यह भी कोई कानून है महाराज!

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दो महीने की जेल, 50,000 रुपये पर ज़मानत, लेकिन किस अपराध के लिए

उमंग कुमार/

आपको यह जानकार ख़ुशी होगी कि रेयान स्कूल के मामले में पकड़ा गया बस कंडक्टर करीब दो महीने जेल में रहने के बाद आज यानि बुधवार को जेल से बाहर आ जायेगा. लेकिन आपके मन में यह सवाल नहीं आया कि वो अब तक जेल में था ही क्यों?

एक महीने से ऊपर तो हो गया जब सीबीआई ने 7-वर्षीय छात्र प्रद्युम्न ठाकुर की हत्या के आरोप में उसी स्कूल की ग्यारहवीं कक्षा के एक छात्र को गिरफ्तार किया था. उस आरोपी बच्चे ने भी इकबालिया बयान दे दिया है. उसके कंप्यूटर से मारने की तरकीब खोजने के सबूत मिले हैं.

वहीँ एक महीना हो गया जब सीबीआई ने अशोक कुमार, बस कंडक्टर को कागज़ पर तो नहीं पर मीडिया में क्लीनचीट दे दिया था. सीबीआई ने हरियाणा पुलिस को अपने कमाल का प्रदर्शन दिखाने और हत्या की घटना के कुछ ही घंटो के भीतर अशोक कुमार को मुजरिम साबित करने के लिए आड़े हाथों भी लिया. अशोक कुमार की गिरफ्तारी सितम्बर 8 को हुई थी. उस पर यह आरोप लगाया गया कि अशोक उस बच्चे का शारीरिक शोषण करना चाहता था.

प्रद्युम्न ठाकुर

सीबीआई के हस्तक्षेप की वजह से यह मान भी लिया गया कि मामला बड़े स्तर का है. जिस एसोसीएशन पहले मामले में यह तय किया कि अशोक कुमार का केस कोई नहीं लडेगा, उन्हीं वकीलों ने तुरत-फुरत में इस लड़के का केस हाथों में ले लिया. यहाँ तक कि वे चैनल वाले जिन्होंने इस मामले में महाखुलासा करते हुए अशोक कुमार का इकबालिया बयान भी टीवी पर चला दिया, सबने हरियाणा पुलिस की लानत मलामत की. सोशल मीडिया पर लोग हरियाणा पुलिस के कहानी बुनने की कला से प्रभावित होकर उन्हें बॉलीवुड में फिल्मों की स्क्रिप्ट लिखने की जिम्मेदारी लेने के सुझाव भी देने लगे. सतह पर आई जानकारियों को अगर एक साथ जोड़ा जाए तो यह भी मानी हुई बात है कि हरियाणा पुलिस ने सीसीटीवी फुटेज छिपाई ताकि असली मुजरिम को बचाया जा सके.

खैर, जब मामला स्पष्ट हो गया कि अशोक कुमार मुज़रिम नहीं है तो फिर उसको एक और महीने जेल में रहना क्यों पड़ा! अति तो तब हुई जब अपनी जमानत के लिए अशोक कुमार को खुद ही अपनी ज़मानत अर्जी डालनी पड़ी. करीब दस दिन पहले अशोक के वकील मोहित वर्मा ने जमानत की अर्जी डाली थी. अभी यह किस्सा ख़त्म नहीं हुआ है. मंगलवार को इस अर्जी पर सुनवाई करते हुए अशोक को जमानत भी दे दी लेकिन 50,000 रुपये के नकद मुचलके पर.

अब बताईये कि अशोक कुमार का परिवार वह पचास हज़ार रुपये कहाँ से लाया होगा. टीवी पर देखकर आपको समझ तो आ ही गया होगा कि यह परिवार गरीब तबके से आता है. उसके पिता ने मीडिया से बात करते हुए कहा है कि वह बहुत खुश हैं. ख़ुशी की वजह उसने बताई है कि अशोक के बच्चे रोज पूछते हैं कि पापा कहाँ गए हैं और कब आयेंगे. अब उनको उन बच्चों को इधर-उधर की बातों से बहलाना नहीं पड़ेगा.

अमीचंद यानी अशोक कुमार के पिता ने यह नहीं बताया कि उन्हें इस पचास हज़ार रुपये के बंदोबस्त करने में कितनी मशक्कत करनी पड़ी. उनको लग रहा होगा कि बेटे के जीवन के मुकाबले यह तत्कालीन दिक्कत कोई मायने नहीं रखती.

लेकिन उनको यह दिक्कत क्यों? आखिर उनके बेटे या फिर उनके घर से किसी ने भी ऐसा क्या किया है कि उनके परिवार के एक सदस्य को दो महीने के करीब जेल में गुजारना पड़ा. पचास हजार रुपये इकठ्ठा करना पड़ा.

खैर, जब मामला स्पष्ट हो गया कि अशोक कुमार मुज़रिम नहीं है तो फिर उसको एक और महीने जेल में रहना क्यों पड़ा

आपको नहीं लगता कि जब यह साबित हो गया कि अशोक कुमार इस केस का प्रमुख आरोपी नहीं है तो जिस पुलिस ने अशोक को गिरफ्तार किया था उसी पुलिस को खुद उसे लेकर उसके घर तक जाए और जो लोग वहाँ जमा हो कम से कम उनसे बोले कि कभी-कभी ऐसा हो जाता है. कम से कम इतना कहे कि पुलिस का काम ही ऐसा है, क्या किया जाए. शायद यही एक तरीका था जिससे अशोक कुमार और उनके परिवार की  पिछले दो महीने में हुई फजीहत की भरपाई कम से कम मानसिक रूप से हो पाती.

यहाँ तो यह हो रहा है कि अशोक कुमार को अभी भी कानून के सामने गिड़गिड़ाना पड़ रहा है कि उनको उनके घर जाने की इजाजत दी जाए. जिस पुलिस ने उनको पकड़ा था वो न जाने कहाँ गायब हो गयी है. और व्यवस्था तो यह है कि कुछ कहा नहीं जा सकता.

लगे हाथ यह भी जानकारी ले लीजिये कि पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने रेयान स्कूल के मालिकों को अग्रिम जमानत दे दी है और उन्हें निर्देश दिया है कि वो सीबीआई के जांच में पूरा सहयोग करें.

 

 

 

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