दशकों का सरकारी प्रयास फेल, भ्रूण हत्या बदस्तूर जारी

0
thenortheasttoday.com
फोटो: द नार्थईस्ट टुडे से साभार

शिखा कौशिक/

कुछ साथियों की एक टीम हाल ही में हरियाणा के हिसार जिले के दौरे पर थी. वे लोग गाँव-गाँव घूम कर एक सर्वेक्षण कर रहे थे. जिसमें उनको शौचालय सम्बंधित लोगों की जरुरत को समझना था. एक जगह गाँव वाले इकट्ठा थे और सर्वेक्षण के लिए गई टीम उनसे बात कर रही थी जब उनकी नज़र कुछ दूर एक घर पर गई, जिसके बाहर एक आदमी लाठी लिए बैठा हुआ था. बार-बार अन्दर से दरवाजा खुलता था और वह आदमी उसे बंद कर देता था. टीम उसके दरवाजे पर भी गई. स्वाभाविक है उसने बड़ी ही रुखाई से बात की.

जब लोगों ने उससे पूछा कि आपने शौचालय क्यों बनवाया है तो उसका जवाब था, “20 हजार रुपये देकर दुल्हन खरीद कर लाया हूँ तो क्या सबको दिखाने के लिए उसे बाहर भेजूं.” मतलब अपनी पत्नी को बंगाल से खरीद कर लाये इस पुरुष ने अपने घर में सिर्फ और सिर्फ इसलिए शौचालय बनवाया था कि उसकी पत्नी बाहर न जा सके और लोग उसे न देखें.

ऐसी स्थिति इसलिए आई है कि हरियाणा में पुरुषों को शादी के लिए महिलायें नहीं मिलती हैं. इसके लिए वे बंगाल, उड़ीसा जैसे राज्यों से अपने लिए दुल्हन खरीद कर लाते हैं. हरियाणा वह राज्य है जहां प्रति हजार पुरुषों पर मात्र 879 महिलायें हैं. मतलब राज्य में प्रति हज़ार लोगों में से करीब 120 लोगों को शादी के लिए किसी अन्य राज्य पर निर्भर करना पड़ेगा. यह तब है जब अन्य राज्यों की स्थिति भी बहुत बेहतर नहीं है.

यह परिवर्तन कई सालों से हो रहे भ्रूण हत्या की वजह से आया है. इसने पूरे भारत में लिंगानुपात की समस्या को विकराल बना दिया है. यूनिसेफ की एक रिपोर्ट के अनुसार, बच्चों के लिंगानुपात में गिरावट आसानी से देखी जा सकती है. 1991 में जहां 1000 लड़कों पर 947 लडकियां मौजूद थीं, दस साल बाद यह संख्या घटकर 927 हो गई.

स्रोत- राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण , 2016

 

सबसे दुखद पहलू

भारत में लिंग परिक्षण और भ्रूण हत्या को रोकने के लिए ढेरों कानून हैं पर इसका कोई प्रभाव असल में होता नहीं दिख रहा है. पहला कानून है मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ़ प्रेगनेंसी (MTP) एक्ट 1971, जिसके अनुसार 20 हफ्ते से ऊपर के भ्रूण होने के बाद गर्भपात नहीं कराया जा सकता है. और दूसरा है प्रीनेटल  डायग्नोस्टिक टेक्निक (रेगुलेशन एंड प्रिवेंशन ऑफ़ मिसयूज) एक्ट, 1994 जो कि भ्रूण के लिंग जांच को अवैध बनाता है. इनमें कुछ सुधार 2002 में भी किया गया. हालांकि इन कानूनों से कोई सुधार होता नहीं दिख रहा है. पिछले पांच सालों के आंकड़े देखे जाएँ तो लड़कों के बनिस्बत लड़कियों की संख्या घटी ही है. (देखिये ग्राफ).

आलम यह है कि पिछले साल महिला बाल विकास मंत्री मनेका गांधी ने यह तक सुझाव दे डाला कि लिंग परिक्षण को वैध बनाया जाए. इन्होंने  माना कि अब तक के कानून भ्रूण हत्या को नहीं रोक पाए हैं. इनके अनुसार अगर लिंग परिक्षण को वैध बनाया जाएगा और होने वाले बच्चे का लिंग एक बार पता चल गया तो उस गर्भवती महिला को आसानी से अध्ययन किया जा सकता है और उसपर नज़र रखी जा सकती है.

हालांकि इस सुझाव की बहुत शिकायत हुई थी क्योंकि आखिर में इस कानून को लागू कराने की ज़िम्मेदारी भी उसी सरकारी अमले पर होगी जो अब तक कुछ नहीं कर पाया है.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here