दुनिया से मिल रहे कुछ ऐसे संकेत जिससे सचेत होने की जरुरत है

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जितेन्द्र राजाराम/

जितेन्द्र राजाराम

दुनिया के कई देशों में कट्टरवाद बढ़ रहा है और रुढ़िवादी पार्टियां सत्ता पर काबिज हो रही हैं। भारत को उदाहरण के तौर पर लें तो हाल ही में हुए चुनाव में भारतीय जनता पार्टी वापस सत्ता में आई है। परिणाम आये दो सप्ताह गुजर चुके हैं और लोग अभी भी परिणाम को लेकर असमंजस की स्थिति में हैं। उन्हें समझ नहीं आ रहा है कि आखिर जो पार्टी पांच साल शासन करने के बाद देश को बेरोजगारी और चौपट अर्थव्यवस्था के सिवा कुछ नहीं दे पाई वह पुनः और अधिक ताकत के साथ सत्ता में कैसे आ सकती है! इसको समझना है तो धर्म की नहीं अर्थ की राजनीति समझनी होगी जो केवल भारत की नहीं बल्कि पूरी दुनिया का ट्रेंड हैं। दुनिया की अर्थव्यवस्था में कुछ ऐसा हो रहा है जिसपर गौर करने की जरुरत है।

अमेरिका जिस प्रकार से ट्रेड वार पर उतारू है और ब्रिटेन जिस तरह से यूरोपियन यूनीयन को छोड़ना चाहता है, इससे साफ़ ज़ाहिर है की मुक्त बाज़ार की नीति से पूँजीवादियों का पेट भर चुका है। ये कुछ ऐसा है की कामधेनु गाए का संरक्षण हंसिल के लिए गाँव भर से लड़ने वाले अब बूढ़ी गाय को सड़क पर छोड़ कर गौरक्षक बनकर उत्पाद मचा रहे हों। जबतक दुनिया की अर्थव्यवस्था तेल के व्यापार पर निर्भर थी, प्रथम विश्व के देश तीसरी दुनिया के देशों पर मुक्त बाज़ार की संधि थोपने पर आमादा थे। लेकिन अब जब दुनिया का व्यापार इलेक्ट्रॉनिक डेटा पर निर्भर हो रहा है तो यही मुक्त बाज़ार विश्व नेताओं को खलने लगा है।

भारत में मुक्त बाज़ार के तीन दशक, बहुत कम फायदा और बहुत अधिक नुक़सान का दशक कहा जा सकता है। जबकि उम्मीद इसके ठीक उलट स्थिति की थी। पहले दशक में जब चीन प्रत्यक्ष निवेश के लिए अपने बाज़ार खोल रहा था भारत ने अप्रत्यक्ष निवेश के लिए बाज़ार खोले। हालाँकि दोनो ही देश अपने लिए खुले बाज़ार की नीति बना पाने की स्थिति में नहीं थे। दोनो ही देशों ने अपने बाज़ार इसलिए खोले क्यूँकि उनका घरेलू बाज़ार चरमरा चुका था। ऐसा हुआ भी इसलिए क्यूँकि दूसरे विश्व युद्ध में विजयी हुए देश किसी भी तरह से उत्तर-उपनिवेश काल में आज़ाद हुए देशों के बाज़ार को स्वतंत्र नहीं रखना चाहते थे। उन्होंने भारत, चीन, ब्राज़ील जैसे देशों को राजनैतिक एवं सामरिक आज़ादी तो दे दी लेकिन आर्थिक ग़ुलामी आज तक बरक़रार रही। भारत और चीन जब तक रूस की राजनीति से प्रभावित रहे, अमेरिका और ब्रिटेन की नींदे उड़ी हुई थी। फिर अरब देशों में मुस्लिम तुष्टिकरण ने आतंकवाद को जन्म दिया और सोवियत रूस धराशायी हो गया। सोविएत काल का अंत हुआ और मुक्त बाज़ार ने पूरे एशिया पर क़ब्ज़ा कर लिया।

आज भारत दुनिया के किस देश से क्या ख़रीदेगा इस फ़ैसले को लेकर आज़ाद नहीं है, वहीं चीन लगभग सबकुछ ख़ुद ही बना रहा है और विश्व को निर्यात कर रहा है

आज भारत दुनिया के किस देश से क्या ख़रीदेगा इस फ़ैसले को लेकर आज़ाद नहीं है, वहीं चीन लगभग सबकुछ ख़ुद ही बना रहा है और विश्व को निर्यात कर रहा है। मनमोहन सिंह की सरकार के समय ब्रिक्स देशों का समूह एक बड़ी शक्ति के रूप में उभर रहा था। भारत के नेतृत्व में ब्रिक्स डेवलपमेंट बैंक का निर्माण हुआ, इस बैंक की मुख्य शाखा चीन में बनी और इसके निदेशक बने भारत के केवी कामथ। आईसीआईसीआई बैंक के भूतपूर्व निदेशक, जो बहुत कम समय के लिए इनफ़ोसिस के निदेशक भी रहे थे।

मनमोहन सिंह ने तो यहाँ तक कह दिया था कि यदि सब कुछ ठीक रहा तो यूरोपियन यूनीयन के यूरो की तर्ज़ पर ब्रिक्स देशों का भी अपनी मुद्रा होगी। ग़ौरतलब हो कि  यूरो एक मात्र विश्व मुद्रा है जो डॉलर से अधिक स्थिर रहती है। ओपेक देशों ने सद्दाम हूसेन की अगवाई में कच्चे तेल का भुगतान डॉलर के बजाए यूरो में लेने की मंशा बनाई थी। उसके बाद क्या हुआ वो इतिहास है, आज अमेरिका और रॉयल ब्रिटेन क्यों ब्रिटेन और यूनाइटेड किंगडम को यूरोपियन यूनीयन से अलग करना चाहते हैं वो इस बात से भी समझा जा सकता है की यूरो की वजह से डॉलर की कूटनीति को बहुत बड़ा ख़तरा है।

बहरहाल, विश्व आर्थिक मंदी और उसके बाद हुए धार्मिक-राष्ट्रवादी अतिवाद के उदय ने ब्रिक्स समूह को तोड़ दिया और दुनिया तीसरे सबसे स्थिर मुद्रा से महरूम रह गयी। आज भारत, ब्राज़ील और साउथ अफ़्रीका अपने मिडल क्लास उपभोगताओं के बैंक लोन, किस्त और ख़र्चीले रवैए से ग्रस्त हैं। वहीं चीन अपने घरेलू उत्पादन के दम पर सभी विकासशील देशों से बहुत आगे निकल गया है। जहाँ ब्राज़ील के पास वायुयान बनाने वाले बड़े संयंत्र जैसे एम्बरार आदि होने के बावजूद उसका निर्यात लगभग निराशाजनक है। दक्षिण अफ़्रीका अभी भी अपनी सोने और और हीरों की खदानों पर निर्भर है वहीं भारत सॉफ़्ट्वेर के अलावा सिर्फ़ कच्चे माल और खनीज का ही निर्यात करता है। जहाँ दक्षिण अफ़्रीका की खदाने विदेशी कंपनियों के अधीन हैं वहीं भारत में भी सॉफ़्ट्वेर के नाम पर विदेशी कम्पनियाँ भारतीय सॉफ़्ट्वेर इंजीनियरों का पारिश्रमिक दोहन ही कर रहीं हैं।

वहीं चीन डेटा इंडस्ट्री में भी बड़ी शक्ति के रूप में उभर रहा है, आज चीन के पास ख़ुद का सर्च एंजिन, सोशल मीडिया और हार्ड्वेर नेट्वर्क इन्फ़्रस्ट्रक्चर है, भारत के पास ख़ुद के कई पेमेंट वॉलेट ऐप, ऑनलाइन शॉपिंग ऐप हैं जो गूगल और ऐमज़ान की तुलना में कहीं नहीं टिकते।

तीन दशक पहले बाज़ारवाद एकजुट था और समाजवाद तितर बितर होकर लगभग नष्ट हो गया। आज बाज़ारवाद में फूट पड़ चुकी है और एक देश जहाँ लोकतंत्र नहीं है वो मुक्त बाज़ार का नेतृत्व कर रहा है। ऐसे में रॉयल ब्रिटेन का यूरोपियन यूनीयन छोड़कर कॉमनवेल्थ बाज़ार की तरफ़ रूख करना और अमेरिका जैसे मुक्त बाज़ार के मसीहा को अपने बाज़ार को बंद करने की ज़रूरत महसूस होना लाज़मी है।

विश्व में हो रही इतनी बड़ी घटनाओं में भारत फ़िलहाल अमेरिकी गिरफ़्त से बाहर आता हुआ नहीं दिख रहा है। वैसे अब समय आ गया है कि नीतिनिर्माता आहटों को पहचाने और भेल, एचएएल, सेल और बीएसएनएल जैसी कम्पनियों में नयी ऊर्जा फूंके और आने वाले अनिश्चित माहौल के लिए खुद को तैयार करें। राजनितिक दल तो आते जाते रहते हैं। हर पांच साल पर जनता को सरकार चुनने का मौका मिलता रहता है। लेकिन अर्थव्यस्था अगर पटरी से उतरी पांच साल में शायद ही संभल पाएगी।

(जितेन्द्र राजाराम आजकल मध्य प्रदेश के शहर इंदौर में रहते हैं और सामाजिक राजनितिक बहस में खासा दिलचस्पी रखते हैं. इन विषयों को समझने -समझाने के लिए वे इतिहास और आंकड़ो  को अपना हथियार बनाते हैं.)

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