किसान आन्दोलन मध्य प्रदेश के रास्ते पहुंचा राजस्थान

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सौतुक डेस्क/

मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के बाद राजस्थान में किसानों ने सरकारी नीतियों के खिलाफ बिगुल फूंक दिया है. राजस्थान के सीकर जिले में 15,000 से अधिक किसान सितम्बर 1 से कृषि उपज मंडी में प्रदर्शन कर रहे हैं.
सीकर से शुरू यह विरोध प्रदर्शन अन्य जिलो में भी पहुँच चूका है जिसमे हनुमानगढ़, श्रीगंगानगर, चुरू, अलवर, झुंझुनू इत्यादि है. राजस्थान में करीब 70 फीसदी आबादी खेती-बारी से जुड़ी है. ये किसान न केवल सरकारी नीतियों से परेशान है बल्कि मौसम ने भी इनपर भारी ज्यादती की है.
इस साल की बाढ़ जैसी स्थिति से राज्य के कुछ हिस्सों में 80 प्रतिशत तक फसल बर्बाद हो गई है. इसी साल मार्च के महीने में हुई बरसात ने राज्य के कई हिस्सों में फसल बर्बाद कर दी. अगस्त में राजस्थान, जिसका नाम आते ही रेगिस्तान जेहन में आता है ने अजीबोगरीब बरसात देखी. इस बरसात से बाढ़ जैसी स्थिति आ गई और जालोर, सिरोही, बारमेर और पाली जैसे जिलों में बड़े पैमाने पर फसल नुकसान हुआ. सरकारी आंकड़े के अनुसार 8.34 हेक्टेयर पर लगी फसल को नुकसान हुआ है और किसान सरकार से इसका मुआवजा मांग रहे हैं. लेकिन सरकार की तरफ से अब तक कोई इशारा नहीं हुआ है.

तस्वीर प्रावदा मिथल के फेसबुक पोस्ट से साभार

यही सब देखते हुए किसानों के इस आन्दोलन को समाज के अन्य समूहों का समर्थन भी मिल रहा है. आन्दोलनरत इन किसानों के समर्थन में अन्य समूह जैसे आंगनवाड़ी कार्यकर्ता, व्यवसायी और तमाम कर्मचारी और ट्रांसपोर्ट संगठन ने भी अपनी आवाज उठाई है.

ऑल इंडिया किसान महासभा के बैनर तले चल रहा ये प्रदर्शन अब तक शांतिपूर्ण रहा है. प्रदर्शन कर रहे इन किसानों की मांगें वही हैं जो पिछले कुछ महीनो में अन्य राज्यों में देखने को मिली हैं जैसे कर्ज माफ़ी, स्वामीनाथन कमीशन के सुझाए कदमों का कार्यान्वयन, फसल का उचित दाम और समर्थन मूल्य पर उनके उत्पाद की खरीदारी, इसी साल जानवरों के खरीद-बिक्री पर लगी रोक को हटाना और किसानों के लिए पेंशन.

आम्र राम जो सीपीआई(एम) के पुराने नेता हैं वे ही इन किसानों की अगुवाई कर रहे हैं. मीडिया से बात करते हुए उन्होंने कहा कि आत्महत्या करना कायरता है इसलिए किसान को अगर अपनी जिंदगी त्यागनी है तो अपनी मांग के लिए लड़ेंगे.

मंगलवार को किसानों को जिला कलक्टर के ऑफिस पर धरना देना था अलबत्ता पुलिस ने उन्हें वहाँ जाने से रोक दिया. पर किसानों की 11 दिनों की मेहनत रंग लाई जब राज्य सरकार किसानों से बातचीत को तैयार हो गयी.

कर्ज माफ़ी पर विवाद

उत्तर प्रदेश के चुनावी घोषणापत्र में भारतीय जनता पार्टी ने किसानों के कर्ज माफ़ करने का वादा किया था. उसको देखते हुए भाजपा शासित अन्य राज्य जैसे महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश के किसानों ने भी यह मांग रखी. उनका तर्क था कि सूखे से सबसे अधिक प्रभावित यही राज्य है और जब एक ही राजनितिक दल एक राज्य में किसानों कर दर्द समझ रहा है तो दूसरे राज्य में क्यों नहीं.

इसको लेकर लम्बा आन्दोलन चला. मध्य प्रदेश के मंदसौर में आन्दोलनरत किसानों पर पुलिस ने गोली भी चला दी जिसमे 6 के करीब किसानों को अपनी जान गंवानी पड़ी थी. किसानों की बढ़ती मांग को देखते हुए महाराष्ट्र, पंजाब इत्यादि ने कर्जमाफी की घोषणा कर दी. मध्यप्रदेश को भी उपज के दाम में अंतर की भरपाई के लिए एक योजना लानी पड़ी.

अब किसानों की यह मांग अन्य राज्यों में भी होने लगी है. हाल ही में रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया ने कहा था कि अगर पूरे देश के किसानों का कर्ज माफ़ किया गया तो देश को काफी आर्थिक घाटा उठाना पड़ेगा. महंगाई दर बढ़ने का खतरा रहेगा.

इस सवाल के जवाब में किसानों का तर्क है कि ऐसी बाते तभी क्यों की जाती हैं जब कृषि कर्ज माफ़ी की बात होती है. जब सरकार कॉर्पोरेट संस्थानों के कर्ज माफ़ करती है, तब तो कोई इस तरह की बात नहीं करता .

दूसरी तरफ नरेन्द्र मोदी सरकार ने मवेशी के बेचने और खरीदने पर प्रतिबन्ध लगा दिया है. दी वायर से बात करते हुए एक किसान ने बताया कि इससे मवेशियों के भाव में जबरदस्त गिरावट आई है. जो गाय 50 हजार रुपये में बिकती थी अब महज 25 हजार में बिकती है. भैंस के दाम भी कुछ ऐसे ही गिरे हैं.

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