आपको लहसुन प्यास नहीं भाता पर दूसरों को तो खाने दो

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उमंग कुमार/

हाल ही में कर्नाटक में दिए जाने वाले मध्याह्न भोजन पर एक बड़ा विवाद हुआ. वजह थी, अक्षय पात्रा नाम की संस्था का भोजन में लहसुन प्याज नहीं शामिल करना. दो दिन पहले दी हिन्दू के संपादक रहे भारतीय पत्रकारिता के बड़े  नामों में शामिल एन राम और अक्षय पात्रा के ट्रस्टी में शामिल मोहनदास पाई के बीच सोशल नेटवर्किंग साइट ट्विटर पर जमकर बहस हुई. मोहनदास पाई ‘दी हिन्दू’ में प्रकाशित एक खबर पर एकतरफा वामपंथी प्रोपगंडा का आरोप लगा रहे थे. इस खबर में यह कहा गया था कि कुछ बच्चे अक्षय पात्रा द्वारा उपलब्ध कराये जा रहे भोजन का स्वाद पसंद नहीं करते हैं.

अक्षय पात्रा के द्वारा उपलब्ध कराये जा रहे भोजन को लेकर विवाद इसलिए हो रहा है क्योंकि प्याज, लहसुन और अंडे को शामिल करने से यह इनकार करता है. यह संस्था इस्कॉन से जुड़ी है जो शाकाहारी भोजन को प्रोत्साहन देता है और एक ख़ास धर्म के मूल्यों को आगे बढ़ाता है. यह संस्था भोजन में प्याज और लहसुन को आध्यात्मिक उन्नति में बाधित करने वाला मानता है.

इस संस्था के इस रवैये की वजह से उड़ीसा जैसे राज्य को अलग से अंडे खरीदकर विद्यालय में उबालने का बंदोबस्त करना पड़ा है. यद्यपि अंडों की कीमत अक्षय पात्रा ही उठाता है पर इस पूरी प्रक्रिया में शिक्षा विभाग को उर्जा जाया करना पड़ता है.

ऐसे में सवाल यह है कि एक खास धर्म के मूल्यों से चलने वाली संस्था विविधिता वाले देश में भोजन उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी क्यों लेगा! क्या इसे अपने मूल्यों को दूसरे लोगों पर थोपना नहीं माना जाएगा!

सनद रहे कि भारत में बहुसंख्यक लोग मांसाहारी हैं और लहसुन प्याज उनके रोजमर्रा के खाने का अहम् हिस्सा है.

इंडिया स्पेंड नाम की वेबसाइट के एक विश्लेषण के अनुसार देश के अस्सी फ़ीसदी पुरुष और सत्तर फीसदी महिलायें मांसाहारी हैं. ऐसे में क्या यह नहीं माना जाएगा कि अक्षय पात्रा नाम की संस्था अल्प-संख्यको की भोजन पद्धति को बहु-संख्यांकों पर थोप रही है!

मध्यान्ह भोजन और इसका इतिहास

मध्यान्ह भोजन योजना की शुरुआत 1920 के दशक में हुई, जब मद्रास प्रेसीडेंसी के दायरे में आने वाले तत्कालीन मद्रास नगर निगम ने गरीब बच्चों के लिए एक कार्यक्रम शुरू किया. बाद के दिनों में तमिलनाडु के मुख्यमंत्रियों ने जैसे के कामराज और एमजी रामचंद्रन ने आजादी के बाद भी इस योजना को आगे बढाने का निर्णय लिया.

बाद में केंद्र सरकार को भी इस योजना के महत्व का एहसास हुआ और 1995 में केंद्र सरकार ने मध्याहन भोजन की योजना का क्रियान्वयन करना शुरू किया. केंद्र सरकार के ऐसे करने के पीछे बच्चों को स्कूल जाने के लिए प्रोत्साहित करना, ड्रॉपआउट दरों को कम करना और कुपोषण कम करना था. वर्ष 2001 में देश के सर्वोच्च न्यायालय ने खाद्य अधिकार मामले में एक आदेश पारित किया और कहा कि इस योजना को पूरे भारत के सभी सरकारी स्कूलों में लागू किया जाए.

मानव संसाधन विकास मंत्रालय इस योजना के क्रियान्वयन के लिए जिम्मेदार है. इसके अनुसार11.6 लाख सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों में 9.40 करोड़ से अधिक बच्चों को 2017 -18 में हर दिन, पकाया हुआ ताजा भोजन उपलब्ध कराया गया.

सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के अनुसार मध्याह्न भोजन में दिया जाना वाला भोजन स्थानीय स्वाद और उत्पादन को देखने हुए तैयार किया जाना है जिसके लिए केंद्र और राज्य की सरकारें बजट बनाती हैं. यूँ तो न्यायालय के आदेश के अनुसार यह भोजन स्थानीय स्तर पर विद्यालय में ही पकाया जाना होता है पर कुछ राज्यों में भोजन की आपूर्ति राज्य सरकारों द्वारा नियुक्त ठेकेदारों को आउटसोर्स कर दिया जाता है. ऐसे ही में अक्षय पात्रा नाम की एक संस्था दृश्य में आती है, जो 12 राज्यों में काम करती है. इसकी वेबसाइट के अनुसार, यह 15,024 सरकारी स्कूलों और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों में 17 लाख स्कूली बच्चों को मध्याह्न भोजन प्रदान करती है.

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