अटल बिहारी वाजपेयी की एक उपलब्धि जो आगे भी देश को मदद करती रहेगी

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सौतुक डेस्क/

भारतीय राजनीति में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का जीवन लम्बा और महत्वपूर्ण रहा है. इतना कि उनसे जुड़ी घटनाओं पर कई पुस्तक तैयार हो जाए. इसी अनुपात में उनको चाहने और नहीं चाहने वालों की संख्या भी मौजूद है. उनसे जुड़ी घटनाओं में पोखरण परमाणु परीक्षण, कारगिल-युद्ध में विजय, राष्ट्रीय सेवक संघ से उनकी नजदीकी, बाबरी मस्जिद विध्वंस में उनकी भूमिका, कांधार विमान अपहरण महत्वपूर्ण है. कुछ लोग इन घटनाओं को उपलब्धि तो कुछ खामियों की तरह देखते हैं. लेकिन वाजपेयी की कश्मीर नीति ऐसी रही है जिसकी सराहना सब करते हैं.

इसकी बानगी कल स्वतंत्रता दिवस के मौके पर देखने को मिली जब लाल किले से बोलते हुए देश के प्रधानमंत्री ने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के कश्मीर नीति को दोहराया.पिछले साल जम्मू कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती ने भी मोदी से कहा था कि कश्मीर समस्या का समाधान केवल वाजपेयी की नीतियों से ही किया जा सकता है.

वाजपेयी भारत के ऐसे पहले प्रधानमंत्री थे जिन्होंने कांग्रेस का न होते हुए भी पांच साल का अपना कार्यकाल पूरा किया था और उस कार्यकाल में उन्होंने भारत-पकिस्तान के सम्बन्ध को रास्ते पर लाने की भरपूर कोशिश की. अपने 1998 से लेकर 2004 तक के कार्यकाल में उनहोंने इस मुद्दे पर निरंतर चुनौतियों का सामना किया पर बातचीत के रास्ते को बंद नहीं किया.

क्या थी वाजपेयी की कश्मीर नीति?

वाजपेयी ने अपने कार्यकाल की शुरुवात से ही कश्मीर में शांति, समृधि लाने की बात की और जो रास्ता सुझाया वह था इंसानियत, जम्हूरियत, और कश्मीरियत. इस नीति को समर्थन देने वाला न केवल कश्मीर के शासकवर्ग रहा बल्कि अलगावादी समूह ने भी इसका स्वागत किया था.

वाजपेयी ने सारे विवादास्पद मुद्दों को बातचीत से हल करने की कोशिश की. उन्होंने बिना किसी तीसरी शक्ति के शामिल किये द्विपक्षीय बात-चीत पर भरोसा जताया. इसी सन्देश के साथ देश के पूर्व प्रधानमंत्री ने लाहौर तक की बस यात्रा की. यह यात्रा 19 फ़रवरी, 1999 को की गई थी. उस यात्रा में उन्होंने मीनार-ए- पकिस्तान की यात्रा की और वहाँ से भी पाकिस्तान के अस्तित्व के प्रति भारत का रुख स्पष्ट किया.

उन्होंने पाकिस्तान के लोगों को संबोधित करते हुए अपनी बात को मज़बूती से रखा. उनका यह भाषण लाहौर के गवर्नर हाउस में दिया गया और भारत-पाकिस्तान के चैनलों ने इसे प्रसारित किया. अपने उस भाषण में उन्होंने आपसी भरोसे की बात की. साथ ही साथ मिल कर भारतीय उपमहाद्वीप में गरीबी, आतंकवाद और ड्रग की समस्या से निपटने की अपील की. उनके भाषण का प्रभाव इतना गहरा था कि तब के पकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने कहा था कि वाजपेयी साहब अब तो आप पकिस्तान में भी चुनाव जीत सकते हैं.

वाजपेयी ने लाहौर समझौते पर भी हस्ताक्षर किया. यह 21 फ़रवरी 1999 को किया गया. इस समझौते के अनुसार भारत और पाकिस्तान को विवाद के सारे मुद्दे बातचीत के जरिये सुलझाने थे. इसमें कश्मीर का मुद्दा भी शामिल था. दोनों देशों के लोगों के बीच बातचीत और संपर्क को बढ़ावा देने की बात की गई थी.

दिल्ली और लाहौर के बीच एक बस सेवा भी शुरू की गई जिसका नाम सदा-ए-सरहद रखा गया. उन्होंने तब भी इस बस सेवा को बंद नहीं होने दिया जब पाकिस्तानी घुसपैठिये  कारगिल में भारतीय सीमा के अन्दर आ गए और करीब महीने भर की जंग के बाद उन्हें वापस खदेड़ा गया. इस जंग में सैकड़ों भारतीय सैनिक शहीद हुए. अलबत्ता यह बस सेवा बंद की गई, तब जब भारतीय संसद पर आतंकवादियों ने हमला किया. यह हमला 13, दिसंबर 2001 को हुआ था. इस बस सेवा को पुनः 16 जुलाई 2003 को बहाल किया गया जब पकिस्तान ने भारत सहित विश्व-समुदाय को आश्वासन दिया कि वह अपने जमीन को आतंकवादी गतिविधियों के लिए इस्तेमाल नहीं होने देगा.

उनके इस शान्ति अभियान में काफी मुश्किलें आई जैसे कारगिल युद्ध, भारतीय हवाई जहाज को हाई-जैक करना और कांधार ले जाना. लेकिन वाजपेयी अपने पूरे कार्यकाल के दौरान पकिस्तान से शान्ति और कश्मीर-मुद्दे को सुलझाने के लिए प्रतिबद्ध दिखे.

वाजपेयी के नाम अन्य उपलब्धियों में भारत का तीन बार प्रधानमंत्री होना शामिल है. आज दिवंगत हुए देश के एक दिग्गज नेता पहली बार  1996 में 13 दिन के लिए, दूसरी बार 13 महीने के लिए 1998-99 में और तीसरी बार 1999 से 2004 तक प्रधानमंत्री रहे.

देश को पहला सरकारी समाचार चैनल देने वाले इस नेता का जन्म कृष्णा देवी और कृष्णा बिहारी वाजपेयी के ग्वालियर के घर में 25 दिसंबर 1924 को हुआ. इनका परिवार मूलतः उत्तर प्रदेश का रहने वाला था.

वे चार दशकों तक भारतीय संसद के सदस्य थे. वे दस बार लोकसभा, और दो बार राज्य सभा के माध्यम से संसद में पहुंचे. बहुमुखी प्रतिभा के धनी इस नेता ने  वह स्वास्थ्य कारणों की वजह से 2009 में सक्रिय राजनीति से सन्यास  लेने से पहले तक लखनऊ, उत्तर प्रदेश के लिए संसद सदस्य के रूप में कार्य किया.  वाजपेयी पूर्व भारतीय जनसंघ के संस्थापक सदस्यों में से एक थे. उन्होंने 1968 से 1972 तक इसका नेतृत्व भी किया. वे प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई के कैबिनेट में विदेश मामलों के मंत्री थे.

जब जनता सरकार ध्वस्त हो गई, वाजपेयी ने जनसंघ को 1980 में भारतीय जनता पार्टी में पुनर्गठित किया. उन्हें वर्ष  2014 में भारत के राष्ट्रपति द्वारा भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान, भारत रत्न से सम्मानित किया गया था.

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