सरकार की किसान विरोधी नीतियों के खिलाफ दिल्ली में होगा किसानों का जमावड़ा

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फोटो: साभार 'द हिन्दू'

पिछले सप्ताह देश भर से आये मजदूरों ने दिल्ली में प्रदर्शन किया.अब बारी किसानों की है. आने वाले 20 नवम्बर को अखिल भारतीय किसान संघर्ष समिति के नेतृत्व में ये किसान सरकार को अपनी ताकत का एहसास करायेंगे.

किसानों के इस संगठन का कहना है कि फसलों की लागत और बिक्री का लेनदेन किसानों के हितों के विरूद्ध और कम्पनियों के पक्ष में है. खेती के विकास का ‘हरित क्रांति’ प्रारूप साम्राज्यवादी कम्पनियों के पक्ष का साबित हुआ है.  प्रधानमंत्री मोदी ने लोकसभा चुनाव का दौरान अगले पांच सालों में किसानों की आमदनी दो गुनी करने, कर्ज माफ करने,स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों के अनुसार सर्मथन मूल्य लागत का ड्योढ़ा करने के वादे किये थे.

इस साल सरकार ने खरीफ की 19 फसलों का समर्थन मूल्य घोषित किया जिनमें से 9 का समर्थन मूल्य सरकार द्वारा आंकलित लागत से भी कम है.  इस संगठन ने सवाल किया कि ऐसे में किसानों की आमदनी दो गुनी कैसे होगी? भाजपा-आरएसएस सरकार 2014 के अपने चुनावी घोषणापत्र व वादों से पीछे हट रही है.

कुछ राज्यों ने जनांदोलन के दबाव में कुछ कर्ज माफ किये, पर केन्द्र सरकार की घोषणाएं कर्जमाफी के खिलाफ है, सरकार कहती है कि कर्जमाफी और सब्सिडी के लिए उसके पास पैसा नही है. इससे बैंकों को घाटा होगा. पर उसने कॉर्पोरेट के 10 लाख करोड़ रुपए के बैंक कर्ज एनपीए में डाल दिये, जो वसूले नही जाएंगे. यह घाटा पूरा करने के लिए उसने 2.11 लाख करोड़ रुपए बैंकों को दिए हैं. उसने, हर साल की तरह, 2015 -16 के बजट में बड़े कॉर्पोरेट से 6.11 लाख करोड़ रुपए की टैक्स वसूली भी छोड़ दी.

इन किसानों को शिकायत है कि विदेशी कम्पनियों के बीज, खाद, कीटनाशक दवा इत्यादि बहुत महंगे हैं. सरकार हर वस्तु पर सब्सिडी घटा रही है, टैक्स बढ़ा रही है. टैक्स के कारण भारत में डीजल 58 रुपए लीटर है, जबकि श्रीलंका में 40, नेपाल में 46, पाकिस्तान में 49, बंगलादेश में 51 रुपए लीटर है. महंगाई के कारण कर्जदारी बढ़ रही है.

इनके अन्य शिकायतों में आगे है कि सरकार ने राशन में भी सस्ता गल्ला बंद कर छूट का नकद भुगतान शुरु किया है ताकि गल्ला सस्ते में न बिके और बड़े व्यापारी व कम्पनियां मनमाने रेट परअनाज बेच सकें. सरकारी राशन समाप्त होगा तो किसानों से समर्थन मूल्य पर खरीद भी बंद हो जाएगी व फसल सस्ते में बिकेगी. शांता कुमार समिति ने 2015 में ऐसा करने को कहा था. विदेशी कम्पनियों के पक्ष में संचालित विश्व व्यापार संगठन की शर्तों में भी 2018 तक ऐसा करने का निर्देश है.

कई सरकारें, उत्तर प्रदेश समेत, कारपोरेट खेती को बढ़ावा देने जा रही हैं. सरकार द्वारा की गयी नोटबंदी और जीएसटी तथा कैशलेस लेन-देन योजना के कारण किसानों को अपनी फसल का बाजारी रेट भी मिलना मुश्किल हो गया. इससे छोटे दुकानदार, व्यापारी और उत्पादक भी बर्बाद हो गए हैं. इससे भी बड़े व्यापारियों, विदेशी व घरेलू कॉर्पोरेटों को भारी लाभ मिल रहा है. वे किसानों की उपज सस्ते में खरीदकर महंगे में बेच रहे हैं.

मोदीजी ने यह तो ठीक ही दावा किया था कि 60 सालों से कांगे्रस ने किसानों को बरबाद किया, उन्हें मरने दिया है। पर 3 साल के मोदी शासन में भी किसान मर रहे हैं. उन पर सरकारी कर्ज 8.11 लाख करोड़ से 55 फीसदी बढ़कर 12.6 लाख करोड़ रुपये हो गया.

जब किसान लड़े, तब कर्जमाफी की कुछ घोषणाएं हुईं, जो कई शर्तों के साथ देने की बात कही गयीं. उत्तर प्रदेश में तो 1 व 2 रुपए जैसी तुच्छ रकमें माफ की गयीं. हम पहले लड़े थे तो भूमिहीनों के निजी कर्ज माफ करने के कानून केरल, पंजाब, तेलंगाना में बने थे और तेलंगाना में, लागत में राहत के लिए प्रतिएकड़, प्रति फसल, साल में दो बार 4000 रुपए सरकार ने घोषित किये.

 

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