इलेक्टोरल बांड: इसको समझने से सरकार की मंशा साफ़ समझ आती है

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शिखा कौशिक/

इलेक्टोरल बांड फिर एक बार चर्चा में है. वजह है, बड़ी मात्रा में इलेक्टोरल बांड के तहत राजनितिक दलों को चंदा दिया जाना. भारतीय स्टेट बैंक द्वारा पिछले तीन महीनों के दौरान 1,716 करोड़ रुपये के इलेक्टोरल बॉन्ड बेचे गए हैं. इस साल के तीन महीने का आंकड़ा पूरे 2018 में बेचे गए इलेक्टोरल बांड से बहुत अधिक है. 2018 में कुल1,056 करोड़ रुपये के बॉन्ड बिके थे.

पूना के रहने वाले एक आरटीआई कार्यकर्ता, विहार ध्रुवे को यह जानकारी सूचना के अधिकार के तहत दी गई है.

इलेक्टोरल बांड जब से आया है इसपर चुनाव में भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने का आरोप लगता रहा है. एक गैर-सरकारी संगठन, एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की है कि राजनितिक दलों को इलेक्टोरल बांड्स के तहत चंदा देने की इस प्रणाली को रद्द कर दिया जाए. देश की शीर्ष अदालत इस याचिका पर सुनवाई कर रही है.

सनद रहे कि 27 मार्च को चुनाव आयोग ने सर्वोच्च न्यायालय में दाखिल अपने हलफनामे में स्पष्ट कहा था कि नरेन्द्र मोदी सरकार द्वारा इलेक्टोरल बॉन्ड लाना और कॉर्पोरेट फंडिंग पर लगी सीमा को हटाना, देश में चुनावी प्रक्रिया से सम्बंधित पारदर्शिता को बुरे तौर पर प्रभावित करेगी. अदालत, एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें चुनावी बांड की योजना की वैधता को चुनौती दी गई है.

चुनाव आयोग ने 26 मई, 2017 को केंद्र सरकार को इस बारे में पत्र लिखा था और अपनी आपत्ति दर्ज कराई थी. निर्वाचन आयोग ने अपने पत्र में इलेक्टोरल बांड से पारदर्शिता के प्रभावित होने की बात की थी

नरेन्द्र मोदी की सरकार सत्ता में भ्रष्टाचार को ख़त्म करने के वादे के साथ आई थी पर इलेक्टोरल बांड से इनका यह वादा ध्वस्त होता है. यही नहीं सरकार ने अपने इस कदम के बचाव में कई बार झूठ तक बोला है.

जैसे दिसंबर 2018 में, सरकार ने राज्यसभा में दावा किया था कि इलेक्टोरल बॉन्ड पर चुनाव आयोग ने कोई आपत्ति नहीं दर्ज की है. जबकि एक और आरटीआई कार्यकर्ता और सेवानिवृत्त कमोडोर लोकेश बत्रा के पास उपलब्ध दस्तावेज़ों से पता चलता है कि चुनाव आयोग ने 26 मई, 2017 को केंद्र सरकार को इस बारे में पत्र लिखा था और अपनी आपत्ति दर्ज कराई थी. निर्वाचन आयोग ने अपने पत्र में इलेक्टोरल बांड से पारदर्शिता के प्रभावित होने की बात की थी.

नवंबर 2018 में पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत ने कहा था कि सरकार ने इस इलेक्टोरल बांड से सम्बंधित चुनाव आयोग के किसी भी डर को दूर करने के लिए कोई कदम नहीं उठाया है.

केंद्र सरकार ने 2 जनवरी, 2018 को इलेक्टोरल बॉन्ड स्कीम को अधिसूचित किया था. इसके प्रावधान के अनुसार, कोई भारतीय नागरिक या संस्था  इन इलेक्टोरल बॉन्ड को खरीद सकता है. ये इलेक्टोरल बांड राजनितिक दलों को चंदा देने के लिए होता है. उन पंजीकृत राजनितिक दलों को जिन्होंने पिछले आम चुनाव या विधानसभा चुनावों में मतदान में कम से कम एक एक प्रतिशत वोट हासिल किया हो, उन्हें ये इलेक्टोरल बांड चंदे के तौर पर दिया जा सकता है. इसमें सबसे बड़ी बात यह है कि इलेक्टोरल बांड के तहत चंदा देने वाले का नाम पता नहीं लगाया जा सकता.

किस राजनितिक दल को इस इलेक्टोरल बांड के तहत कितना चंदा मिला इसका पता लग सकता है लेकिन यह भी तभी संभव होगा जब राजनितिक दल निर्वाचन आयोग को सालाना दिए जाने वाले अपने खर्चे का ब्यौरा दें. यह रिपोर्ट सारे राजनितिक दलों को साल में एक बार निर्वाचन आयोग को देनी होती है. वर्ष 2018-19 में खरीदे गए इलेक्टोरल बॉन्ड का लगभग 94.5 प्रतिशत भारतीय जनता पार्टी के हिस्से में गया है. इससे जाहिर होता है कि इलेक्टोरल बांड की पूरी प्रणाली सवालों के घेरे में हैं और इससे पारदर्शिता, जैसा की मोदी सरकार कह रही है, बढ़ी नहीं है बल्कि घटी है. देखना यह है कि सर्वोच्च न्यायालय इसपर क्या फैसला लेता है!

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