जनता के लेनदेन में पारदर्शिता चाहिए पर खुद भाजपा को नहीं पसंद यह भारी-भरकम शब्द

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सौतुक डेस्क/
आजकल पैन, आधार जैसे पहचान पत्रों पर सरकार का बहुत ज़ोर दे रही रही है यह कहते हुए कि इससे भ्रष्टाचार  ख़त्म होगा. अब आपको यह जानकार हैरानी नहीं होनी चाहिए कि वित्तीय वर्ष 2012-13 से लेकर 2015-16 तक देश के बड़े राजनितिक दलों को कुल 1933 मर्तबा ऐसे चंदे मिले हैं जिसमे पैन कार्ड नहीं दिया गया है. इसके साथ ही करीब 1546 ऐसे डोनेशन हुए हैं जिसमे पैसा देने वाले का पता तक नहीं बताया गया है. इससे भी मजेदार यह कि बिना पैन और पते वाले चंदे का  99 प्रतिशत भारतीय जनता पार्टी को ही मिला.
एसोसिएशन ऑफ़ डेमोक्रेटिक रिफार्म ने बृहस्पतिवार को एक रिपोर्ट जारी किया जिससे पता चलता है कि वित्तीय वर्ष 2012-13 से लेकर 2015-16 के बीच किस तरह के व्यवसाय से राजनितिक दलों को अधिक चंदा आया. साथ ही कि किस दल को चंदा अधिक मिला.
कानूनन राजनितिक दलों को 20,000 रुपये से अधिक चंदा देने वाले का ब्यौरा चुनाव आयोग को देना होता है. उस ब्योरे में चंदा देने वाले का नाम, पता, पैन, पैसा कैसे दिया गया  इत्यादि शामिल होता है. इन्ही ब्योरों के आधार पर यह अध्ययन किया गया है.
इन चार सालों में राष्ट्रीय राजनितिक दलों को कुल 956.77 करोड़ रुपये का चंदा मिला. इन उद्योगपतियों से सबसे अधिक चंदा भाजपा को मिला जो कि कुल 705.81 करोड़ रुपये था.  इन धनकुबेरों से चंदा पाने में कांग्रेस 198.16 करोड़ के साथ दूसरे नंबर पर रहते हुए भी भाजपा से काफी पीछे रही.
चंदा देने में आगे रहीं ट्रस्ट एंड ग्रुप ऑफ़ कम्पनीज जहां से इन राजनितिक दलों को कुल 45.22 प्रतिशत चंदा मिला. इसके बाद मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर से करीब 12 प्रतिशत चंदा मिला. इतना ही चंदा करीब रियल स्टेट से भी इन राजनितिक दलों को मिला. खनन, आयात और निर्यात से करीब 9 प्रतिशत चंदा दिया गया.
सत्या इलेक्टोरल ट्रस्ट ने सबसे अधिक चंदा दिया. इस संस्था ने न केवल भाजपा बल्कि कांग्रेस और शरद पवार की एनसीपी तीनों को सबसे अधिक चंदा दिया है. भाजपा को दूसरे और तीसरे नंबर के सबसे अधिक चंदा देने वाली संस्थाएं है जनरल इलेक्टोरल ट्रस्ट और  लोधा कंस्ट्रक्शन. जनरल इलेक्टोरल ट्रस्ट ने कांग्रेस और एनसीपी को भी अच्छा ख़ासा चंदा दिया है.
ऐसे में पाठकों से एक सवाल, आपको क्या लगता है कोई भी व्यसायी किसी राजीनीतिक दल को चंदा क्यों देता हैं? इस चंदे में उसके क्या उद्देश्य निहित होते हैं? और इसको समझने के क्या तरीके हो सकते हैं?
पाठकों को याद होगा कि इस साल के बजट में वित्त मंत्री ने एक राजनितिक बांड नाम का एक प्रस्ताव रखा जिसमे इन राजनितिक दलों को चंदा देने वाला बैंक से वह बांड खरीद सकता है और इन राजिनितक दलों को बांड दे सकता है. इतना ही नहीं राजनितिक दलों को यह बांड देने वाला व्यक्ति या संस्था अपना नाम छिपा सकती हैं और यह कानूनन सही है. एक और तथ्य यह कि इस बांड से चंदा देने वाले को किसी तरह का कर में छूट जैसा कोई फायदा नहीं मिलेगा.  सरकार तो यह प्रस्ताव चुनावी सुधार के नाम पर  लेकर आई थी पर चुनाव और दलों की फंडिंग पर सवाल उठाने वालों ने इस कदम को भ्रष्टाचार बढाने वाला कदम बताया.
पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त नसीम ज़ैदी ने भी अपने कार्यकाल के ख़त्म होने के समय इस इलेक्टोरल बांड पर प्रश्न खड़ा कर दिया. एक अखबार को जुलाई में दिए अपने साक्षात्कार में इन्होने कहा कि हाल में  रिप्रजेंटेशन ऑफ़ द पीपल एक्ट में हुए संशोधन ने राजनितिक दलों को मिल रहे चंदे सम्बंधित पारदर्शिता को और कम किया है. इस संशोधन के मुताबिक जो  कोई भी राजीनीतिक दलों को चंदा दे रहा है वह अपना नाम और पता छिपा सकता है. उन्होंने आगे कहा, “हमलोगों ने सरकार को लिखा है कि इस तरह तो राजनितिक दल कभी नहीं बताएँगे कि उनको चंदा कौन दे रहा है. और अगर आयोग को यह पता नहीं चलेगा कि किसने किस दल को कितना चंदा दिया है तो लोग भी कभी नहीं जान पायेंगे.” मालूम होना चाहिए कि राजनितिक दलों से मिले ब्योरों को आयोग अपनी वेबसाइट पर प्रकाशित करता है. चंदे के इस गणित से जनता यह अनुमान लगा सकती है कि सरकार का कोई निर्णय किस व्यवसाय और व्यवसायी के पक्ष में जा रहा है.
पाठकों से एक और सवाल, पारदर्शिता के नाम पर नए-नए कानून और व्यवस्था थोपने वाली वर्तमान सरकार का राजनीतक दलों के फंडिंग सम्बंधित जानकारी में पारदर्शिता ख़त्म करने के पीछे क्या उद्देश्य हो सकता है.

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