नौ साल बाद आई बाढ़, दोगुने से अधिक नुकसान और राहत आधा

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उमंग कुमार/

बिहार भयंकर बाढ़ की मार झेल रहा है और राज्य के लगभग आधे जिलों के 1.71 करोड़  से अधिक लोग इससे प्रभावित हैं. देश के प्रधानमंत्री ने भी राज्य का दौरा कर लिया है और राहत के नाम पर 500 करोड़ रुपये का पैकेज देने की घोषणा कर दी है. यह रकम 2008 में आई बाढ़ में दी गई राहत पैकेज से आधी है. जबकि नुकसान उस वर्ष की तुलना में दोगुने से भी अधिक हुआ है.

बिहार में बाढ़ से अब तक 440 लोग मर चुके हैं. इस बार के बाढ़ में 19 जिलों के करीब पौने दो करोड़ लोग प्रभावित हुए हैं. कुल 95 मृत्यु के साथ अररिया जिले में मरने वालों की संख्या सबसे अधिक है. अन्य प्रभावित जिलों में सीतामढ़ी, पश्चिम चंपारण, कटिहार, किसनगंज, मधुबनी, पूर्वी चंपारण, दरभंगा, मधेपुरा, सुपौल, गोपालगंज, पूर्णिया, मुजफ्फरपुर, खगड़िया, सारण, और सहरसा इत्यादि शामिल है.

वैसे तो बिहार हर साल बाढ़ की मार झेलता है पर इस बार के प्रभाव की तुलना अगर की जायेगी तो वर्ष 2008 के बाढ़ से की जायेगी जिसमें पांच जिलों के करीब 40 लाख लोग प्रभावित हुए थे.

बिहार में आई बाढ़ का एक दृश्य

तब भी राज्य के मुख्यमंत्री नितीश कुमार ही थे पर केंद्र में मनमोहन सिंह की सरकार थी. उस समय नितीश का जनता दल (यू) एनडीए का सदस्य था यानि नितीश विपक्ष के सदस्य थे. नितीश कुमार मनमोहन सिंह से मिले और केंद्र सरकार ने उस साल आई बाढ़ को राष्ट्रीय आपदा घोषित किया था और एक हजार करोड़ से अधिक की राशि राहत कार्य के लिए दी थी. अलबत्ता वो रकम भी राहत के लिए काफी नहीं थी.

इस साल राज्य में आई बाढ़ क्षेत्रफल, हानि व पानी की दृष्टि से बहुत बड़ी, विकराल व भयावह है. ऐसी बदहाल स्थिति में देश के प्रधानमंत्री द्वारा बाढ़ पीड़ितों के हवाई सर्वेक्षण के बाद सिर्फ 500 करोड़ की राशि का आवंटन बिहार के बाढ़ पीड़ितों के साथ मजाक है, ऐसा कहना है जन आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय (एनएपीएम) का.

सनद रहे कि इस बार नितीश हाल ही में भाजपा के सहयोग से राज्य के मुख्यमंत्री हैं और बाढ़ से नुकसान राज्य को दोगुने से भी अधिक हुआ है. अलबत्ता नरेन्द्र मोदी ने यह जरुर कहा है कि अगर बाढ़ का सही आंकलन आ जाए तो राहत राशि बढ़ाई भी जा सकती है. लेकिन यह स्पष्ट नहीं हो पाया कि जब राज्य सरकार के अभी के आंकड़े ही नुकसान को इतना बता रहे हैं तो महज़ 500 करोड़ रुपये ही क्यों.

एनएपीएम का कहना है कि यदि उस समय की बाढ़ के नाम पर मिली रकम की तुलना इस साल की रकम से की जाए और उसमें 9 सालों में बढ़ी महंगाई को भी शामिल किया जाए तो प्रधानमंत्री द्वारा दी गयी 500 करोड़ की राशि तो सिर्फ खानापूर्ति लग रही है, ऐसे में भला कैसे राहत कार्य होगा. यह तो पीड़ितों के साथ घिनौना मजाक है.

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