चुनाव का मौसम देश में ही नहीं पूरी दुनिया में चल रहा है

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शिखा कौशिक/

कल यानि 11 अप्रैल को पहले चरण के मतदान के साथ देश में चुनाव शुरू हो जाएगा. इसके ठीक दो दिन पहले, 9 अप्रैल को इजरायल में चुनाव हुए. कहने का तात्पर्य यह कि देश के लोगों पर चुनावी बुखार चल रहा है लेकिन यह अलहदा नहीं है. दुनिया में सब तरफ ऐसा ही हो रहा है.

इस साल यानि 2019 में भारत समेत 33 से भी अधिक देश के लोग अपनी सरकारों का चुनाव कर रहे हैं. दुनिया के दो अरब लोग अपने देश की सत्ता का उथल-पुथल देखेंगे.

इसी तरह 2018 में, 66 देशों में हुए चुनावों में लगभग 3 अरब लोगों ने मतदान कर अपने-अपने देश का भविष्य तय किया. चूंकि दुनिया में वैश्वीकरण के बाद अब धीरे-धीरे संरक्षित अर्थव्यवस्था को आवाज़ मिलने लगी है और यह सब इसलिए कि वैश्वीकरण कुछ देशों के हित में काम करता नहीं दिख रहा है. इन्हीं सब बातों को देखते हुए कई देशों में आर्थिक विकास एक बड़ा मुद्दा बनकर सामने आया है. कृषि और विनिर्माण भी चुनावी मुद्दों के केंद्र में हैं.

दुनिया के सभी महाद्वीप चुनावी सरगर्मी महसूस कर रहे हैं. अगर उन देशों की बात करें जहां चुनाव होने वाले हैं या हो रहे हैं तो लगभग दुनिया के सभी महाद्वीप इस परिधि में आ जायेंगे. ये सभी देश मिलकर वैश्विक विकास की नयी परिभाषा तय करेंगे.

इस साल यानी 2019 में भारत समेत 33 से भी अधिक देश के लोग अपनी सरकारों का चुनाव कर रहे हैं. दुनिया के करीब दो अरब लोग अपने देश की सत्ता का उथल पुथल देखेंगे

इस साल हो रहे चुनावों में अफ्रीका जैसे महाद्वीप के सामने वही पुराने सवाल हैं कि क्या लोकतंत्र इस द्वीप को सदियों की गरीबी से उबार पायेगा. वहीँ उत्तरी एवं दक्षिणी अमेरिका के चुनावों में आपदा एवं पुनर्वास से जुड़े हुए मुद्दे छाये रहेंगे. आर्थिक मंदी के दौर से गुज़रे रहे इन देशों को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा. अमेरिकी नीतियों के बदलते तेवर की आंच भी चर्चा में बनी रहेगी. अर्थव्यवस्था की बिगडती हालत यहाँ प्रमुख मुद्दा है और इन देशों को इस दुविधा को झेलना पड़ेगा कि अर्थव्यस्था को पुनः पटरी पर लाने के लिए किन प्राकृतिक संसाधनों को लेकर समझौता करना है और किनको लेकर नहीं.

वैश्विक अर्थव्यवस्था को लेकर चल रही बहस के केंद्र में एशिया है. इस महाद्वीप में होने वाला तेल उत्पादन ही वैश्विक उर्जा बाज़ार का रुख तय करेगा. ऐसे में वैश्विक शासन की चुनौती को भी याद रखना होगा, जैसे अरब देशों में लोकतंत्र कितनी जडें जमा पाता है.

दूसरी ओर चुनावी लोकतंत्र में लोगों का भरोसा कम होता जा रहा है. हर कुछ साल पर होने वाले इन चुनावों को लोकतंत्र कहकर जश्न मनाना अलग बात है. पर यह भी ध्यान रखने की बात है कि इन मतदानों से से चुनी सरकारें लोगों के उम्मीदों पर खरा नहीं उतर रही हैं.  और इसलिए भविष्य में लोकतंत्र के वर्तमान विचार को चुनौती मिल सकती है. खासकर, तब जब चहुँ ओर बेरोज़गारी की समस्या बढ़ रही है. प्रदर्शन के लिए युवा सड़क पर उतर रहे हैं. बड़े देश जैसे अमेरिका और ब्रिटेन में वैश्वीकरण के खिलाफ माहौल बन रहा है. डोनाल्ड ट्रम्प खुलकर खेल रहे हैं तो ब्रिटेन का यूरोपियन यूनियन से बाहर निकलना एक उदाहरण हैं. यह सब वर्तमान विकास के मॉडल से मोह भंग होने जैसा है.

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