विस्थापितों को सता रहा फिर विस्थापन का डर, संघर्ष जारी

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उमंग कुमार/

मान लीजिये कि आप उन लाख लोगों में से एक हैं जिनको बेघर कर दिया गया. आपका घर, ज़मीन, मवेशी सबकुछ आपसे छीन लिया गया. आपको यह बताते हुए कि यहाँ एक बांध बनाया जाएगा जिससे लाखों हेक्टेयर जमीन पर सिंचाई हो सकेगी. सब कुछ हो गया. आप जैसे लाखों लोग उजड़ गए, बाँध बन गया और अब उस बाँध के पानी का इस्तेमाल बस मछली पकड़ने किया जा रहा हो तो आपको कैसा लगेगा. इतना ही नहीं, आपको उजाड़ने वाले करीब चालीस साल बाद फिर से आपके पास आयें और कहें कि आप को फिर से उजाड़ना है.

यह किसी कहानी का हिस्सा नहीं है. सत्तर के दशक में  मध्य प्रदेश के जबलपुर के पास एक बरगी बांध बनना शुरू हुआ. एक लाख चौदह हजार लोगों को उनके घर और ज़मीन से बेदखल कर दिया गया. दावा किया गया कि इस बाँध के पानी से 4.37 लाख हेक्टेयर जमीन की सिंचाई होगी. इन लोगों को अपने मूल से उजड़े चालीस साल से ऊपर हो गए और अभी सिंचाई होती है बमुश्किल 24 हजार हेक्टेयर जमीन की, जो कि तय लक्ष्य का मुश्किल से 5-6 प्रतिशत है. इससे 90 मेगावाट बिजली भी पैदा होती है जबकि लक्ष्य रखा गया था 105 मेगावाट का. बांध का निर्माण 1974 में शुरू हुआ और यह 1990 में बनकर तैयार हुआ. इस बांध से प्रभावित होने वाले जिले थे मंडला और सिवनी.

मगर, मुख्य मुद्दे पर आने के पहले पुनर्वास की कहानी भी जानना ज़रूरी है. हाल ही में स्क्रॉल.कॉम ने एक खबर चलाई जिसमे बताया गया कि 2016 के दिसंबर महीने में राज्य के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अपनी बहुचर्चित नर्मदा यात्रा पर निकले. उनके आने के उपलक्ष्य में कुछ गाँव जो उस समय उजड़ गए थे और यहाँ-वहाँ बसे थे उनको राजस्व के खातों में डाला गया. मतलब इनलोगों को अब तक सरकार की कोई सुविधा, कल्याणकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिल रहा था. कम से कम तीन दशक यानी तीस साल बाद तक.

अब इनके दूसरे हिस्से का संघर्ष शुरू होता है. सरकार मंडला में एक परमाणु संयंत्र लगाना चाहती है. यह चुटका परमाणु परियोजना के नाम से जाना जायेगा. इसको लेकर वहाँ कई सालों से विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं.

जन आन्दोलनों का राष्ट्रीय समन्वय के दावे के अनुसार इस परियोजना से तीन गाँव और टाउनशिप से एक गाँव विस्थापित होगा.  रेडिएशन के कारण 50 किमी. तक का क्षेत्र में प्रभाव होगा. एक रिपोर्ट के हवाले से इस समूह का दावा है कि 575 गाँव प्रभावित होने वाले हैं जिसमें 54 गाँव पर सघन प्रभाव होगा. इनमे से 38 गाँव में आदिवासी निवासरत हैं जो कि पहले से ही बरगी बांध से प्रभावित थे.

एक और ख़ास बात है जानने की. मध्यप्रदेश का मंडला जिला संविधान की पांचवी अनुसूची आदिवासी क्षेत्र की विशेष व्यवस्थाद्ध के तहत वर्गीकृत है जहाँ पंचायत कानून पेसा प्रभावशील हैं.  इस कानून के लागू होने का मतलब आखिरी निर्णय पंचायत का ही मान्य होगा. इस समूह के दावों के अनुसार चुटका परमाणु परियोजना के खिलाफ कई ग्राम सभाओं ने विरोध में प्रस्ताव पारित किये है, फिर भी परियोजना कार्य को आगे बढाया जा रहा है.

कुछ लोगों का तो यह भी दावा है कि बिना सहमति के, अधिकृत परियोजना प्रभावितों के खाते में मुआवज़े का पैसा भी जमा कर दिया गया है.

इसके विरोध में अब ये लोग एक जन चेतना यात्रा निकाल रहे हैं जिसका समापन 11 दिसम्बर 2017 को मंडला में चेतावनी रैली और सभा के आयोजन के साथ करने की योजना है.

(इस लेख में इस्तेमाल तस्वीर dianuke.org से साभार ली गई है.)

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