एक भद्दा मजाक है. यह स्पष्ट है कि ये उद्योगपति अगर चंदा देते हैं तो उनका कोई उद्देश्य भी छिपा होता है जो वे सरकार से करवाना चाहते हैं.

सनद रहे कि अब तक इलेक्टोरल बांड्स से मिले चंदे का 95 प्रतिशत भारतीय जनता पार्टी के हिस्से में गया है.

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