आने वाले चुनावों में अगर भाजपा को कोई घेरेगा तो वह किसान होगा

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जितेन्द्र राजाराम/

आज छत्तीसगढ़ के कुछ हिस्सों में मतदान के साथ पांच राज्यों में मतदान का शंखनाद हो गया. अब देश में अगले छः सात महीनों तक चुनावी युद्ध चलता रहेगा और पक्ष और विपक्षी राजनितिक दल अपने नए-नए हथियार इस्तेमाल करते रहेंगे. ये राजनितिक दल जनता को लुभाने के प्रयास में लगे रहेंगे. इस प्रयास में सत्ताधारी दल के सामने सबसे बड़ी चुनौती है ग्रामीण समाज और कृषि संकट. हाल ही में आई एक रिपोर्ट के अनुसार कृषि में घटती आय और ग्रामीण क्षेत्र के अन्य मुद्दे जैसे बेरोजगारी इत्यादि की वजह से ग्रामीण समाज भाजपा से दूरी बना सकता है.

पिछले सप्ताह नोमुरा ब्रोकरेज द्वारा जारी एक रिपोर्ट में कहा गया कि राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में होने वाले आम राज्य चुनाव के परिणाम में 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव की कुछ झलकियाँ मिलेंगी. इन पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव परिणामों से यह अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि आगामी लोकसभा चुनाव में किसका पलड़ा भारी रहने वाला है.

इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि अगर ओपिनियन पोल को देखा जाए तो भाजपा तीनों राज्यों में अच्छा करेगी. पोल के अनुसार, भाजपा मध्य प्रदेश में सरकार बना सकती है पर वहीँ राजस्थान में उसे हार का मुंह देखना पड़ सकता है. छत्तीसगढ़ में परिणाम किसके पक्ष में आएगा इसका अनुमान लगाना मुश्किल है.

विशेषज्ञों की माने तो इन तीनों राज्यों में भाजपा के लिए सबसे बड़ी समस्या किसान ही हैं. पिछले दो सालों से लागातार हो रहे किसान आंदोलनों से इसका अनुमान लगाया जा सकता है. मध्य प्रदेश में तो साल भर पहले पुलिस ने आन्दोलन कर रहे किसानों पर गोली चला दी थी जिसमें कम से कम पांच किसान अपनी जान गंवा बैठे थे.

किसानों की बदहाल स्थिति ऐसी है कि वर्तमान सरकार पिछले तीन सालों से किसानों की आत्महत्या का आंकड़ा सार्वजनिक तक नहीं कर रही है

किसानों की बदहाल स्थिति ऐसी है कि वर्तमान सरकार पिछले तीन सालों से किसानों की आत्महत्या का आंकड़ा सार्वजनिक तक नहीं कर रही है. हाल ही में कृषि पर कार्य करने वाले दिग्गज पत्रकार पी साईंनाथ ने भी कहा कि वर्तमान सरकार की लाई फसल बीमा योजना राफेल से भी बड़ा घोटाला है.

इन सब बातों से इंगित होता है कि भारत के गाँव जिनकी अर्थव्यवस्था कृषि आधारित हैं वहाँ सबकुछ सही नहीं चल रहा है.

किसानों की ऐसी स्थिति सिर्फ इन पांच राज्यों में ही नहीं बल्कि पूरे देश में है. पिछले गुजरात के विधानसभा चुनाव में किसानों ने सरकार से मुंह मोड़ लिया था और यही वजह थी कि भाजपा की हालत ख़राब हो गई थी. अलबत्ता यह दल पुनः सत्ता में आने में सफल हो गया पर बहुत मुश्किल से.

इसलिए यह कहा जा रहा है कि 11 दिसम्बर को घोषित होने वाले इन पांच राज्य चुनावों के परिणाम यह समझने में मदद करेंगे कि देश का मूड क्या है और किसान किस हद तक सत्तारूढ़ दल से नाराज़ है.

शायद यही वजह है कि कुछ विशेषज्ञ जो सत्तारूढ़ दल के करीब हैं उन्होंने राय देना शुरू कर दिया है कि इन राज्यों के चुनाव परिणाम की घोषणा लोकसभा के चुनाव तक घोषणा नहीं की जानी चाहिए. उनका मानना है कि इसका सीधा असर लोकसभा चुनावों के परिणाम पर पड़ सकता है.

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