बिना ब्याज़ के लेन-देन वाले इस्लामिक बैंक देश में नहीं खुलेंगे: आरबीआई

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सौतुक डेस्क/

अधिक से अधिक लोगों को बैंकिंग व्यस्था में शामिल करने के लिए पिछले सात सालों से इस्लामिक बैंकों को शुरू करने और आगे बढाने का सुझाव देने वाले भारतीय  रिज़र्व बैंक ने अचानक से यह निर्णय लिया है कि वह इस्लामिक बैंक के आईडिया को अब आगे नहीं बढाने वाला. शरिया नियमों से चलने वाले यह बैंक पैसे के लेन-देन पर सूद का लेन देन नहीं करते क्योंकि इस इस्लाम में सही नहीं माना गया है. बैंकिंग व्यवस्था पर काम करने वाले विशेषज्ञों का मानना है कि कमजोर तबके को देखते हुए यह एक बेहतरीन बैंकिंग प्रणाली हैं क्योंकि इससे गरीबों पर सूद का भार नहीं पड़ता.

यह देखते हुए कि कुछ लोग सूद के लेन देन की वजह से इनका इस्तेमाल नहीं करते, इस्लामिक बैंक का विचार केंद्रीय बैंक के पूर्व गवर्नर घुराम राजन ने दिया था.

अब इस्लामिक बैंकों को आगे नहीं बढाने के निर्णय का खुलासा, रिज़र्व बैंक ने एक आरटीआई के जवाब में किया है. अपने जवाब में केंद्रीय बैंक ने कहा है कि इस आईडिया को आगे नहीं बढाने का फैसला सभी के लिए ‘वृहत और बराबर मौके’ उपलब्ध कराने के उद्देश्य से किया गया है.

आरटीआई में आरबीआई से ‘ब्याज रहित’ इस्लामिक बैंक शुरू करने के  लिए अभी तक क्या-क्या कदम उठाये गए हैं, इसकी जानकारी मांगी गई थी. सनद रहे कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 2014 के अगस्त में अधिक से अधिक लोगों को बैंको से जोड़ने के लिए जन धन योजना लागू की थी. इसी तरह आर्थिक सुधारों के मद्देनजर एक कमिटी ने वर्ष 2008 में ब्याज रहित बैंकिंग प्रणाली पर विचार करने का सुझाव दिया था. रघुराम राजन इस कमिटी के प्रमुख थे जो बाद में केंद्रीय बैंक के गर्वनर बने.

यह देखते हुए कि कुछ लोग बैंको में सूद के लेन-देन की वजह से इनका इस्तेमाल नहीं करते, इस्लामिक बैंक का विचार केंद्रीय बैंक के पूर्व गर्वनर रघुराम राजन ने दिया था

कमिटी ने कहा था कि कुछ धर्मों में ब्याज लेना सही नहीं माना जाता जिससे उस धर्म के अनुयायी लोग वर्तमान बैंको के इस्तेमाल करने से परहेज करते हैं. ब्याज-रहित प्रणाली पर काम करने वाले बैंको के नहीं होने से बहुत बड़ी संख्या में, जिसमे कमजोर और गरीब तबके के लोगों की संख्या अधिक है, वे बैंको से मिलने वाली सुविधा से वंचित रह जाते हैं.

बाद में केंद्र सरकार के आदेश पर आरबीआई में एक इन्टर डिपार्टमेंटल ग्रुप(आईडीजी) बनाया गया जो इस मुद्दे की गहन पड़ताल करने वाला था. इसमें इस्लामिक बैंक शुरू करने में आने वाली अडचनों जिसमें कानूनी और तकनीकी मुश्किलें शामिल थीं, पर विचार करना था. इस कमिटी ने सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंप दी थी.

यहाँ तक कि पिछले साल तक आरबीआई इस बैंक को शुरू करने के पक्ष में था.  पिछले साल फरवरी में केंद्रीय बैंक ने यह आईडीजी रिपोर्ट वित्त मंत्रालय को भेजा और सुझाव दिया कि वर्तमान में मौजूद बैंको में कोई व्यस्वस्था शुरू कर छोटे पैमाने पर ब्याज रहित बैंकिंग शुरू की जाए. बैंक ने उस रिपोर्ट में सुझाव दिया था कि चूँकि इस्लामिक बैंक का भारत को कोई अनुभव नहीं है इसलिए इस्लामिक बैंकों की तरफ धीरे-धीरे बढ़ा जाना चाहिए.  शुरुआत में कुछ प्रोडक्ट्स जिनको लागू करना आसान है उनकी शुरुआत सरकार के सामान्य निर्देश मिलने पर की जा सकती है.

लेकिन देश जब धार्मिक ध्रुवीकरण की समस्या पर मंथन कर रहा है और सरकार पर एक ख़ास धर्म की तरफ झुकाव होने पर प्रश्न खड़े हो रहे हैं, उस समय जेहन में यह सवाल आना लाजिमी है कि रिज़र्व बैंक का इस्लामिक बैंक के आईडिया से पीछे हटना क्या साधारण विचार-विमर्श की वजह से है या यह भी एक बड़े पैटर्न का हिस्सा है.

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